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आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

८६ आत्मतत्त्वविवेके
लम्भनियमाद्वा भवेत् ? व्यवहारानुरोधाद्वा ? अतिरिक्तविनाशे
बाधकानुरोधाद्वेति ?
न प्रथमः, उपलभ्यन्ते हि पटकाले वेमादयः । न ते त
इति चेत्, किमत्र प्रमाणम् ? अभेदेऽपि किं प्रमाणमिति चेत् ,
मा भूत तावत्, सन्देहस्थितावपि अनुपलब्धिबलाल्लम्बनविलयात् ।
जो करघा आदि है, वह भी सूत्ररूप कारणसे भिन्न है, अतः करघामें
भी तन्तुनाशका व्यवहार होने लगेगा । साथ ही कारणविरह (भेद)
के स्वरूपका निर्वाचन भी नहीं हो सकता है । क्योंकि विरहका
अर्थ अभाव लो तो वह आपके मतमें मिथ्या वस्तु है, अतः वह
कार्यमे कैसे रह सकता है ? अर्थात् वह कार्य कारणविरहवान्
अर्थात् कारणभेदवान् अर्थात् कारणसे भिन्न कैसे होगा ? क्योंकि कार्य
सत् और विरह (भेद) अभावरूप होनेसे असत् है । तथा सत्
असत्‌का परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं होता । यदि उस कारणविरह
(भेद) को असत् होनेसे बचानेके लिए अधिकरणस्वरूप मानो तो
वह अधिकरण कार्य ही है । इस स्थितिमें जो कार्य कारणभेदरूप है,
वह कारणभिन्न कैसे होगा ? क्योंकि वही आश्रित और वही आश्रय नहीं
होता है । इसलिए भेद ही भिन्न कैसे होगा ?
यदि दूसरा पक्ष लो तो वह भी ठीक नहीं है । क्योंकि कार्यको
कारणका अभावरूप माननेका क्या कारण है ? क्या, इसलिये कि
कार्यकालमें उपलब्धिकी योग्यता रहते हुए भी नियमत कारणकी उप-
लब्धि नहीं होती है ? या लौकिक व्यवहारके अनुरोधसे ? अथवा
कारणके विनाशको (अभावको) कार्यसे अतिरिक्त माननेमें बाधक
होनेसे ?
इनमें प्रथम पक्ष ठीक नहीं है । क्योंकि पटकालमें भी वेमा
आदि उसके कारणकी उपलब्धि होती है । यदि कहो कि-पटकालमे
जो वेमा आदि उपलब्ध होते हैं, वे पहलेवाले नहीं हैं किन्तु दूसरे ही
हैं-तो इसमें प्रमाण क्या है ? यदि मुझसे पूछो कि-जो वेमा पट
होनेके पहले था वही पटकालमें भी है, इसमें क्या प्रमाण है ?—तो में

द्वितीय परिच्छेद: बाह्यार्थभंगवाद (विज्ञानाद्वैतवाद) निराकरण

क्षणभङ्गवादः ८७
न द्वितीयः, न हि पटो जात इत्युक्ते तन्तवो नष्टा इति
कश्चिद् व्यवहरति । पटस्यानतिरेकात् तन्तुमात्रजन्मनि भेदाग्रहा-
दव्यवहार इति चेत्, न तर्हि व्यवहारबलमपि १ । विसभागसन्ततौ
तावद् व्यवहारबलमस्तीति चेत्, नैतदेवम् । यदि हि तन्तुमालैव
पटनिवृत्तिः, कथं तदाश्रयस्तदात्मको वा पटः प्राक् ? अन्यैवा-
कहूँगा कि इसमें भी भले ही कोई प्रमाण न हो, तो भी सन्देहके
आधारपर ही तुम्हारा यह कथन कि 'कार्यकालमें कारणकी उपलब्धि
नहीं होती है" विलीन हो जाता है ।
दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि "पट उत्पन्न हो गया"
ऐसा कहनेपर कोई भी यह व्यवहार नहीं करता कि 'तन्तु नष्ट हो गये'।
यदि कहो कि-वैसा व्यवहार न होनेका कारण यह है कि पट तन्तुसे
कोई भिन्न पदार्थ नहीं है, किन्तु विभिन्न प्रकारके तानाबानावाले तन्तु
ही पट कहे जाते हैं, और पूर्व तन्तुओंसे अग्रिम तन्तुओंके भिन्न होनेपर
भी एक जातिके होनेसे यह नहीं मालूम पड़ता कि बुने हुए तन्तु पहलेके
तन्तुओंसे भिन्न हैं । यही कारण है कि "कारणभूत तन्तु नष्ट हो गये"
ऐसा लोकव्यवहार नहीं होता-तब तो यह आया कि तुम्हारे पक्षमें
व्यवहारका बल भी नहीं है ।
यदि कहो कि-कारण-कार्य की सन्तति दो प्रकारकी होती है । एक
सदृश और दूसरी विसदृश । सदृश सन्तति तन्तु-पटकी और विसदृश
सन्तति काष्ठ-अङ्गारकी होती है । यहाँ विसदृश सन्ततिमे देखा जाता
है कि अङ्गार पैदा होनेपर कारणभूत काष्ठका विनाश-व्यवहार होता
है । इस दृष्टान्तसे हम कल्पना कर लेंगे कि सदृश सन्ततिमे भी अग्रिम
कार्य ही कारणका नाश है-
तो यह भी ठीक नहीं है । क्योंकि जहाँ पटनाश होनेपर पुनः
तन्तुमालाकी अवस्था प्राप्त हो गयी, वहाँपर पटरूपकारणका नाश
तुम्हारे कथनानुसार अतिरिक्त वस्तु न होकर उसका अग्रिम कार्य जो
तन्तुमाला, तद्रूप ही होगा । ऐसी दशामें जो तन्तुमाला पटनाश
१. व्यवहारावलम्बनमपि-२ पु० पा० ।

