आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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एवम्भूतपि कदाचिद् व्यभिचरेदिति चेत्, न,
विरुद्धधर्मसंसर्गानिस्कन्दितस्यैकत्वप्रत्ययस्य व्यभिचारे सर्वत्रै-
कत्वोच्छेदप्रसङ्गात् । तथा चानेकत्वमपि न स्यादिति भव
निष्किञ्चनः ।
तस्माद् भेदप्रवृत्ताववश्यं विरुद्धधर्मसंसर्गः, तदसंसर्गे वाऽ-
वश्यं भेदव्यावृत्तिरिति भेदाभेदव्यवहारमर्यादा ।
निष्कम्पप्रदीपकुड्मलेषु निपुणं निभालयन्तोऽपि न विरुद्ध-
है ? तो कहूँगा कि घटवाली प्रत्यभिज्ञाका विषय जो घट है, वह
विरुद्धधर्मसे असंयुक्त है । तथा दीपज्वालावाली प्रत्यभिज्ञा, विरुद्धधर्मसे
संसृष्ट जो ज्वाला, उसे विषय करनेवाली है । कारण, दीपज्वालामें
कमी वेशीके तारतम्यका स्पष्ट अनुभव होता है ।
यदि कहो कि—वास्तविक प्रत्यभिज्ञा भी, सम्भव है, कदाचित् व्यभि-
चरित हो जाय । अर्थात् 'यह वही घडा है' ऐसी प्रतीति होनेपर भी
पूर्वापर घडेमें एकताकी सिद्धि न हो सकेगी—यह कथन ठीक नहीं
है । क्योंकि विरुद्ध धर्मोंके संसर्गसे असंस्पृष्ट होनेपर भी यदि उस
पूर्वापर घडेमें एकत्व न माना जाय तो संसारमें एकत्वका सर्वथा
उच्छेद हो जायगा । ऐसी स्थितिमें तुम्हारा अनेकत्व भी सिद्ध न हो
सकेगा । कारण, प्रतियोगिरूपसे कहीं एकत्व होनेपर ही उसका निषेध-
रूप अनेकत्व दूसरी जगह सिद्ध हो सकता है । इस प्रकार
एकत्वका परित्याग कर तू अनेकत्वसे भी हाथ धो बैठो और सब खोकर
दरिद्र बन जाओ ।
इसलिये जहाँ भिन्नता (अनेकत्व) है, वहाँ अवश्य ही विरुद्ध
धर्मोंका संसर्ग है । जहाँपर विरुद्धधर्मोंका संसर्ग नहीं है, वहाँ अवश्य
ही भिन्नता भी नहीं है । यही भेदव्यवहार और अभेदव्यवहारकी
मर्यादा है ।
यह कहना कि—निष्कम्प दीपकी कलियोंमें पूर्ण सावधानीसे
देखनेपर भी विरुद्ध धर्मोंका संसर्ग हम नहीं पाते हैं, फिर भी 'यह