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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 165, कुल 530 में से

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पृष्ठ 165

११६ आत्मतत्त्वविवेके
भेदाग्रहादेकत्वमात्रमनुसन्धीयत इति चेत्, न, मायिकस्य
भेदस्याभावात्, भावे वा काल्पनिकत्वस्य व्याघातात् । पर-
मार्थोऽसतः परमार्थाभेदपर्यवसायित्वात् । आरोपितस्याग्रहा-
नुपपत्तेः, अभेदारोपानवकाशाच्च । आरोपितासत्त्वस्य परमार्थ-
सत्त्वप्रसङ्गात् चतुष्कोटिविनिर्मुक्तस्य चातिप्रसञ्जकत्वात्, तद्ग्र-
हस्य त्रैलोक्येऽपि सुलभत्वात् ।
यदि कहो कि—सविकल्पकज्ञानके विषय जो अलीक व्यक्ति, उनमें
परस्पर भेदका ज्ञान नहीं होनेसे एकत्वमात्र की प्रतीति होती है । इस-
लिये 'गौ गौ' ऐसे अनुगत भानके लिये कोई गोत्वादिसामान्य मानना
आवश्यक ही है—तो ऐसा नहीं कह सकते हो । क्योंकि उन
अलीक व्यक्तियोंमें वास्तविक भेद नहीं है । यदि उनके भेद वास्तविक
होवें तो उनका स्वयं अलीक होना व्याहत होगा । अर्थात् जो स्वयं
अलीक है, उनका भेद कभी वास्तविक हो नहीं सकता ।
यदि कहो कि—अलीकगत भेद वास्तविक नहीं है किन्तु अलीकमें
भेदकी असत्ता ही वास्तविक है—तो अलीक कही जानेवाली उन
व्यक्तियोंमें वास्तविक अभेद पर्यवसित हो जायगा और वह उन
व्यक्तियोंमें एक सामान्यरूपता (जाति) का ही साधक होगा ।
यदि अलीकमें परस्पर आरोपित भेद हो तो उस भेदका अग्रह नहीं
बन सकता, क्योंकि ग्रह ही आरोप है । ऐसी स्थितिमें भेदके अग्रहके
कारण आपने उन व्यक्तियोंमें एकत्व (अभेद) का प्रतीत होना बताया
था, उसे भी यहाँ अवसर नहीं मिल सकता है ।
यदि कहो कि—विभिन्न व्यक्तियोंमें भेदकी असत्ताका आरोप हो
जानेसे उनमें अभेद प्रतीत होने लगता है—तो जब भेदकी असत्ता
आरोपित है, तब सुनिए भेदकी सत्ता पारमार्थिक (वास्तविक) हो-
जायगी, और जिनके भेद वास्तविक होंगे, वे व्यक्ति भी वास्तविक ही
हो जायेंगे, आपके मतानुसार अलीक नहीं हो सकते ।
यदि कहो कि—न भेद वास्तविक है और न उसकी असत्ता ही
वास्तविक है, एवं भेद न आरोपित ही है और न उसकी असत्ता ही