८ आत्मतत्त्वविवेके
भाविति चेत्, न तावज्जातिकृतमन्यत्वमुपलभ्यते¹। व्यक्तिकृतं तु
नाद्यापि सिध्यति । अतएव² तत्सिद्धावितरेतराश्रयत्वम्³ । तथापि
यद्येवं स्यात् कीदृशो दोष इति चेत्, न कश्चित्, केवलं प्रमाणा-
भावो व्यवहाराननुरोधश्च । तदसिद्धावपि सिध्यतस्तस्य निमित्ता-
न्तरापेक्षणात् ।
स्वरूप है, उसीमें पहले पट कैसे था ? अथवा तुम्हारे मतानुसार
वही तन्तुमाला पहले पटस्वरूप कैसे थी ?
यदि कहो कि-पटनाशकालीन तन्तुमाला पटकालीन तन्तुमालासे
भिन्न है, इसलिए पूर्व तन्तुमाला पटरूप होगी और उत्तर तन्तुमाला पट-
नाशरूप होगी, इसमें कोई विरोध नहीं है-तो यह भी ठीक नहीं है।
क्योंकि पूर्व और उत्तर तन्तुमालाओंमें जातिकृत भेदकी उपलब्धि नहीं
होती और व्यक्तिकृत भेद तो बिना क्षणभंग सिद्ध हुए हो नहीं सकता,
जो अभीतक सिद्ध नहीं हो सका है । इसीलिये यहाँ अन्योन्याश्रयदोष
भी हो जाता है । क्योंकि पूर्व तन्तुमालासे उत्तर तन्तुमाला भिन्न
सिद्ध हो तो उत्तर तन्तुमाला पटनिवृत्तिरूप सिद्ध हो और उत्तर तन्तु
मालाके पटनिवृत्तिस्वरूप सिद्ध होनेपर ही वह (उत्तर तन्तुमाला) पट-
स्वरूप पूर्व तन्तुमालासे भिन्न सिद्ध हो सकती है ।
(शङ्का) फिर भी उत्तर तन्तुमालारूप अग्रिम कार्यको ही पटात्मक
पूर्व तन्तुमालास्वरूप कारणका विनाशरूप माननेमें क्या हानि है ?
(उत्तर) कोई हानि नहीं है । केवल इतनी बात है कि प्रमाणका
अभाव है और ऐसा व्यवहार भी नहीं होता । जहाँपर तन्तुनाशसे ही
पट नाश हुआ हो, वहाँपर पटनाश तन्तुमालास्वरूप नहीं सिद्ध हो
सकता, क्योंकि तन्तुमाला भी वहाँ नहीं है । किंतु यहाँपर पटध्वंसरूप
निमित्तान्तरसे ही पटनाशका व्यवहार तुम भी मानोगे ।
१. मान्यदुपलभ्यते—१ पु० पा० ।
२. इत एव—पा० क्वचित् । टीकाकारसम्मततोऽपि ।
३—पूर्वापरतन्तुमाल्योर्भेदे सति निवृत्तिरूपत्व निवृत्तिरूपतायाञ्च सत्यां
भेद इत्य यान्याश्रय इति शङ्करमिश्रः ।

क्षणभङ्गवादः ८९
अपि च तन्तुविनाशः सामान्यतस्तन्तुविरहस्वभावो वा स्यात्
तद्विपरीतो वा । आद्ये कथं तन्त्वन्तरम् ? न हि सामान्यतो
नीलमनीलविरुद्धस्वभावमनीलान्तरम् । द्वितीये कथं तद्विरोधी ?
न हि नीलं सामान्यतोऽपि नीलान्तरविरोधि । विशेषमात्र एवायं
विरोध १ इति चेत्, तत् किं सामान्यतोऽनुभयस्वभाव एव विनाशः ?
ओमिति ब्रुवतोऽन्यतरमुपादाय विनाशव्यवहारानुपपत्तिः । सामा-
एवं तन्तुस्वरूप विनाशको सामान्यरूपसे तन्तुविरहस्वभाववाला
मानते हो ? या तन्तुविरहस्वभाववाला नहीं मानते हो ? यदि पहला
पक्ष रखो तो वह विनाश दूसरे तन्तुका स्वरूप कैसे धारण कर लेगा ?
क्योकि सामान्यरूपसे अनीलका विरोधीस्वभाववाला नील दूसरे
अनीलका स्वरूप नहीं धारण कर लेता है । अर्थात् दूसरा अनील नहीं
बन जाता है ।
यदि दूसरा पक्ष मानो, अर्थात् वह तन्तुरूप विनाश यदि सामान्य-
रूपसे तन्तुविरहस्वभाववाला नहीं है, किन्तु तन्तुस्वभाववाला ही है,
तो फिर वह विनाश तन्तुनिवृत्तिरूप कैसे हो सकता है ? क्योंकि जैसे
सामान्यरूपसे एक नील दूसरे नीलका विरोधी नहीं होता, वैसे एक
तन्तु सामान्यरूपसे दूसरे तन्तुकी निवृत्तिरूप अर्थात् विरोधी नहीं हो
सकता है ।
यदि कहो कि—यह विरोध विशेषमात्रमे है, अर्थात् पूर्वतन्तुकी
निवृत्तिस्वरूप उत्तरतन्तु हो सकता है [जो क्षणिकत्वका साधक होगा]—
तो क्या वह पूर्वोक्त तन्तुरूप विनाश सामान्यरूपसे उक्त दोनों स्वभावोंमे
किसी स्वभावका नहीं है ? अर्थात् उक्त विनाश सामान्यरूपसे न
तन्तुका विरोधी ही है और न अविरोधी ही है ? यहाँ यदि "हाँ" कहो,
तब तो उन दोनों स्वभावोंमें किसीको लेकर सामान्यरूपसे तन्तुविनाशका
व्यवहार नहीं हो सकेगा ।
यदि कहो कि—सामान्यरूपसे विरोधी अविरोधीकी चिन्ता तब हो,
१. विशेष एवात्र विरोध--१ पु० पा०

९० आत्मतत्त्वविवेके
न्यस्यालीकत्वात् तत्र विरोधोऽपि किं करिष्यतीति चेत्, विलीन-
मिदानीं विरुद्धधर्माध्यासेन भेदप्रत्याशया, तस्य तदाश्रयत्वात् ।
नन्वतिरिक्ताभावपक्षे यथा पटः पटान्तराभाववांश्च तज्जाती-
यश्च, अभावो वा पटविरोधी पटान्तरसहवृत्तिश्चेति न कश्चिद्
विरोधः, तथा कार्याभावपक्षेऽपि भविष्यतीति । नैतदेवम्, प्रतियो-
गिना हि तादात्म्यसंसर्गरूजातीयत्वानि१ नेष्यन्ते, अप्रतियोगित्व-
प्रसङ्गात् भिन्नकालत्वात् सामान्यतो विरुद्धधर्मसंसर्गाच्च ।
जब कि सामान्यनामका कोई तत्त्व हो । किन्तु वह तो अलीक
(असत्) है, अतः यहाँ सामान्यरूपसे विरोध अविरोधका प्रश्न ही
नहीं है—तब तो गोत्व और अश्वत्वरूप विरुद्धधर्मोंके भी अलीक हो
जानेसे गौ और अश्वका भी भेद मिट जायगा । क्योंकि वह गौ
और अश्वका भेद गोत्व और अश्वत्वरूप विरुद्ध धर्मोंके कारण ही
होता है ।
(शङ्का) अभावको अतिरिक्त माननेवालेके मतमें जिस प्रकार पट
पटाभाववाला होता हुआ भी पटजातिका है, उसी प्रकार तन्तु भी तन्तु-
निवृत्तिरूप होता हुआ तन्तुजातिका बना रह सकता है । एव, जैसे
पटका विरोधी भी पटाभाव दूसरे पटके साथ रह जाता है, उसी प्रकार
तन्तुविनाश भी तन्तुरूप हो सकता है ।
(उत्तर) ऐसा कहना ठीक नहीं है। क्योंकि अपने प्रतियोगीके
साथ अभावका तादात्म्य नहीं होता, एक जगह रहना नहीं होता और

  • नहीं होती है । क्योंकि तादात्म्य होनेपर वह प्रतियोगित्व
    धर्मसे च्युत हो जायगा । अर्थात् प्रतियोगी नहीं रह जायगा । एव
    जिस कालमे प्रतियोगी रहता है, उस कालमे उसका अभाव नहीं रहता,
    इसलिये प्रतियोगी और उसके अभाव का एक जगह रहना सम्भव नहीं
    है। एव, प्रतियोगी और अभावमे सामान्यरूपसे विरोधी धर्म रहते
    हैं, इसलिये उनमें एकजातीयता नहीं हो सकती है ।
    १. सम्बन्धैकजात म—२ पृ० पा०

