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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 530 में से

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पृष्ठ 143

९४ आत्मतत्त्वविवेके
अस्तु तर्हि निरुपादानत्वं बाधकं जन्म उपादानव्याप्तत्वा-
दिति चेत्, न, धर्मिग्राहकप्रमाणबाधात् भावावच्छेदाच्च व्याप्तेः ।
एतेन निरादेयत्वं १ व्याख्यातम् । गुणादिसिद्धौ चानैका-
न्तिकत्वादिति ।
रहता है, उसी प्रकार घटध्वंसके उत्पन्न होनेपर भी घटको पूर्ववत्
अवस्थित रहना चाहिये ।
( उत्तर ) यह दोष भी नहीं हो सकता । क्योंकि घटके अवस्थित
रहनेका अर्थ यदि उसके घटत्वधर्मका कायम रहना अभिप्रेत
हो तो उसे मैं भी मानता ही हूँ । क्योंकि "अभाव उत्पन्न होनेपर घट
अघटत्वको धारण कर लेता है अर्थात् घट अघट बन जाता है" यह हम
नहीं मानते ।
यदि घटके अवस्थित रहनेका अर्थ घटाभावकालमे घटकी सत्ता
मानो तो "घटसत्त्वावस्थामे घटाभाव ही नहीं पैदा हुआ" ऐसा कहा
जायगा । क्योंकि घटाभावका स्वभाव ही ऐसा है कि उस दशामें घट
अवस्थित नहीं रह सकता ।
यदि कहो कि—जो जन्मता है, उसका अवश्य कोई समवायिकारण
होता है । अभावका कोई समवायिकारण नहीं होता, इसलिये उसका
समवायिकारणरहित होना ही उसके उत्पत्तिमान् होनेमे बाधक है—
तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि यह कथन धर्मिग्राहकप्रमाणसे
बाधित है । अर्थात् जिस प्रमाणमे अभावका ग्रहण होता है, वह प्रमाण ही
इस कथनमें बाधक है । क्योंकि "इह इदानीं घटो नष्टः" इस अभाव-
ग्राहक प्रत्यक्षद्वारा ध्वंसका उत्पन्न होना ही सिद्ध होता है ।
एवं 'जो जन्मता है, उसका अवश्य कोई समवायिकारण होता है"
यह व्याप्ति भावपदार्थोंके लिये है न कि अभावके लिये भी ।
इस युक्तिसे "जो जन्मता है, वह अवश्य दूसरे कार्यका आरम्भक
होता है, अभावसे कोई कार्य उत्पन्न नहीं होता, इसलिये अभाव
उत्पत्तिमान् नहीं हो सकता है" यह बाधक भी नहीं दे सकते हो ।
१ निरादेयत्वम् = कार्यानारम्भकत्वमित्यर्थः ।