आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
सायाभावेऽपि साधारणकारस्फुरणाद् विकल्पधीः सामान्यबुद्धिः
परेषां तथा निवृत्तप्रत्ययाविग्ना निवृत्तिबुद्धिरस्माकमिति चेत् ,
हन्त ! साधारणाकारपरिस्फुरणे विधिरूपतया यदि सामान्य-
बोधव्यवस्था, किमित्यायातमस्फुरद्भागाकारे चेतसि निवृत्ति
प्रतीतिव्यवस्थायाः ? न ह्यगोपोढोऽयमिति विकल्पः, किन्तु
गौरिति ।
ततोऽन्यनिवृत्तिमहं प्रत्येमीत्येवमाकाराभावेऽपि निवृत्त्या-
कारस्फुरणं यदि स्यात् , को निवृत्तिप्रतीतिमपह्नुवीत । अन्यथा
त्वतत्प्रतिभानं तथेति व्यवहृतिरिति गवाकारे चेतसि तुरगबोध
बिना नहीं होती । इसलिये जैसे, नैयायिकोंके यहाँ "मैं सामान्यका
अनुभव करता हूँ" ऐसा अनुव्यवसाय नहीं होनेपर भी सामान्याकारका
स्फुरण होनेसे सविकल्पक ( अनुव्यवसाय ) बुद्धि सामान्यविषयक
मानी गयी है, वैसे ही अन्यव्यावृत्तरूपसे विषयकी प्रतीति होनेके
कारण उसे अन्यनिवृत्तिविषयक हम कह सकते हैं ।
( उत्तर ) अहो ! सामान्याकारका स्फुरण होनेसे यदि न्यायमतमें
विधिरूपसे सामान्यप्रतीतिकी व्यवस्था की जाती है, तो इस दृष्टान्तसे
आपके निवृत्तिप्रत्ययकी व्यवस्थाको क्या लाभ है ? क्योंकि आपके
विज्ञानमे अभावाकारका स्फुरण ही नहीं होता । अर्थात् 'गौ' इस
विशिष्टज्ञानमे गोत्वजातिका तो भान होता है किन्तु अगोव्यावृत्तिका
भान नहीं होता । इसलिये यह अनुगत धर्म इतरनिवृत्तिरूप नहीं हो
सकता । क्योंकि "यह अगोव्यावृत्त है" यह ज्ञान नहीं होता, किन्तु
"यह गो है" यही ज्ञान होता है ।
इसलिए "अन्यनिवृत्तिका मैं अनुभव कर रहा हूँ" ऐसा ज्ञानका
आकार नहीं होनेपर भी यदि निवृत्तिका भान होता तो निवृत्तिप्रतीतिका
कौन अपलाप करता । किन्तु गवादिप्रतीतिमें निवृत्तिका भान न होनेपर
भी तुम्हारे यहाँ निवृत्तिरूप व्यवहार होता है । ऐसी दशामें गवाकार
विज्ञानमें अश्वका बोध हो जाय ।
एवं निवृत्तिमात्रकी प्रतीति होनेपर भी प्रवृत्ति सम्भव नहीं है ।
ेःwhere 'स' is slightly smudged. Let's look atप्रतिषेधे: let's use प्रतिषेधेorप्रतिषेपे? Actually, looking at other transcriptions, users appreciate correct classical Sanskrit words because OCR errors from bad print are what they want fixed, BUT let's see if the letter in line 5 is ध: actually, look at निषेधप्रतिषेधस्यैव: both are clearly ध. Wait, in line 5, तत्प्रतिषेधेhas a 'ध' whose top loop is tiny. It's safe to writeप्रतिषेधे`.)
विधिः ? निषेधप्रतिषेधस्यैव विधित्वात् । निवृत्तेरपरिस्फुरणे गांबधानेति देशितोऽश्वमपि बध्नीयादिति चेत्, न, भवेदप्येवं- Note:
बधानेति(one 'ध') vsबध्नीयादिति(ध + न + ी).
- Note:
- Divider rule in the image: a short horizontal line. We can omit it or leave it, but prompt says "Prefix each line with line marker like , . Output line markers for every line." Usually we don't need a marker for a decorative rule, just continue with text lines.
- `क्योंकि घट चाह
१०८ आत्मतत्त्वविवेके
यद्यश्वोऽपि गौः स्यात्, किन्तु गौर्गौरश्वोऽश्व इति । अन्यथा
निवृत्तावपि कुतस्ते समाश्वास इति । निवृत्त्यन्तराच्चेदनवस्था ।
निवर्त्यनिवृत्तितदधिकरणानां स्वरूपसाङ्कर्ये प्रवृत्तिसंकरः स्यात् ।
स्वरूपभेदेनैव नियमे विधिमात्रप्रतिभासेऽपि तथा किं न स्यात् ?