क्षणभङ्गवादः ९१

अप्रतियोगिना तु संसर्गे को दोषः ? न हि भेदविजा-
तीयतैककालताः संसर्गविरोधिन्यः। तादात्म्यं हि संसर्गित्वे
विरुद्धं विरोधित्वं च । ते च नेष्येते एव । नापि बाधकानु-
रोधः, तदभावात् ।
ननु घटाभावे घटोऽस्ति न वा ? आद्ये घटवति तद्भावः,
कपाले घटोऽस्तीति तान्यपि तद्वन्ति प्रसज्येरन् । नास्तीति
पक्षेऽनवस्थाप्रसङ्गः । अभावान्तरमन्तरेण तत्र नास्तिताव्यवहारे

अप्रतियोगी के साथ तो अभावका संसर्ग होनेमे कोई दोष नहीं है।
क्योंकि भेद, विजातीयता और एककालता परस्परमे संसर्गके विरोधी
नहीं होते हैं। कारण, तादात्म्य और विरोधी होना ही परस्पर
संसर्गका बाधक होता है। मैं तो अप्रतियोगीभूत पटान्तरमे न अभावका
तादात्म्य मानता हूँ और न उसके साथ अभावका विरोध ही मानता हूँ,
जिससे पटान्तरके साथ पटान्तरका अभाव न रह सके। इसके विपरीत
तुम तो तन्तुनिवृत्ति और तन्तुवन्तरका परस्पर तादात्म्य मानते हो,
इसलिये उनका संसर्ग बाधित है। क्योंकि दो भिन्नोंमे ही संसर्ग
होता है।
(शङ्का) वस्तुका अग्रिम कार्य ही उसका विनाश है, क्योंकि
विनाश को कार्यातिरिक्त मानने मे बाधक है।
(उत्तर) यह भी नहीं कह सकते। क्योंकि विनाशको कार्यसे
अतिरिक्त माननेमे कोई बाधक नहीं है।
(शङ्का) अभावको अतिरिक्त माननेवालेके यहाँ घटाभावमे घट
है कि नहीं ? आद्य पक्षमे, जैसे घटाभावमे घट रहता है, वैसे ही
घटस्थलमे घटाभाव भी रहेगा। ऐसी स्थितिमें जिन कपालोंमें घटका
अस्तित्व है, वे भी घटाभाववाले होने लगेंगे। दूसरे पक्षमे अर्थात्
"घटाभावमे घट नहीं हैं" इस पक्षमे अनवस्थादोषका प्रसङ्ग हो
जायगा। अर्थात् घटाभावमे जो दूसरा घटाभाव है, उसमें भी घटके
नहीं रहने से तीसरा घटाभाव रहेगा, और उस तीसरेमें चौथा घटाभाव
रहेगा, चौथेमे पांचवा और पाँचवेंमे छठा, इस प्रकार अभावकल्पनाका

९२ आत्मतत्त्वविवेके
भावान्तरेऽपि तथा प्रसङ्गः । न, भावान्तरस्य (स) स्वजातीय¹-
त्वेनाविरुद्धसजातीयत्वात्, विरुद्धजातीयस्य वा समानजातीय-
त्वानुपपत्तेः । अन्यत्वमात्रेण तथा व्यवहारे तद्वत्यपि प्रसङ्गात् ।
अभावस्य तु विरुद्धस्वभावतयैवाभावान्तरानुभवतर्कयो²रभावादिति ।
विराम नहीं होनेसे अनवस्था हो जायगी । इस अनवस्थादोषके भयसे
यदि घटाभावमें अन्य अभावके रहे बिना ही "घटो नास्ति" का व्यवहार
माना जाय तो भूतलादिमें भी बिना घटाभावके रहे ही "घटो नास्ति"
ऐसा व्यवहार क्यों न माना जायगा ? ।
(उत्तर) अभावको अतिरिक्त माननेवालेके प्रति उक्त प्रकारका
बाधक उपस्थित करना ठीक नहीं है । क्योंकि एक भावपदार्थ दूसरे
भावपदार्थका भावरूपसे सजातीय होनेके कारण अविरोधी है । अर्थात्
एकभावमें दूसरा भाव कभी रह भी सकता है और कभी नहीं
भी रह सकता है । जो विरोधी होगा, वह समानजातीय भी नहीं
हो सकेगा । जैसे, अभाव भावका विरोधी होनेसे उसका सजातीय
नहीं होता । अतः भाव भावका उक्त नियम अभाव भावमें लागू
नहीं होगा ।
यदि घटरूप प्रतियोगीसे भिन्न होनेमात्रसे भूतलादिमें घटाभावका
व्यवहार माना जाय तो घटदशामें भी भूतलमें घटाभाव व्यवहार होने
लगेगा । क्योंकि घटके रहने पर भी भूतल घटसे भिन्न ही रहेगा ।
लिये भिन्न होनेसे नहीं किन्तु अभाव होनेसे ही भूतलमें घटाभावका
ार हो सकता है । अथवा जो लोग यह कहते हैं कि 'घटवद्
घटाभावकालीन भूतल भिन्न है, इसलिये भावरूपभूतलके
लिये ही घटाभावका व्यवहार होता है न कि अभाव कोई स्वतन्त्र
पदार्थ है, उनका यह कथन ठीक नहीं है । क्योंकि एक घटवद्
भूतलकी अपेक्षासे दूसरा घटवद्भूतल भिन्न भी है और भावरूप
१ अत्र सजातीयत्वविरुद्धजातीयत्वे भावत्वाभावत्वाभ्यामिति दीधितिः ।
२ पटाभावो यदि घटाभाववान्न स्यात् घटवान् स्यादिति तर्कस्वरूपम् ।

