आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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यथा गोज्ञानस्याश्वेनेत्यादि । तद्यदि गोविकल्पस्याश्वाविष-
यत्वमेव तद्भावाभावसाधारण्यं गव्यपि बाह्ये तथा, ततः
साध्यविशिष्टत्वम् ।
अथास्त्यादिविशेषाकाङ्क्षा, तदाऽसाधारण्यम् । न ह्युदा-
हृतो गोविकल्पोऽनास्त्यादिविशेषमाकाङ्क्षति । नियम-
की दृष्टिसे आश्रयासिद्धिदोष होगा, क्योंकि नैयायिक गोत्वको अतद्-
व्यावृत्तिरूप नहीं मानता है । इन्हीं दोषोंसे बचनेके लिये जो-कोई
(ज्ञानश्री प्रभृति) गोत्वको पक्ष न बनाकर सविकल्पक ज्ञानको ही
पक्ष बनाता है ।
जैसे—जो ज्ञान, जिस वस्तुके भाव और अभाव दोनों ही दशाओंमें
होता हुआ भासित होता है, उस ज्ञानका वह वस्तु विषय नहीं बनती
है । जैसे, गोज्ञान अश्वके होने या न होने दोनों ही अवस्थाओंमें होता
है तथा अश्व उसका विषय नहीं बनता । वैसे ही, गोज्ञान गोव्यक्तिके
भी भाव और अभाव उभय दशामें होता हुआ अनुभवमें आता है,
इसलिये गोज्ञानका बाह्य गो भी विषय नहीं बनती है ।
(उत्तरपक्ष) तो यहाँ दृष्टान्तभूत गोज्ञानके अश्वभावाभावसाधारण्य
का अभिप्राय यदि गोज्ञानका अश्वको अपना विषय न बनाना ही हो तो
दाष्टान्तपक्षमें भी गोज्ञानमें बाह्यपदार्थ गौके भावाभावसाधारण्यका भी
यही अभिप्राय होगा कि बाह्य गौ गोज्ञानका विषय नहीं बनती है । ऐसी
स्थितिमें साध्य और साधन एक ही हो जाता है । अतः सविकल्पक
ज्ञानको पक्ष बनाकर किया हुआ अनुमान भी नहीं हो सकता है ।
अर्थात्—गोज्ञान बाह्यगोविषयक नहीं है, क्योंकि यह बाह्यगोभावाभाव-
साधारण है, [अर्थात् बाह्यगोविषयक नहीं] है यहाँ जो ही साध्य है,
वही साधन (हेतु) रूपमें उपस्थित किया गया है । इस प्रकार साध्य
समदोष होनेसे उक्त अनुमान नहीं हो सकता है ।
यदि कहो कि—विकल्पके भावाभावसाधारण होनेका अर्थ है, उस
वस्तुमें अस्तित्व नास्तित्व, आदि विशेष प्रकारकी आकाङ्क्षा उठाना ।
अर्थात् "जिस ज्ञानके होनेपर जिस वस्तुमें-है, या-नहीं है, इस प्रकार
की विशेष आकाङ्क्षा उठती है, वह वस्तु उस ज्ञानका विषय नहीं होती