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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 530 में से

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पृष्ठ 172

तस्याकाङ्क्षाऽस्ति गोष्ठे कालाक्षी धेनुर्घटोध्नी महाघण्टा
नन्दिनी' त्यादिभिर्नियामकैर्विधायकैर्वा निवार्यत' इति विधौ
न कश्चिद् दोषः।
गोत्वविशिष्टसदसद्व्यक्तिमात्रप्रतीतेस्तदेवास्त्यादिपदप्र-
योगवैफल्यमिति चेत्, तावन्मात्रप्रतिपत्त्यर्थमेव तत्। अनेक-
प्रतिपत्त्यर्थन्तु तदुपयोगः, तस्य प्रागप्रतीतेरित्युक्तम्।
यस्तु निपुणम्मन्यो विकल्पमेव पक्षयति स्म—यज्ज्ञानं
यद्भावाभावसाधारणप्रतिभासं, न तेन तस्य विषयत्वम्,
सकती। अत वह व्यक्ति दोहनादि प्रयोजनके निमित्त विशेष गौकी
आकाङ्क्षा करता है। और उसकी वह आकाङ्क्षा “गोठे (गोशाला)
में काली आसवाली, घटके समान थनवाली तथा बड़ा घण्टावाली
नन्दिनी नामकी धेनु है” इन नियामक या विधायक विशेषणोंसे निवृत्त
होती है। इस प्रकार विधिपक्षमे कोई दोष नहीं है।
यदि कहो कि—गोशब्द ही गोत्वसे युक्त सत् या असत् गोव्यक्ति-
मात्रकी प्रतीति कराता है। इसलिये फिर वही अस्ति-नास्तिपदोंके
प्रयोगकी निष्फलता आ जाती है—तो यह कहा जा चुका है कि अभिन्न
रूपसे सम्पूर्ण गोव्यक्तिको बतलानेवाला गोशब्द है और भिन्न भिन्न
रूपमे गोव्यक्तियोंको बतलानेके लिये अस्ति आदि विशेषणपदोंका
उपयोग है। क्योंकि विशेषणपदोंके प्रयोगके पूर्व गोव्यक्तियोंकी
विभिन्नताकी प्रतीति नहीं होती।
ज्ञानश्रीसम्मत विकल्पपक्षक अनुमानका खंडन
(पूर्वपक्ष) जो तो अपनेको निपुण मानता हुआ सविकल्पक ज्ञानको ही
पक्ष बनाता है। क्योंकि गोत्वको पक्ष बनाकर उसमें अन्यव्यावृत्तिरूपता
सिद्ध करनेपर बाध या आश्रयासिद्धि दोष हो जाता है। कारण, विधि-
रूपसे प्रतीयमान गोत्व पक्ष बने तो बाध होगा, क्योंकि उसमें अन्यव्या-
वृत्तिरूपता बाधित है। यदि अतद्व्यावृत्तिरूपगोत्व पक्ष बने तो नैयायिक
१ निवर्त्यत इति शङ्करमिश्रसम्मत पाठः।