क्षणभङ्गवादः ९३
भिन्नाभावजन्मनि घटताद्रूप्यक्त्यं दोष इति चेत्, न, घट-
ताद्रूप्यक्त्यं हि यदि घटत्वमेव, धभिमतमेव तत् । नह्यभाव-
जन्मनि घटोऽघटतामुपैतीत्यभ्युपगच्छामः । तत्कालसत्त्वं चेत्,
न तर्ह्यभावो जातः, कालान्तरे घटानवस्थानस्वभाव एव हि
तदभावः ।
भी है । अतः घटसे युक्त भी उस दूसरे भूतलमें घटाभावका व्यवहार
होना चाहिये ।
उपर्युक्त दोनों व्याख्यानोंके अनुसार यही सिद्ध होता है कि
भूतलमें रहनेवाला घटाभाव भूतलरूप अधिकरणसे भिन्न एवं स्वतन्त्र
पदार्थ है ।
यहाँ पर यह आशङ्का नहीं की जा सकती है कि—भूतलमे रहने-
वाला अभाव यदि अधिकरणसे भिन्न है, तो उस भूतलगत अभावमें
रहनेवाला अभाव उससे भिन्न होगा और उस अभावमें भी रहनेवाला
घटाभावादि उस अभावसे भिन्न होगा, इस प्रकार भिन्न भिन्न अगणित
अभावोंकी परम्परा कायम हो जायगी और अनवस्थादोषका प्रसङ्ग
हो जायगा—क्योंकि घटाभावमे यदि अन्य घटाभावकी प्रतीति होती तो
उस प्रतीतिके वलसे अभावमें अभावान्तर स्वीकार किया जाता । किन्तु
वैसी प्रतीति होती नहीं है। क्योंकि अभाव तो अपने प्रतियोगीके विरुद्ध
स्वभाववाला है । इसलिए जब घटाभाव रहेगा तब उसका विरोधी घट
कैसे रह सकता है ? अत प्रथम घटाभावसे ही हमेशा “घटो नास्ति”
व्यवहार होता रहता है, तथा वहाँ अन्य घटाभावका अनुभव नहीं
होता । इस स्थितिमे अभावमे दूसरा अभाव क्यों माना जाय ?
एव “घटाभावमे यदि घटाभाव न हो तो उसमे घटकी सत्ता होने
लगेगी” इस प्रकारका तर्क भी अभावमे अभावान्तर सिद्ध करनेके लिए
नहीं दिया जा सकता है। क्योंकि प्रथम घटाभावसे ही ‘घटो नास्ति’
व्यवहारकी उपपत्ति हो जायगी और घटाभावमे घटसत्ताका आपादन
नहीं किया जा सकता ।
( शङ्का ) यदि घटसे भिन्न घटाभाव ( घटविनाश ) होता तो जिस
प्रकार घटसे भिन्न पटके होनेसे पटके उत्पन्न होनेपर भी घट अवस्थित

९४ आत्मतत्त्वविवेके
अस्तु तर्हि निरुपादानत्वं बाधकं जन्म उपादानव्याप्तत्वा-
दिति चेत्, न, धर्मिग्राहकप्रमाणबाधात् भावावच्छेदाच्च व्याप्तेः ।
एतेन निरादेयत्वं १ व्याख्यातम् । गुणादिसिद्धौ चानैका-
न्तिकत्वादिति ।
रहता है, उसी प्रकार घटध्वंसके उत्पन्न होनेपर भी घटको पूर्ववत्
अवस्थित रहना चाहिये ।
( उत्तर ) यह दोष भी नहीं हो सकता । क्योंकि घटके अवस्थित
रहनेका अर्थ यदि उसके घटत्वधर्मका कायम रहना अभिप्रेत
हो तो उसे मैं भी मानता ही हूँ । क्योंकि "अभाव उत्पन्न होनेपर घट
अघटत्वको धारण कर लेता है अर्थात् घट अघट बन जाता है" यह हम
नहीं मानते ।
यदि घटके अवस्थित रहनेका अर्थ घटाभावकालमे घटकी सत्ता
मानो तो "घटसत्त्वावस्थामे घटाभाव ही नहीं पैदा हुआ" ऐसा कहा
जायगा । क्योंकि घटाभावका स्वभाव ही ऐसा है कि उस दशामें घट
अवस्थित नहीं रह सकता ।
यदि कहो कि—जो जन्मता है, उसका अवश्य कोई समवायिकारण
होता है । अभावका कोई समवायिकारण नहीं होता, इसलिये उसका
समवायिकारणरहित होना ही उसके उत्पत्तिमान् होनेमे बाधक है—
तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि यह कथन धर्मिग्राहकप्रमाणसे
बाधित है । अर्थात् जिस प्रमाणमे अभावका ग्रहण होता है, वह प्रमाण ही
इस कथनमें बाधक है । क्योंकि "इह इदानीं घटो नष्टः" इस अभाव-
ग्राहक प्रत्यक्षद्वारा ध्वंसका उत्पन्न होना ही सिद्ध होता है ।
एवं 'जो जन्मता है, उसका अवश्य कोई समवायिकारण होता है"
यह व्याप्ति भावपदार्थोंके लिये है न कि अभावके लिये भी ।
इस युक्तिसे "जो जन्मता है, वह अवश्य दूसरे कार्यका आरम्भक
होता है, अभावसे कोई कार्य उत्पन्न नहीं होता, इसलिये अभाव
उत्पत्तिमान् नहीं हो सकता है" यह बाधक भी नहीं दे सकते हो ।
१ निरादेयत्वम् = कार्यानारम्भकत्वमित्यर्थः ।

क्षणभङ्गवादः ९५
अस्तु तर्हि व्यापकत्वं ध्रुवभावित्वमिति चेत्, न, अतादा-
त्म्यात् अतत्कारणत्वाच्च । अस्मद्दिशापि व्याप्तिग्रहो न साहि-
त्यनियमेन, विरोधितया विषमसमयत्वात् । नापि जन्मानन्तर्य-
नियमेन, तदसिद्धेः । सिद्धौ वा तत एव क्षणभङ्गसिद्धेः किमनेन ?
भविष्यत्तामात्रेण व्यापकत्वमस्तीति चेत्, अस्तु, न त्वेता-
क्योंकि उक्त नियम भी भावपदार्थके लिये ही है । एव, गुणीसे भिन्न
गुण उत्पन्न होता है, यद्यपि वह स्वयं किसी कार्यका आरम्भक ( उपादान
कारण ) नहीं होता । इस प्रकार प्रतियोगीसे अतिरिक्त उसका ध्वंस
पैदा होता है, यह सिद्ध हो गया ।
यदि कहो कि—प्रतियोगीके प्रति व्यापक होना ही ध्वंसका ध्रुव-
भावित्व है । अर्थात् जैसे धूमवान्‌का वह्निमान् होना अनिवार्य है,
क्योंकि धूमके प्रति वह्नि व्यापक होता है, वैसे ही प्रतियोगीका ध्वंस
होना भी ध्रुव है, क्योंकि प्रतियोगीके प्रति ध्वंस व्यापक है—तो यह
नहीं हो सकता है । क्योंकि तुम्हारे मतसे वही व्यापक होता है,
जिसमे तादात्म्य हो अथवा जो उसका कारण हो । यहाँ ध्वंस न तो
प्रतियोग्यात्मा ( प्रतियोगीस्वरूप ) है और न प्रतियोगीका कारण है ।
हमारी रीति से भी यहाँ प्रतियोगी और ध्वंस मे व्याप्यव्यापकभाव नहीं
हो सकता है । क्योंकि हमारे मतसे नियत साहचर्यसे व्याप्तिग्रह होता
है । यहाँ पर प्रतियोगी और ध्वंस परस्पर विरोधी होनेके कारण विभिन्न
समयवर्ती होंगे और उनका परस्पर साहचर्य कभी नहीं हो सकता है ।
यह भी नहीं हो सकता कि—चूँकि प्रतियोगीके जन्म होनेके
अनन्तर ही नियमित रूपसे ध्वंस उत्पन्न हो जाता है, इसलिए प्रतियोगी-
के प्रति ध्वंस व्यापक है—क्योंकि प्रतियोगीके जन्मके बाद ही तुरन्त
नियमितरूपसे ध्वंसका उत्पन्न होना ही अबतक सिद्ध नहीं हुआ है ।
यदि सिद्ध हो तो उसीसे क्षणभङ्गवाद सिद्ध हो जायगा, तो फिर इस
गुरु व्यापारकी क्या आवश्यकता है कि विनाश ध्रुवभावी होनेसे अहेतुक
है और अहेतुक होनेसे प्रतियोगीकी उत्पत्तिके अग्रिम क्षणमे ही यह
उत्पन्न हो जायगा ।

