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आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 530 में से

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पृष्ठ 168

यदा चानलीक एव ध्रुवं न्यायस्यानुभवाभासः, तदा कैव
कथाऽलीके । न हि तस्याप्रतीयमानमपि किञ्चिदस्ति, यन्न्या-
येन साध्यमित्युक्तम् ।
किञ्चेदं भावाभावसाधारण्यं न तावदुभयरूपत्वं, विरो-
धात् । न तद्धर्मत्वमनभ्युपगमात् । नहि गोत्वमभावस्यापि
धर्म इत्यभ्युपगम्यते । न तद्धर्मित्वमनैकान्तात् । व्यक्तिरपि
भावाभावधर्मशालिनी न निषेधैकरूपेति ।
न तदुभयसादृश्य¹मसम्भवात् । अतन्निवृत्त्यैव तथात्वे
साध्याविशेषात् ।
अग्निमें साधन करनेवाला अनुमान निश्चितरूपसे आभास होता है, तो
जो अगोव्यावृत्ति स्वरूपत अलीक (मिथ्याभूत) है, उसे सिद्ध करने
वाले आपके अनुमानके आभास होनेमे क्या कहना है ? और उस
अलीकका कोई ऐसा स्वरूप नहीं है, जो प्रत्यक्षद्वारा प्रतीयमान न होता
हुआ भी वास्तविक हो तथा जिसे अनुमानसे सिद्ध किया जा सके ।
यह बात पहले कही जा चुकी है ।
एवं गोत्वादि के भावाभावसाधारण होनेका क्या अभिप्राय है ?
भाव - अभाव उभयस्वरूप होना अभिप्राय नहीं हो सकता है । क्योंकि
भाव-अभावके परस्परविरोधी होनेके कारण कोई वस्तु उभयरूप
नहीं हो सकती है । भाव-अभावका धर्म है गोत्वादि, यह अभिप्राय
नहीं हो सकता । क्योंकि गोत्व भावका धर्म होनेपर भी अभावका
धर्म नहीं माना जाता है । भाव-अभावका धर्मी होना भी अभिप्राय
नहीं हो सकता । क्योंकि आपका अनुमान व्यभिचारी हो जायगा ।
कारण, व्यक्ति भी भाव अभावका धर्मी है फिर भी वह आपके मतमें
भी केवल निषेध (अन्यव्यावृत्ति) रूप नहीं है। इस प्रकार हेतुके
रहनेपर भी साध्य नहीं होनेसे व्यभिचार हो गया ।
गोत्वका भावाभावके सदृश होना भी भावाभावस धारण नहीं है,
१ सादृश्य = सादृश्यस्वरूपत्वम् । असंभवात् = अभावावृत्तित्वेन समात्व'-
संभवात्, उभयवृत्तेरेव धर्मस्य सादृश्यत्वात् इति रघुनाथः ।

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 168, कुल 530 में से · SarvaKosh