आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः ८९
अपि च तन्तुविनाशः सामान्यतस्तन्तुविरहस्वभावो वा स्यात्
तद्विपरीतो वा । आद्ये कथं तन्त्वन्तरम् ? न हि सामान्यतो
नीलमनीलविरुद्धस्वभावमनीलान्तरम् । द्वितीये कथं तद्विरोधी ?
न हि नीलं सामान्यतोऽपि नीलान्तरविरोधि । विशेषमात्र एवायं
विरोध १ इति चेत्, तत् किं सामान्यतोऽनुभयस्वभाव एव विनाशः ?
ओमिति ब्रुवतोऽन्यतरमुपादाय विनाशव्यवहारानुपपत्तिः । सामा-
एवं तन्तुस्वरूप विनाशको सामान्यरूपसे तन्तुविरहस्वभाववाला
मानते हो ? या तन्तुविरहस्वभाववाला नहीं मानते हो ? यदि पहला
पक्ष रखो तो वह विनाश दूसरे तन्तुका स्वरूप कैसे धारण कर लेगा ?
क्योकि सामान्यरूपसे अनीलका विरोधीस्वभाववाला नील दूसरे
अनीलका स्वरूप नहीं धारण कर लेता है । अर्थात् दूसरा अनील नहीं
बन जाता है ।
यदि दूसरा पक्ष मानो, अर्थात् वह तन्तुरूप विनाश यदि सामान्य-
रूपसे तन्तुविरहस्वभाववाला नहीं है, किन्तु तन्तुस्वभाववाला ही है,
तो फिर वह विनाश तन्तुनिवृत्तिरूप कैसे हो सकता है ? क्योंकि जैसे
सामान्यरूपसे एक नील दूसरे नीलका विरोधी नहीं होता, वैसे एक
तन्तु सामान्यरूपसे दूसरे तन्तुकी निवृत्तिरूप अर्थात् विरोधी नहीं हो
सकता है ।
यदि कहो कि—यह विरोध विशेषमात्रमे है, अर्थात् पूर्वतन्तुकी
निवृत्तिस्वरूप उत्तरतन्तु हो सकता है [जो क्षणिकत्वका साधक होगा]—
तो क्या वह पूर्वोक्त तन्तुरूप विनाश सामान्यरूपसे उक्त दोनों स्वभावोंमे
किसी स्वभावका नहीं है ? अर्थात् उक्त विनाश सामान्यरूपसे न
तन्तुका विरोधी ही है और न अविरोधी ही है ? यहाँ यदि "हाँ" कहो,
तब तो उन दोनों स्वभावोंमें किसीको लेकर सामान्यरूपसे तन्तुविनाशका
व्यवहार नहीं हो सकेगा ।
यदि कहो कि—सामान्यरूपसे विरोधी अविरोधीकी चिन्ता तब हो,
१. विशेष एवात्र विरोध--१ पु० पा०