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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 530 में से

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पृष्ठ 170

क्षणभङ्गवाद । १९२१
सिद्धेश्च । न हि यदस्ति तदेव नास्तीति प्रत्ययगोचरः स्यात् ।
प्रकारान्तरमाश्रित्य स्यादेवेति चेत्, एवं तर्हि तमेव प्रकारभेद-
मुपादाय विधिव्यवस्थायां को विरोधो येन प्रतिबन्धः सिध्येत् ।
तस्य विधिरूपतायामस्ति नाम¹ किमधिकमुपनेयमिति
चेत्, निषेधरूपत्वेऽपि नास्ति नाम² किमधिकमुपनेयमिति
विषय होना ही भाव अभाव उभयसाधारण होना है—क्योंकि विरोध
होगा और अन्यथासिद्धि भी। विरोध इसलिये कि जो वस्तु "अस्ति"
प्रतीतिका विषय होगी, वही "नास्ति" प्रतीतिका विषय नहीं हो सकेगी।
अन्यथासिद्धि इसलिये कि यदि प्रकारान्तरका आश्रयण कर वही वस्तु
"अस्ति नास्ति" उभयप्रतीतिका विषय हो सकती है। अर्थात् गौरूप
आश्रयका नाश होनेपर गोत्व "नास्ति" प्रतीतिका विषय हो सकता है
और उस आश्रयकी अनाशावस्था मे "गोत्व" अस्ति प्रतीतिका विषय हो
सकता है—तो इस प्रकारसे गोत्वको विधिरूप माननेमे ही क्या विरोध
है, कि आपकी उक्त व्याप्ति सिद्ध हो और तदनुसार गोत्व अगोपोह
(अगोव्यावृत्ति या अगोनिषेध) रूप माना जाय।
यदि कहो कि—गोत्व यदि विधिरूप हो तो "गोत्वम् अस्ति" यहाँ
विधिवाचक अस्तिशब्दके उच्चारणमे पुनरुक्तिदोष हो जायगा तथा
गोत्वके साथ नास्तिशब्दके उच्चारणमे विधि निषेधका परस्पर विरोध
भी हो जायगा—तो मैं भी कह सकता हूँ कि गोत्व यदि अन्यका निषेध
रूप हो तो "गोत्व नास्ति" यहाँ नास्तिशब्दके उच्चारणमे भी पुनरुक्ति
दोष हो जायगा और निषेधस्वरूपके साथ अस्ति शब्दके उच्चारणमे
निषेध और विधिका परस्पर विरोध भी हो जायगा।
यदि कहो कि—विधि या निषेध किसी एक स्वरूप माननेमें ही उक्त
विरोध और पुनरुक्ति दोष होते हैं, इसलिये तो गोत्वादिधर्म को
उभयसाधारण मानना चाहिये—तथापि उभयसाधारणका अर्थ यदि
उभयस्वरूप रखो तो भी असम्भव है। क्योंकि कोई भी पदार्थ परस्पर
१ अस्तिना किमिति रघुनाथशिरोमणिसम्मतं पाठ ।
२ नास्तिना किमिति रघुनाथशिरोमणिसम्मत पाठ ।