९६ आत्मतत्त्वविवेके
वात्^हेत्वन्तरानपेक्षत्वसिद्धिः, अद्यतनघटस्य श्वस्तनकपालमाल्यै-
वार्नैकान्तिकत्वादिति¹ ।
एतेन सापेक्षत्वे व्यभिचारोऽपि स्यात्, विनाशहेतूनां प्रति-
बन्धवैकल्यसम्भवादिति परास्तम् । कपालसन्ततितुल्ययोगक्षेम-
त्वाद् विनाशस्येति ।
अस्तु तर्हि चरमः पक्षः । तथाहि—विनाशो न जायते
अभावत्वात् प्रागभाववत् । जातोऽपि वा निवर्तते जातत्वात् घट-
वदिति । नैतदेवम्, प्रागभावो जायते अभावत्वाद् विनाशि-
यदि कहो कि—भविष्यमें ध्वंस उत्पन्न होगा, इसलिए प्रतियोगीके
प्रति ध्वंस व्यापक होगा—तो ऐसा भले ही हो, किन्तु इससे यह नहीं सिद्ध
होता कि वह ध्वंस किसी अन्य हेतुकी अपेक्षा किये बिना ही उत्पन्न
हो जाता है । क्योंकि आजका घड़ा अपने आप कपालमालाका रूप
नहीं धारण कर लेता है किन्तु मुद्गरादिरूप कारणकी सहायतासे फोड़े
जानेपर ही ।
इससे यह तर्क भी खण्डित हो जाता है कि—ध्वंसको हेत्वन्तर
सापेक्ष माननेमें व्यभिचार भी हो सकता है । क्योंकि सम्भव है, हेतुओं-
के रहनेपर भी कोई प्रतिबन्धक उपस्थित हो जाय अथवा हेतुओंमे ही
किसी प्रकारकी न्यूनता आ जाय । इस प्रकार उत्पन्न होनेवाला भी
भावपदार्थ कदाचित् अविनाशी होने लगेगा— क्योंकि तुम्हारे इस तर्कपर
मैं भी कहूँगा कि “सम्भव है, विनाशके समान ही कपालसन्ततिमें भी
कोई प्रतिबन्ध हो जाय । इस प्रकार क्षण-क्षणमें विनाशशील कपाल-
सन्ततिकी उत्पत्ति नहीं सिद्ध होनेसे भावपदार्थोंका क्षणिकत्व भी
नहीं सिद्ध होगा ।
(शङ्का) तो अन्तिम पक्ष ही रहे । अर्थात् विनाश ध्रुवभावी है ।
इस प्रकार बिना हेतुकी अपेक्षा किये सभी भाववस्तुओंका अवश्यंभावी
विनाश सिद्ध होनेसे क्षणिकवाद सिद्ध हो जायगा । यहाँपर यों अनुमानना
१. अनैकान्तादिति—२ पु० ९१०

क्षणभङ्गवादः ९७ त्त्वाद्वा ध्वंसवद् घटवद् वा । अजातोऽपि वा न निवर्तते, अजात-
त्त्वात्, आकाशवत् शशविषाणवद् वेतिवत्समानत्वात् ।
किमेतेषां दूषणमिति चेत्, भावावच्छिन्नव्याप्तिकत्वादप्रयोज-
कत्वं, प्राक्प्रध्वंसाभावग्राहकप्रत्यक्षबाधः, प्राक् पश्चाच्च कार्यो-
न्मज्जनप्रसङ्गलक्षणप्रतिकूलतर्कश्च ।

प्रयोग किया जा सकता है—विनाश किसी हेतुद्वारा उत्पन्न नहीं होता
है, क्योंकि अभाव है जैसे प्रागभाव । यदि विनाश उत्पन्न हो तो,
जैसे घड़ा उत्पन्न होनेसे पुन निवृत्त हो जाता है, वैसे ही विनाश भी
निवृत्त हो जायगा । ऐसी स्थितिमें विनष्ट वस्तुको पुन प्रकट हो जाना
चाहिये ।

(उत्तर) यह अन्तिम पक्ष भी आपका ठीक नहीं है । हम भी
आपके अनुमानका बाधक अनुमान दे सकते हैं—जैसे, प्रागभाव भी
उत्पन्न होता है, क्योंकि अभाव है, जैसे ध्वंस । अथवा प्रागभाव उत्पन्न
[L1

९८ आत्मतत्त्वविवेके
अथोन्मज्जने को दोष इति चेत्, कालविच्छेदप्रत्ययस्यानु-
भयात्मकत्वप्रसङ्गः । अयथार्थत्वे तस्य द्विचन्द्रदर्शनकाले
चन्द्रदेशाविच्छेदवत् तद्वतः कालाविच्छेदे भावस्य प्राक्प्रध्वंससह-
वृत्तित्वेनाविरोधप्रसङ्गात् । यथार्थत्वे तु भेदस्थितौ तदुन्म-
ज्जनानुपपत्तेः ।
एतेन प्रागभावे प्रध्वंसोन्मज्जनं तत्काले च प्रागभावो-
न्मज्जनमपास्तम् । भाववदभावयोरपि उभयविरोधिस्वभाव-
त्वादिति ॥
ध्वस्त हुए घडेका भी पुन आविर्भाव मानना पड़ेगा । इस प्रकारके
प्रतिकूल तर्क भी उक्त अनुमानके बाधक हैं ।
यदि कहो कि—उस कालमें भी घटोन्मज्जन ( घटाविर्भाव ) मे
दोष ही क्या है ? तो यही है कि ध्वसदशामें या प्रागभावदशामें
“इदानीं घटो नास्ति यह जो कालके साथ घटकी विच्छेदप्रतीति होती
है उसे न अयथार्थ कह सकते और न यथार्थ कह सकते हो । क्योंकि
यदि अयथार्थ कहो तो, जिस प्रकार द्विचन्द्रदर्शनकालगे मध्यभागमे
होने वाली चन्द्रमाकी विच्छेदप्रतीतिका अयथार्थ होनेसे मध्यभागमें भी
चन्द्रमाकी सत्तामे कोई बाधा नहीं होती है, वैसे ही जहाँ घटका
ध्वस हुआ है, यहाँ भी उस कालके साथ घटका विच्छेद नहीं होनेसे
सभी भावपदार्थ अपने प्रागभाव और ध्वसके साथ रहने लगेंगे और
उनका परस्परका विरोध समाप्त हो जायगा ।
उक्त विच्छेदप्रतीतिको यदि यथार्थ कहो तो ध्वस और प्रागभावके
साथ घटका कालकृत और देशकृत विरोध स्थिर रहेगा । अत ध्वस और
प्रागभावके कालमें तुम्हारे द्वारा स्वीकृत घटोन्मज्जन (पुन घटाविर्भावका)
का प्रसङ्ग नहीं बन सकेगा ।
इसी प्रकार घटप्रागभावकालमे घटध्वसका उमज्जन ( आविर्भाव )
तथा घटध्वसकालमे घटप्रागभावका भी उमज्जन खण्डित समझना
चाहिये । क्योंकि प्रागभावको जैसे घटसे विरोध है, वैसे ही घटध्वस

