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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 135, कुल 530 में से

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पृष्ठ 135

८६ आत्मतत्त्वविवेके
लम्भनियमाद्वा भवेत् ? व्यवहारानुरोधाद्वा ? अतिरिक्तविनाशे
बाधकानुरोधाद्वेति ?
न प्रथमः, उपलभ्यन्ते हि पटकाले वेमादयः । न ते त
इति चेत्, किमत्र प्रमाणम् ? अभेदेऽपि किं प्रमाणमिति चेत् ,
मा भूत तावत्, सन्देहस्थितावपि अनुपलब्धिबलाल्लम्बनविलयात् ।
जो करघा आदि है, वह भी सूत्ररूप कारणसे भिन्न है, अतः करघामें
भी तन्तुनाशका व्यवहार होने लगेगा । साथ ही कारणविरह (भेद)
के स्वरूपका निर्वाचन भी नहीं हो सकता है । क्योंकि विरहका
अर्थ अभाव लो तो वह आपके मतमें मिथ्या वस्तु है, अतः वह
कार्यमे कैसे रह सकता है ? अर्थात् वह कार्य कारणविरहवान्
अर्थात् कारणभेदवान् अर्थात् कारणसे भिन्न कैसे होगा ? क्योंकि कार्य
सत् और विरह (भेद) अभावरूप होनेसे असत् है । तथा सत्
असत्‌का परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं होता । यदि उस कारणविरह
(भेद) को असत् होनेसे बचानेके लिए अधिकरणस्वरूप मानो तो
वह अधिकरण कार्य ही है । इस स्थितिमें जो कार्य कारणभेदरूप है,
वह कारणभिन्न कैसे होगा ? क्योंकि वही आश्रित और वही आश्रय नहीं
होता है । इसलिए भेद ही भिन्न कैसे होगा ?
यदि दूसरा पक्ष लो तो वह भी ठीक नहीं है । क्योंकि कार्यको
कारणका अभावरूप माननेका क्या कारण है ? क्या, इसलिये कि
कार्यकालमें उपलब्धिकी योग्यता रहते हुए भी नियमत कारणकी उप-
लब्धि नहीं होती है ? या लौकिक व्यवहारके अनुरोधसे ? अथवा
कारणके विनाशको (अभावको) कार्यसे अतिरिक्त माननेमें बाधक
होनेसे ?
इनमें प्रथम पक्ष ठीक नहीं है । क्योंकि पटकालमें भी वेमा
आदि उसके कारणकी उपलब्धि होती है । यदि कहो कि-पटकालमे
जो वेमा आदि उपलब्ध होते हैं, वे पहलेवाले नहीं हैं किन्तु दूसरे ही
हैं-तो इसमें प्रमाण क्या है ? यदि मुझसे पूछो कि-जो वेमा पट
होनेके पहले था वही पटकालमें भी है, इसमें क्या प्रमाण है ?—तो में