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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 145, कुल 530 में से

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पृष्ठ 145

९६ आत्मतत्त्वविवेके
वात्^हेत्वन्तरानपेक्षत्वसिद्धिः, अद्यतनघटस्य श्वस्तनकपालमाल्यै-
वार्नैकान्तिकत्वादिति¹ ।
एतेन सापेक्षत्वे व्यभिचारोऽपि स्यात्, विनाशहेतूनां प्रति-
बन्धवैकल्यसम्भवादिति परास्तम् । कपालसन्ततितुल्ययोगक्षेम-
त्वाद् विनाशस्येति ।
अस्तु तर्हि चरमः पक्षः । तथाहि—विनाशो न जायते
अभावत्वात् प्रागभाववत् । जातोऽपि वा निवर्तते जातत्वात् घट-
वदिति । नैतदेवम्, प्रागभावो जायते अभावत्वाद् विनाशि-
यदि कहो कि—भविष्यमें ध्वंस उत्पन्न होगा, इसलिए प्रतियोगीके
प्रति ध्वंस व्यापक होगा—तो ऐसा भले ही हो, किन्तु इससे यह नहीं सिद्ध
होता कि वह ध्वंस किसी अन्य हेतुकी अपेक्षा किये बिना ही उत्पन्न
हो जाता है । क्योंकि आजका घड़ा अपने आप कपालमालाका रूप
नहीं धारण कर लेता है किन्तु मुद्गरादिरूप कारणकी सहायतासे फोड़े
जानेपर ही ।
इससे यह तर्क भी खण्डित हो जाता है कि—ध्वंसको हेत्वन्तर
सापेक्ष माननेमें व्यभिचार भी हो सकता है । क्योंकि सम्भव है, हेतुओं-
के रहनेपर भी कोई प्रतिबन्धक उपस्थित हो जाय अथवा हेतुओंमे ही
किसी प्रकारकी न्यूनता आ जाय । इस प्रकार उत्पन्न होनेवाला भी
भावपदार्थ कदाचित् अविनाशी होने लगेगा— क्योंकि तुम्हारे इस तर्कपर
मैं भी कहूँगा कि “सम्भव है, विनाशके समान ही कपालसन्ततिमें भी
कोई प्रतिबन्ध हो जाय । इस प्रकार क्षण-क्षणमें विनाशशील कपाल-
सन्ततिकी उत्पत्ति नहीं सिद्ध होनेसे भावपदार्थोंका क्षणिकत्व भी
नहीं सिद्ध होगा ।
(शङ्का) तो अन्तिम पक्ष ही रहे । अर्थात् विनाश ध्रुवभावी है ।
इस प्रकार बिना हेतुकी अपेक्षा किये सभी भाववस्तुओंका अवश्यंभावी
विनाश सिद्ध होनेसे क्षणिकवाद सिद्ध हो जायगा । यहाँपर यों अनुमानना
१. अनैकान्तादिति—२ पु० ९१०