क्षणभङ्गवाद ९९
कुतः पुनः स्थिरसिद्धिः ? प्रत्यभिज्ञानात् क्षणिकत्वानुप-
पत्तेश्च । लक्षणाभेदेन व्यभिचारिजातीयत्वात् प्रत्यभिज्ञा न प्रमाण-
मिति चेत् , न, अवान्तरलक्षणभेदेनाव्यभिचारनियमात् । किं
तदिति चेत् , विरुद्धधर्मासंसृष्टविषयत्वम् , सिद्धं च तदत्र ।
से भी है। तथा घटध्वंस को जैसे घटसे विरोध है, वैसे ही उसके
प्रागभावसे भी विरोध है ॥
स्थिरत्वमें साधक प्रमाण
( शङ्का ) भाववस्तु स्थिर हैं, इसमें क्या प्रमाण है ?
( उत्तर ) पूर्वोक्त प्रकारसे क्षणिकत्वका सिद्ध न हो सकना और
प्रत्यभिज्ञा प्रमाण है। अर्थात् क्षणिकत्वकी असिद्धिके सम्बन्धमे पूर्वमें
कहा जा चुका है। तथा "यह वही घडा है, यह वही आदमी है, जिसे
मैंने पहले देखा था" इस प्रत्यभिज्ञासे भी सिद्ध होता है कि घटादि
पदार्थ स्थिर वस्तु हैं। यदि क्षणिक होते तो "यह वही है" ऐसी
प्रत्यभिज्ञा (स्मृतिसंश्लिष्ट अनुभूति) न होती।
( शङ्का ) तत्तांश ( वह ) और इदमांश ( यह ) का उल्लेख करने
वाला जो ज्ञान वही प्रत्यभिज्ञाका स्वरूप ( लक्षण ) है। और यह
लक्षण वहाँ भी चला जाता है, जो स्थिर नहीं है। जैसे "यह वही
दीप है" यहाँ क्रमशः क्षयको प्राप्त होनेवाली बत्ती और तेलके समान
ज्वाला भी क्षणक्षणमे बदलती रहती है, फिर भी "यह वही ज्वाला है"
ऐसा व्यवहार होता है। उसी प्रकार "यह वही घडा है" इस प्रत्य-
भिज्ञाबलसे यह नहीं सिद्ध हो सकता कि घडा स्थिर वस्तु है। अतः
स्थिरत्वसिद्धिमे प्रत्यभिज्ञा प्रमाण नहीं हो सकती है।
( उत्तर ) उपर्युक्त शङ्का ठीक नहीं है। क्योंकि यद्यपि सामान्यरूपसे
दोनों प्रत्यभिज्ञायें एक सी मालूम पडती हैं, फिर भी दोनोंके अवान्तर
लक्षणोंमें भेद होनेसे उक्त प्रत्यभिज्ञाद्वारा स्थिरत्व सिद्ध करनेमें किसी
प्रकारका व्यभिचार नहीं आ सकता है।
यदि पूछो कि - "यह वही घडा है" इस प्रत्यभिज्ञामे तथा "यह
वही दीपज्वाला है" इस प्रत्यभिज्ञामें कौन सा अवान्तरलक्षणका भेद

१०० आत्मतत्त्वविवेके
एवम्भूतपि कदाचिद् व्यभिचरेदिति चेत्, न,
विरुद्धधर्मसंसर्गानिस्कन्दितस्यैकत्वप्रत्ययस्य व्यभिचारे सर्वत्रै-
कत्वोच्छेदप्रसङ्गात् । तथा चानेकत्वमपि न स्यादिति भव
निष्किञ्चनः ।
तस्माद् भेदप्रवृत्ताववश्यं विरुद्धधर्मसंसर्गः, तदसंसर्गे वाऽ-
वश्यं भेदव्यावृत्तिरिति भेदाभेदव्यवहारमर्यादा ।
निष्कम्पप्रदीपकुड्मलेषु निपुणं निभालयन्तोऽपि न विरुद्ध-
है ? तो कहूँगा कि घटवाली प्रत्यभिज्ञाका विषय जो घट है, वह
विरुद्धधर्मसे असंयुक्त है । तथा दीपज्वालावाली प्रत्यभिज्ञा, विरुद्धधर्मसे
संसृष्ट जो ज्वाला, उसे विषय करनेवाली है । कारण, दीपज्वालामें
कमी वेशीके तारतम्यका स्पष्ट अनुभव होता है ।
यदि कहो कि—वास्तविक प्रत्यभिज्ञा भी, सम्भव है, कदाचित् व्यभि-
चरित हो जाय । अर्थात् 'यह वही घडा है' ऐसी प्रतीति होनेपर भी
पूर्वापर घडेमें एकताकी सिद्धि न हो सकेगी—यह कथन ठीक नहीं
है । क्योंकि विरुद्ध धर्मोंके संसर्गसे असंस्पृष्ट होनेपर भी यदि उस
पूर्वापर घडेमें एकत्व न माना जाय तो संसारमें एकत्वका सर्वथा
उच्छेद हो जायगा । ऐसी स्थितिमें तुम्हारा अनेकत्व भी सिद्ध न हो
सकेगा । कारण, प्रतियोगिरूपसे कहीं एकत्व होनेपर ही उसका निषेध-
रूप अनेकत्व दूसरी जगह सिद्ध हो सकता है । इस प्रकार
एकत्वका परित्याग कर तू अनेकत्वसे भी हाथ धो बैठो और सब खोकर
दरिद्र बन जाओ ।
इसलिये जहाँ भिन्नता (अनेकत्व) है, वहाँ अवश्य ही विरुद्ध
धर्मोंका संसर्ग है । जहाँपर विरुद्धधर्मोंका संसर्ग नहीं है, वहाँ अवश्य
ही भिन्नता भी नहीं है । यही भेदव्यवहार और अभेदव्यवहारकी
मर्यादा है ।
यह कहना कि—निष्कम्प दीपकी कलियोंमें पूर्ण सावधानीसे
देखनेपर भी विरुद्ध धर्मोंका संसर्ग हम नहीं पाते हैं, फिर भी 'यह

