आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 175, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें१२६ आत्मतत्त्वविवेके
सिद्धिदोषः। न हि गोविकल्पो गोस्वरूपं¹ नोपदर्शयतीति
मम कदापि सिद्धम् । तव चाद्यापि । उपाध्यन्तरं³ चेदने-
कान्तः। न हि यो यस्योपाध्यन्तरं नोपदर्शयेत्, नासौ
तदपीति⁴ नियमः ।
ननु नियम एव । तथाहि—यन्न यत्समवेतधर्मबोधन-
तन्न तत्स्वरूपबोधनम्, यथा गोविकल्पशब्दौ तुरगे, तथा च
तौ गव्यपि नीलत्वाद्यपेक्षयेति व्यापकानुपलब्धिः । धर्मिबोधे
भिन्न उसकी उपाधि (धर्म) स्वरूप है ? यदि वस्तुस्वरूप मानो तो
उक्त हेतु स्वरूपासिद्ध है। क्योंकि मैं यह कभी नहीं मानता कि गोज्ञान
गोस्वरूपको नहीं बताता है। और तुम भी इसे अबतक भी नहीं
सिद्ध कर सके हो। यदि सत्त्वासत्त्वको वस्तुका एक भिन्न धर्मस्वरूप
मानो—तो उक्त नियम व्यभिचारी है। क्योंकि यह नियम नहीं है
कि जो ज्ञान जिस वस्तुके धर्मको न बतावे, वह उस वस्तुको भी नहीं
बताता है। क्योंकि धर्मज्ञानकी सामग्री भिन्न होती है, और धर्मिज्ञान-
की सामग्री भिन्न।
(पूर्वपक्ष) इस प्रकारका तो नियम अवश्य है कि जो जिस वस्तुके
समवायसम्बन्धसे सम्बद्ध धर्मको नहीं बताता, वह उस वस्तुके स्वरूप-
को भी नहीं बताता है। जैसे, गोज्ञान और गोशब्द अश्वसमवेत धर्म-
को नहीं बताते हैं, इसलिये अश्वस्वरूपको भी नहीं बताते । वैसे ही
गोज्ञान और गोशब्द गौमें भी नीलत्वादिधर्मकी प्रतीति नहीं कराते हैं,
इसलिये गोस्वरूपको भी नहीं बता सकते हैं। क्योंकि व्यापकधर्म-
की अप्रतीति होनेसे व्याप्यकी भी अप्रतीति स्वतः सिद्ध है।
धर्मीका बोध होनेपर भी धर्मोंमें किसीका बोध होना और किसीका
नहीं होना, यह नियम उपकारभेदसे सम्भव होता। और उपकारभेद
१ स्वरूपमेव इति १ पु० पा०
२ चाद्यापि इति १ पु० पा०
३ चेत्तदा इति १ पु० पा०
४ तमपीति इति १ पु० पा०