आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 152, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंसिद्धिः। तथाहि—विवादाध्यासितो भावः कालभेदेऽपि न
भिद्यते, तद्भेदेऽपि विरुद्धधर्मसंसृष्टत्वात्, यो यद्भेदेऽपि न
विरूद्धधर्मसंसृष्टो नासौ तद्भेदेऽपि भिद्यते यथा प्रतिसम्बन्धि-
परमाणुभेदेऽपि एकः परमाणुः, तथा चायं विवादाध्यासितो भावः,
तस्मात् कालभेदेऽपि न भिद्यत इति।
अत्र¹ व्याप्तौ न कश्चिद् विप्रतिपद्यते, पक्षधर्मता तु प्रसाधितैव।
क्षणिकत्वानुपपत्तिश्चानुगतव्यवहारानन्यथासिद्धेः। शब्दलिङ्ग-
ज्ञान है, उसमेंसे विरुद्धधर्मासंसृष्टत्वरूप लक्षणभागको अलगकर तथा
उसे ही हेतु बनाकर अनुमानद्वारा स्थिरत्वकी सिद्धि हो जायगी।
अर्थात् उक्त प्रत्यभिज्ञानमें जो विरुद्धधर्मासंसृष्टत्व विशेषण है, वही
स्थिरका लक्षण है। और सम्पूर्ण प्रत्यभिज्ञानको हेतु न बनाकर केवल
विशेषणांशसे ही, जो कि स्थिरका लक्षण भी है, स्थिरत्वकी सिद्धि
हो जायगी। जैसे—
विवादका विषय भाववस्तु कालभेद होनेपर भी भिन्न नहीं होती,
क्योंकि कालभेद होनेपर भी उसमें विरुद्ध धर्मका संसर्ग नहीं होता है,
जो जिसके भेदमें भी विरुद्ध धर्मसे संसृष्ट नहीं होता, वह उसके भेदमें
भी भिन्न नहीं होता, जैसे त्रसरेणुस्थलमें परस्पर सम्बद्ध परमाणुओंमें
भेद होनेपर भी एक परमाणु अपने आपसे भिन्न नहीं होता। वैसी ही
प्रकृत विवादका विषय भाववस्तु भी है, इसलिये यह भाववस्तु कालभेद
होनेपर भी भिन्न नहीं होती है।
उपर्युक्त व्याप्ति [जो जिसके भेदमें भी विरुद्धधर्मसे संसृष्ट नहीं
होता है, वह उसके भेदमें भी भिन्न नहीं होता] में किसीको विरोध
नहीं है। एवं भाववस्तुरूप पक्षमें विरुद्धधर्मासंसृष्टत्वरूप हेतुका रहना
सिद्ध ही किया जा चुका है। साथ ही भाववस्तुओंका क्षणिकत्व
असंगत भी है। क्योंकि वैसी दशामें सभी गौओंमें जो “गौ गौ”
इस प्रकारका एकाकार अनुगत व्यवहार होता है, वह नहीं हो सकेगा।
अर्थात् गोत्वरूप एक स्थिर धर्मके कारण ही उक्त प्रकारका एकाकार
१. अत्र चेति पाठो रघुनाथशिरोमणिसम्मतः।