क्षणभङ्गवादः
धर्मसंसर्गमीक्षामहे, अथ च प्रत्यभिज्ञानमवधूय तत्र भेद एव पदं
धत्त इति चेन्, कस्य प्रमाणस्य बलेन ? आश्रयनाशस्य हुताशन-
नाशहेतुत्वेन विज्ञातत्वात्, तस्य चात्र प्रतिक्षणमुपलब्धेः । वर्त्ति-
तैल योरुत्तरोत्तरमपचीयमानत्वात् पूर्वस्य नाश उत्तरोत्पादश्च
न्यायसिद्ध इति चेत्, नन्वयं प्रत्यनीकधर्मसंसर्ग एव, नष्टत्वानष्ट-
त्वयोराश्रयनाशानाशयोर्वा एकत्र तेजस्यनुपपत्तेः ।
सोऽयं शतं शिरश्छेदेऽपि न ददाति, विंशतिपञ्चकं तु
प्रयच्छतीति किमत्र ब्रूमः ।
भविष्यति तर्हीहापि विरुद्धधर्मसंसर्गो दुरूह इति चेत्, अथ न
एवायं स्फटिक इत्यत्र प्रमाणप्रतीतसंसर्गाणां विरोध आशङ्क्यते ?
वही दीपकलिका है" इस प्रत्यभिज्ञा की अवहेलना कर भेद ही अपना
पैर जमा लेता है । इसलिये "जहाँ भेद है, वहाँ अवश्य विरुद्ध धर्मोंका
संसर्ग है" यह नियम नहीं हो सकता है—ठीक नहीं है । क्योंकि
दीप कलियोंमे विरुद्धधर्मोंका संसर्ग नहीं दीखनेपर भी किस प्रमाणसे
भिन्नता मानते हो ?
यदि—आश्रयका नाश अग्निके नाशका हेतु है, यह बात प्रसिद्ध
है । और वह आश्रयनाश यहाँ प्रतिक्षण मालूम होता है । इस प्रकार
बत्ती और तैलके उत्तरोत्तर क्षीण हुए जानेसे पूर्वज्वालाका नाश और
उत्तरज्वालाकी उत्पत्ति अनुमान सिद्ध है—ऐसा कहो, तब तो यहाँ विरुद्ध
धर्मोंका संसर्ग ही सिद्ध हुआ । और इसी कारण दीपकलियाँ भी भिन्न भिन्न
सिद्ध हुईं । क्योंकि एक ही ज्वालामे नष्टत्व और अनष्टत्व अथवा उसके
आश्रयका नाश और अनाश साथ-साथ नहीं बन सकते हैं । इस प्रकार
यह प्रतिपक्षी सिर कट जानेपर भी सौ नहीं देता किन्तु अपने आप पाँच
बीस देता है, इसमे हम क्या कहें । अर्थात् दीपकलिकामे सीधे विरुद्ध
धर्मों के संसर्गको नहीं स्वीकार करता हुआ भी प्रकारान्तरसे उसे ही
स्वीकार करता है ।
( शङ्का ) वैसे ही यथार्थ प्रत्यभिज्ञास्थलमें भी घटादिमे विरुद्ध
धर्मोंका संसर्ग संभव है, जो मालूम नहीं देता है ।

तत्प्रतीतविरोधानां संसर्गः ? अथाप्रतीतस्वरूपविरोधसंसर्गा एव
केचिद् विरुद्धतया ? संसृष्टतया वेति ?
न प्रथमः, प्रागेव निराकृतत्वात् । न द्वितीयः, अयोग्याना-
मनुपलम्भबाधितत्वात् । योग्यानामपि कारणादिव्याप्यव्यापक-
विगमविलोचनव्यावर्तितत्वात् । न तृतीयः, तस्यातिप्रसञ्ज-
कतया सर्वत्रैकत्वोच्छेदप्रसङ्गादिति ।
एतेन प्रत्यभिज्ञानादेव लक्षणभागमाकृष्यानुमानेन स्थैर्य-


(उत्तर) तो यहाँ मैं पूछता हूँ कि क्या “यह वही स्फटिक है” यहाँपर
प्रमाणद्वारा जिनका एकत्र संसर्ग प्रतीत है, ऐसे सत्त्व द्रव्यत्व और
स्फटिकत्व धर्मों के विरोधकी संभावना है ? अथवा जिनका प्रमाण-
द्वारा विरोध प्रतीत है, ऐसे गोत्व-अश्वत्व आदि धर्मों के संसर्गकी
संभावना है अथवा ? जिनका स्वरूप, विरोध और संसर्ग तीनों
अज्ञात हैं, ऐसे धर्मोंका विरुद्धरूपमे होना या उनका संसृष्टरूपमे होना
संभावित है ?
इनमें प्रथम आशंकाका निराकरण पूर्वमें ही हो चुका है, जहाँ एक
ही बीजमें सामर्थ्य, असामर्थ्य, अङ्कुरकरण और अङ्कुराकरण आदिका
अविरोधीरूपम रहना सिद्ध किया गया है ।
द्वितीय आशंका (संभावना) भी नहीं हो सकती है । क्योंकि जो
विरोधी धर्म प्रत्यक्षके अयोग्य हैं, उनके संसर्गका भान सर्वथा असंभव
है । तथा प्रत्यक्षके योग्य जो गोत्व अश्वत्व आदि विरोधी धर्म हैं,
उनका भी परस्परमें कार्यकारणभाव या व्याप्यव्यापकभाव आदि न
होनेसे एकत्र संसर्ग असंभव है ।
तीसरा पक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि उसके अतिव्याप्तिदोषसे
ग्रस्त होनेके कारण सर्वत्र एकत्वका उच्छेद होने लगेगा, या सर्वत्र एकत्व
ही होने लगेगा । अर्थात् ज्ञात अज्ञात सभी धर्म या तो परस्परमे विरोधी
बन जायेंगे या अविरोधी ही बन जायेंगे ।
इस प्रकार विरुद्धधर्मसंसृष्टविषयकज्ञानस्वरूप जो यथार्थ प्रत्यभि-

सिद्धिः। तथाहि—विवादाध्यासितो भावः कालभेदेऽपि न
भिद्यते, तद्भेदेऽपि विरुद्धधर्मसंसृष्टत्वात्, यो यद्भेदेऽपि न
विरूद्धधर्मसंसृष्टो नासौ तद्भेदेऽपि भिद्यते यथा प्रतिसम्बन्धि-
परमाणुभेदेऽपि एकः परमाणुः, तथा चायं विवादाध्यासितो भावः,
तस्मात् कालभेदेऽपि न भिद्यत इति।
अत्र¹ व्याप्तौ न कश्चिद् विप्रतिपद्यते, पक्षधर्मता तु प्रसाधितैव।
क्षणिकत्वानुपपत्तिश्चानुगतव्यवहारानन्यथासिद्धेः। शब्दलिङ्ग-
ज्ञान है, उसमेंसे विरुद्धधर्मासंसृष्टत्वरूप लक्षणभागको अलगकर तथा
उसे ही हेतु बनाकर अनुमानद्वारा स्थिरत्वकी सिद्धि हो जायगी।
अर्थात् उक्त प्रत्यभिज्ञानमें जो विरुद्धधर्मासंसृष्टत्व विशेषण है, वही
स्थिरका लक्षण है। और सम्पूर्ण प्रत्यभिज्ञानको हेतु न बनाकर केवल
विशेषणांशसे ही, जो कि स्थिरका लक्षण भी है, स्थिरत्वकी सिद्धि
हो जायगी। जैसे—
विवादका विषय भाववस्तु कालभेद होनेपर भी भिन्न नहीं होती,
क्योंकि कालभेद होनेपर भी उसमें विरुद्ध धर्मका संसर्ग नहीं होता है,
जो जिसके भेदमें भी विरुद्ध धर्मसे संसृष्ट नहीं होता, वह उसके भेदमें
भी भिन्न नहीं होता, जैसे त्रसरेणुस्थलमें परस्पर सम्बद्ध परमाणुओंमें
भेद होनेपर भी एक परमाणु अपने आपसे भिन्न नहीं होता। वैसी ही
प्रकृत विवादका विषय भाववस्तु भी है, इसलिये यह भाववस्तु कालभेद
होनेपर भी भिन्न नहीं होती है।
उपर्युक्त व्याप्ति [जो जिसके भेदमें भी विरुद्धधर्मसे संसृष्ट नहीं
होता है, वह उसके भेदमें भी भिन्न नहीं होता] में किसीको विरोध
नहीं है। एवं भाववस्तुरूप पक्षमें विरुद्धधर्मासंसृष्टत्वरूप हेतुका रहना
सिद्ध ही किया जा चुका है। साथ ही भाववस्तुओंका क्षणिकत्व
असंगत भी है। क्योंकि वैसी दशामें सभी गौओंमें जो “गौ गौ”
इस प्रकारका एकाकार अनुगत व्यवहार होता है, वह नहीं हो सकेगा।
अर्थात् गोत्वरूप एक स्थिर धर्मके कारण ही उक्त प्रकारका एकाकार
१. अत्र चेति पाठो रघुनाथशिरोमणिसम्मतः।

