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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 530 में से

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पृष्ठ 166

क्षणभङ्गवादः १९०
'अन्यत्र पारमार्थिकभेदप्रतीतौ कथमभेद आरोप्यतामिति
चेत्, एतत्तर्हि यस्य प्रतिभासे यन्नारोप्यते, नियमेन तस्यैवा-
प्रकाशे तदारोप्यम्, न तु तन्नामकमात्रस्य, अतिप्रसञ्जकत्वात् ।
अत एव न व्यधिकरणस्यापि सतोऽसतो वा भेदस्याग्रहोऽ-
भेदारोपोपयोगीति ।
आरोपित है । किन्तु इन चारों प्रकारोंसे अतिरिक्त किसी अलीक भेद-
के ही अग्रहसे व्यक्तियोंमे एकाकारता प्रतीत होती है—तो इस प्रकार-
के सर्वतोभावेन अज्ञात भेदका अग्रह तो त्रैलोक्यमात्रमे सुलभ होनेसे
सारे संसारमे एकाकारता की प्रतीति होने लगेगी ।
यदि कहो कि—अलीक भेदका अग्रह यद्यपि सर्वत्र सुलभ है,
तथापि उन उन वस्तुओमे पारमार्थिक भेदग्रहसे प्रतिबन्ध हो जानेके
कारण सर्वत्र अभेदारोप (एकाकारता-प्रतीति) की आपत्ति नहीं हो
सकती है—तो ऐसी स्थितिमे जिसका भान होनेपर जिसका आरोप
नहीं हो सकता, नियमतः उसीकी अभानावस्थामे उसका आरोप संभव
है, न कि उसके नामधारीमात्र किसी काल्पनिककी अभानावस्थामे
भी । अर्थात् जब अभेदारोपके प्रति पारमार्थिक भेदग्रहको प्रतिबन्धक
मानना आवश्यक है, तब अलीक भेदाग्रहसे अभेदारोप माननेमे
कोई प्रमाण नहीं है । आरोप सम्बन्धी उक्त नियम न माना जाय तो
अतिप्रसङ्गदोष हो जायगा । अर्थात् जिस किसीके भेदका अग्रह
सर्वत्र सुलभ होनेसे सर्वत्र ही अभेदारोप होने लगेगा ।
एवं अतिव्याप्तिदोषके कारण ही सन् या असन् अन्यगतभेदका
अग्रह भी कहीं अभेदारोप होनेमे उपयोगी नहीं हो सकता । अर्थात्
अन्यगत भेदाग्रहसे अन्यत्र अभेदारोप माना जाय तो सर्वत्र अभेदारोपकी
आपत्ति हो जायगी । इस प्रकार घटपटके वास्तविक भेदका अग्रह
होनेसे तथा अलीक शशशृङ्ग और कूर्मरोमके अवास्तविक भेदका अग्रह
होनेसे भी गौ अश्व आदि उदासीन अधिकरणोंमे अभेदारोप