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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 530 में से

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पृष्ठ 146

क्षणभङ्गवादः ९७ त्त्वाद्वा ध्वंसवद् घटवद् वा । अजातोऽपि वा न निवर्तते, अजात-
त्त्वात्, आकाशवत् शशविषाणवद् वेतिवत्समानत्वात् ।
किमेतेषां दूषणमिति चेत्, भावावच्छिन्नव्याप्तिकत्वादप्रयोज-
कत्वं, प्राक्प्रध्वंसाभावग्राहकप्रत्यक्षबाधः, प्राक् पश्चाच्च कार्यो-
न्मज्जनप्रसङ्गलक्षणप्रतिकूलतर्कश्च ।

प्रयोग किया जा सकता है—विनाश किसी हेतुद्वारा उत्पन्न नहीं होता
है, क्योंकि अभाव है जैसे प्रागभाव । यदि विनाश उत्पन्न हो तो,
जैसे घड़ा उत्पन्न होनेसे पुन निवृत्त हो जाता है, वैसे ही विनाश भी
निवृत्त हो जायगा । ऐसी स्थितिमें विनष्ट वस्तुको पुन प्रकट हो जाना
चाहिये ।

(उत्तर) यह अन्तिम पक्ष भी आपका ठीक नहीं है । हम भी
आपके अनुमानका बाधक अनुमान दे सकते हैं—जैसे, प्रागभाव भी
उत्पन्न होता है, क्योंकि अभाव है, जैसे ध्वंस । अथवा प्रागभाव उत्पन्न
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