आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवाद ९९
कुतः पुनः स्थिरसिद्धिः ? प्रत्यभिज्ञानात् क्षणिकत्वानुप-
पत्तेश्च । लक्षणाभेदेन व्यभिचारिजातीयत्वात् प्रत्यभिज्ञा न प्रमाण-
मिति चेत् , न, अवान्तरलक्षणभेदेनाव्यभिचारनियमात् । किं
तदिति चेत् , विरुद्धधर्मासंसृष्टविषयत्वम् , सिद्धं च तदत्र ।
से भी है। तथा घटध्वंस को जैसे घटसे विरोध है, वैसे ही उसके
प्रागभावसे भी विरोध है ॥
स्थिरत्वमें साधक प्रमाण
( शङ्का ) भाववस्तु स्थिर हैं, इसमें क्या प्रमाण है ?
( उत्तर ) पूर्वोक्त प्रकारसे क्षणिकत्वका सिद्ध न हो सकना और
प्रत्यभिज्ञा प्रमाण है। अर्थात् क्षणिकत्वकी असिद्धिके सम्बन्धमे पूर्वमें
कहा जा चुका है। तथा "यह वही घडा है, यह वही आदमी है, जिसे
मैंने पहले देखा था" इस प्रत्यभिज्ञासे भी सिद्ध होता है कि घटादि
पदार्थ स्थिर वस्तु हैं। यदि क्षणिक होते तो "यह वही है" ऐसी
प्रत्यभिज्ञा (स्मृतिसंश्लिष्ट अनुभूति) न होती।
( शङ्का ) तत्तांश ( वह ) और इदमांश ( यह ) का उल्लेख करने
वाला जो ज्ञान वही प्रत्यभिज्ञाका स्वरूप ( लक्षण ) है। और यह
लक्षण वहाँ भी चला जाता है, जो स्थिर नहीं है। जैसे "यह वही
दीप है" यहाँ क्रमशः क्षयको प्राप्त होनेवाली बत्ती और तेलके समान
ज्वाला भी क्षणक्षणमे बदलती रहती है, फिर भी "यह वही ज्वाला है"
ऐसा व्यवहार होता है। उसी प्रकार "यह वही घडा है" इस प्रत्य-
भिज्ञाबलसे यह नहीं सिद्ध हो सकता कि घडा स्थिर वस्तु है। अतः
स्थिरत्वसिद्धिमे प्रत्यभिज्ञा प्रमाण नहीं हो सकती है।
( उत्तर ) उपर्युक्त शङ्का ठीक नहीं है। क्योंकि यद्यपि सामान्यरूपसे
दोनों प्रत्यभिज्ञायें एक सी मालूम पडती हैं, फिर भी दोनोंके अवान्तर
लक्षणोंमें भेद होनेसे उक्त प्रत्यभिज्ञाद्वारा स्थिरत्व सिद्ध करनेमें किसी
प्रकारका व्यभिचार नहीं आ सकता है।
यदि पूछो कि - "यह वही घडा है" इस प्रत्यभिज्ञामे तथा "यह
वही दीपज्वाला है" इस प्रत्यभिज्ञामें कौन सा अवान्तरलक्षणका भेद