आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 176, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंऽपि हि धर्माणां कस्यचिद् बोधः कस्यचिदबोधश्चे¹त्युपकार-
भेदान्नियमः स्यात्, उपकारभेदश्च शक्तिभेदाद् भवेत्, न चैवं
प्रकृते, अनवस्थाप्रसङ्गात् । ततः² शक्तेरभेदादुपकाराभेदे
सर्वोपाधिसहितबोधोऽबोधो वेति द्वयी गतिरिति प्रतिबन्ध-
सिद्धिः ।
दुष्प्रयुक्तमेतत्—उपाधितद्वतां भेदे प्रतिनियतसामग्री-
बोध्यत्वादेव तद्यौगपद्ये बोधाबोधोपपत्तेः । प्रतिनियतसामग्री-
बोध्यत्वस्यापि स्वभाववैचित्र्यनिबन्धनत्वात् । तस्यापि स्व-
कारणाधीनत्वात् । तस्याप्यन्वयव्यतिरेकसिद्धत्वात् । तस्यापि
कार्योन्नेयत्वादिति ।
यत्तु शक्तेरभेदादित्यादि, तत्तदा शोभेत यदि धर्मिमात्रा-
भी ग्राहकसामग्रीगत शक्तिके भेदसे संभव होता । किन्तु ऐसा नहीं हो
सकता है । क्योंकि शक्तिभेदका भी कारण यदि दूसरा दूसरा शक्तिभेद
हो तो अनवस्थादोष हो जायगा । इसलिये यहां शक्तिभेद नहीं होनेसे
धर्मीमे किसी प्रकारका उपकारभेद भी नहीं हो सकता है । अत या तो
सम्पूर्ण धर्मोंके साथ धर्मीका बोध होगा या धर्मीका बोध ही न होगा,
यह दो ही गति है । इस प्रकार उक्त नियमकी सिद्धि हो जाती है ।
( उत्तर पक्ष ) आपद्वारा प्रयुक्त उक्त नियम ठीक नहीं है । क्योंकि
उपाधियों और उपाधिमान् ( धर्मी ) का परस्परमे भेद होनेके और
सभीके अपनी अपनी नियत सामग्रीसे बोध्य होनेके कारण सबका
एक साथ बोध न होकर किसी धर्मका बोध होगा और किसीका
नहीं होगा । अपनी अपनी नियत सामग्रीसे बोध होनेमें भी स्वभाव-
की विचित्रता ही हेतु है । और स्वभाव विचित्रता अपने अपने कारण-
के अधीन है । अपने अपने कारणका निर्धारण अन्वय और व्यतिरेकसे
होता है तथा अन्वयका ज्ञान भी कार्य देखकर किया जाता है ।
१ दबोध इत्यु० इति १ पु० पा०
२ तन्न इति २ पु० पा०