१०४ आत्मतत्त्वविवेके
विकल्पा हि साधारणं रूपमनुपस्थापयन्तो न तृणकुब्जीकरणेऽपि
समर्था इत्यविवादम्, बाह्यार्थस्थितौ स्थिरास्थिरविचारात् ॥
तच्चालीकं वा, आकारो वा, बाह्यं वस्तु वेति त्रयः पक्षाः ।
व्यवहार होता है। अन्यथा प्रत्येक गोव्यक्तिके लिए भिन्न भिन्न प्रकारका
व्यवहार होता।
एव विभिन्नकालीन विभिन्नदेशस्थ गोओंमें यदि अनुगत एक (गोत्व
आदि) साधारण (स्थिर) धर्म न माना जाय तो शब्द लिङ्ग और
विकल्प एक तृण भी टेढा नहीं कर सकते, यह निर्विवाद है। अर्थात्
उनसे होनेवाला सामान्यविषयक ज्ञान भी नहीं हो सकेगा। यह
साधारणधर्म बौद्धद्वारा स्वीकृत विज्ञान ही है, ऐसा नहीं कहा जा
सकता। क्योंकि, विज्ञानातिरिक्त बाह्यवस्तु मानकर ही उसके स्थिरत्व
और क्षणिकत्वका विचार आरम्भ किया गया है। अर्थात् अनुगत धर्मके
बिना शब्दका अर्थके साथ सम्बन्धग्रहण नहीं हो सकता और सम्बन्ध
ग्रहण हुए बिना वाक्यार्थज्ञान नहीं हो सकता।
इसी प्रकार साधारण धर्मके बिना लिङ्ग (हेतु) और साध्यकी
परस्पर व्याप्तिका ज्ञान नहीं हो सकता और व्याप्तिज्ञानके अभावमे
साध्यका अनुमान नहीं हो सकता है।
एव "यह मेरे इष्टका साधन है" इस प्रकारके इष्टसाधनताज्ञानरूप
सविकल्पकज्ञान होनेपर प्रवृत्ति होती है, और प्रवृत्तिका विषय कोई
अभिनव वस्तु ही हुआ करती है, जिसमे प्रवृत्तिके पहले इष्टसाधनताका
प्रत्यक्ष होना अशक्य है। अतः पूर्वमे कभी जिसे इष्ट सिद्ध करते हुए
प्रत्यक्ष कर चुके हैं, उसी जातिका होनेके कारण अभिनव वस्तुमे भी
अनुमानसे ही इष्टसाधनताका ज्ञान करके उसे प्राप्त करनेके लिए हम
प्रवृत्त होते हैं। इस प्रकार स्थिरजाति माने बिना इष्टसाधनताज्ञानरूप
सविकल्पकज्ञानसे होनेवाली प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी। अतः शब्द, लिङ्ग
और सविकल्पकका सार्थकता तभी है, जब कि साधारण अनुगत स्थिर
जाति मानी जाय। ऐसी स्थितिमे क्षणिकत्व वहीं समाप्त हो जाता है॥
कीर्ति दिङ्नागसम्मत अलीकरूप निराकरण
'गौ गौ' ऐसी एकाकार प्रतीति कराने वाला यह अनुगतरूप अलीक

क्षणभङ्गवादः १०५
तत्र न प्रथमः पक्षः, तद्धि न तावदनुभवादेव तथा व्यवस्थाप्यं
तस्यालीकत्वानुल्लेखात्, तथात्वे वा प्रवृत्तिविरोधात् । न
ह्यलीकमेव तत् इत्यनुभूयाप्यर्थक्रियार्थी प्रवर्तते । अन्यनिवृत्ति-
स्फुरणान्नैव दोष इति चेत्, एतदेवासत्, विधिरूपस्यैव स्फुरणात् ।
न हि शब्दलिङ्गाभ्यामिह महीधरोद्देशेऽनग्निर्न भवतीति स्फुरण-
मपि त्वग्निरस्तीति ।
यद्यपि निवृत्तिमहं प्रत्येमीति न विकल्पः, तथापि निवृत्त-
पदार्थोल्लेख एव निवृत्त्युल्लेखः । न ह्यन्तर्भावितविशेषणा
विशिष्टप्रतीतिर्नाम । ततो यथा सामान्यमहं प्रत्येमीत्यनुव्यव-
( मिथ्या ) है ? या ज्ञानका आकारविशेष है ? अथवा बाह्यवस्तु है ?
ये तीन पक्ष हो सकते हैं । इनमें प्रथमपक्ष ठीक नहीं है । क्योंकि
उस अनुगतरूपको अनुभवके बलसे ही अलीक सिद्ध किया जा सकता
है, किन्तु अनुभवद्वारा उसका अलीकत्व सूचित नहीं होता है । यदि
अनुभव अनुगतरूपके साथ ही उसके अलीकत्वको भी सूचित करे तो
प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी । क्योंकि "वह अलीक ही है" ऐसा अनुभव
करता हुआ भी कोई अर्थक्रियाभिलाषी उसमे प्रवृत्त नहीं होता ।
यदि कहो कि- अनुगत धर्म ( गोत्वादि ) का अन्य ( अश्वत्वादि )
की निवृत्तिरूपसे स्फुरण होना ही यहाँ अलीकत्व है । इसलिये गवादि-
विषयक प्रवृत्तिमें कोई बाधा नहीं है-तो फिर यही असंगत है । क्यों कि
विषयकी प्रतीति विधिरूपसे होती है न कि अन्यकी निवृत्तिरूपसे ।
कारण, "पर्वतो अग्निमान्" इस शब्दद्वारा या धूमप्रत्यक्षद्वारा पर्वत-
प्रदेशमें "अनग्नि नहीं है" यह स्फुरण नहीं होता, किन्तु "अग्नि है"
यही स्फुरण होता है ।
( शङ्का ) यद्यपि "मैं अन्यनिवृत्तिका अनुभव करता हूँ" ऐसा
अनुव्यवसाय ( ज्ञानविषयक ज्ञान ) नहीं होता, फिर भी निवृत्तिपदार्थ
भासित हो ही जाता है । और इसे ही अनुभवद्वारा निवृत्तिश उल्लेख
हुआ कहेंगे । क्योंकि कोई भी विशिष्टबुद्धि विशेषणका अन्तर्भाव किये