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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 178, कुल 530 में से

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पृष्ठ 178

[Header] क्षणभङ्गवाद १२९

प्रसिद्धप्रतिबन्धप्रतिसन्धानशक्तिकत्वात्, शब्दस्य समयसीम-
नतिक्रमात्, इन्द्रियस्य त्वर्थशक्तेरप्यपेक्षणात् । न तु सम्बद्धो-
ऽर्थ इत्येव प्रमाणै प्रमाप्यते१ अतिप्रसङ्गात् ।
यस्य तूपाधेरुपलम्भ एव येन प्रमाणेन धर्म्युपलभ्यते,
तस्यानुपलम्भे स तेन नोपलभ्यत इति परं युज्यते, सर्वोपा-
ध्यनुपलम्भे वा, तथा च सिद्धसाधनमिति संक्षेपः ।
स्यादेतत्, यदीन्द्रियेण समानविषयावेव लिङ्गशब्दौ,
तत प्रतिभासभेदोऽनुपपन्नः । एकविषयत्वं हि प्रतिभासाभेदेन
व्याप्त सव्येतरनयनदृष्टवत् दृष्टम् ।

शब्दसे कोई ज्ञान नहीं हो सकता है । और प्रत्यक्षप्रमाणभूत इन्द्रियोंके
लिये तो वस्तुगत शक्ति (योग्यता) की भी अपेक्षा होती है। ऐसी बात
नहीं है कि वस्तु इन्द्रियोंसे सम्बद्ध हुई, इतने मात्रसे इन्द्रियप्रमाणद्वारा
उसका ज्ञान हो जायगा । क्योंकि वैसा होनेपर वस्तुके रूपज्ञानके
साथ साथ उसके रसका भी ज्ञान नेत्रसे हो जाना चाहिये ।
“जिस उपाधिकी तो उपलब्धि होनेपर ही जिस प्रमाणसे धर्मीकी
उपलब्धि होती है, उस उपाधि (धर्म) की उपलब्धि नहीं होनेपर उस
प्रमाणसे उस धर्मीकी भी उपलब्धि नहीं होती है यह बात ठीक है ।
और यह भी ठीक है कि किसी धर्मीके सभी धर्मोंकी अनुपलब्धिकी
दशामे भी उस धर्मीकी उपलब्धि नहीं होती' । यदि आपका भी यही
सिद्ध करना अभिप्राय हो तो सिद्धसाधनदोष आ जाता है । क्योंकि
आप जो सिद्ध करना चाहते हैं, वह मेरे मतमे भी ठीक ही है । इस
लिये सिद्धको ही सिद्ध करना दोष है । यही सारांश हुआ ।
(पूर्वपक्ष) अस्तु यदि इन्द्रियके समान ही अनुमान और शब्द
भी वस्तुके स्वरूपको बतावे तो प्रत्यक्षज्ञानसे अनुमितिज्ञान और शाब्द
ज्ञानमें भिन्नता नहीं होनी चाहिये । जहा जहा एकविषयता रहती है,
वहा वहा ज्ञानमे भी भेद नहीं रहता है । जैसे, एक ही विषयको बायीं

१ प्रत्याय्यते इति १ पु० पा०