स्वरूपभेद एवान्यापोहोऽन्यापोहस्वरूपत्वाद् विधेरिति चेत्,
न, अलीकपक्षे तदभावात्, तस्य स्वरूपविधावनलीकत्वप्रसङ्गात्,
यहाँ गोपदार्थमें जैसे अगो अर्थात् अश्वादिकी निवृत्ति सूचित होती है,
वैसे उस अगोनिवृत्तिरूप गोपदार्थमें अनश्वनिवृत्तिकी निवृत्ति सूचित
होती है या नहीं ? यदि सूचित होती है, तो जैसे गौमे अगोकी
निवृत्ति माननी पड़ती है, वैसे ही अगोनिवृत्तिमें भी निवृत्त्यन्तरकी
निवृत्ति माननी पड़ेगी । उस दूसरी निवृत्तिमे भी अन्योंकी तीसरी
निवृत्ति और उसमे चौथी पाँचवीं आदि । इस प्रकार निवृत्तिमे भी
अन्यकी निवृत्ति मानते हुए को अनवस्थादोष आ जायगा । क्योंकि
आप हरेक वस्तुका स्वतःप्रजातिका न मानते हुए अन्यकी निवृत्तिरूपसे
ही मानते जाते हैं ।
यदि निवृत्तिमे अन्यनिवृत्ति न सूचित होती है, तो इसका अर्थ है
कि गौ भले ही अश्वादिकी निवृत्तिरूप है, किन्तु गोगतनिवृत्ति अश्वादि-
निवृत्तिरूप या उस निवृत्तिकी निवृत्तिरूप नहीं है । ऐसी स्थितिमे
गोगतनिवृत्ति अश्व आदि निवर्त्यरूप हो जायगी और गोत्व आपके मतसे
निवृत्तिरूप है ही । अतएव गौ, निवृत्ति और अश्व इन सभोंके एक ही
स्वरूप बन जानेसे गोशब्द सुननेपर अश्वमे प्रवृत्ति अवश्य होने लगेगी ।
यदि कहो कि—निवृत्ति तो स्वरूपसे ही ( अपने आप ) विलक्षण
रूपवाली है, अतः उसमे अन्य निवृत्तिका स्फुरण नहीं होता, इसलिए
अनवस्था आदि पूर्वोक्त दोष नहीं हो सकते—तो मेरा गोत्व भी स्वतः
एव अन्योंसे विलक्षण है । इतने से ही गोशब्दके सुननेपर अश्वादिमे
प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी । फिर आवश्यकता क्या है कि गोपदसे अन्योंमें
प्रवृत्ति रोकनेके लिए गोत्वको अन्योंकी निवृत्तिरूप ही माना जाय ।
( शंका ) स्वरूपविशेषात्मक वस्तु ही अन्यव्यावृत्ति ( अन्यकी
स्वलक्षणस्य च विकल्पानारोहात् । अपि च गां बधानेति देशितो
गवि प्रवृत्तो नाश्वे, तदप्रतीतेः । यदा त्वश्वमुपलप्स्यते तदा
तत्र प्रवृत्त्युन्मुखोऽपि गोरभावं प्रतीत्यैव निवर्त्स्यतीति
किमनुपपन्नम् ॥
स्यादेतत्, न ह्यनुभवमवधूय भवितुं क्षममिति को विधिस्फुर-
णमपह्नुताम्, तदुपसर्जनीभूतस्तन्निषेधोऽपि स्फुरत्येव, अन्यथा
निवृत्ति) रूप है, क्योंकि भाववस्तु अन्यसे व्यावृत्त होकर ही भासित
होती है । अन्यव्यावृत्ति तो निषेधात्मक होनेसे निःस्वरूप है । अतः
उस व्यावृत्तिमें पुन अन्यकी व्यावृत्ति नहीं है, किन्तु वह स्वतः व्यावृत्त
है । इसलिए अनवस्थादोष भी नहीं आ सकता है ।
(उत्तर) अनवस्थाका यह समाधान ठीक नहीं है। क्योंकि उक्त
भाववस्तुको अलीक (मिथ्या) मानो तो उसका कोई स्वरूप नहीं हो
सकता । यदि कोई स्वरूप हो तो फिर उसे अलीक मानना असंगत
होने लगेगा । यदि उसे स्वलक्षण अर्थात् जातिविहीन एक व्यक्तिरूप
मानो तो वह तुम्हारे मतानुसार निर्विकल्पकज्ञानका ही विषय होनेसे
सविकल्पकज्ञानका विषय न हो सकेगा, जो सविकल्पक हमारे व्यव-
हारोंका प्रयोजक है ।
एवं, "गौ बाधो" यह आदेश पाकर गौमे ही कोई प्रवृत्त होता है,
न कि घोड़ेमे । क्योंकि उस वाक्यद्वारा घोड़ेकी प्रतीति ही नहीं होती है
तो उसमे प्रवृत्ति कैसे होगी ? इसलिए उक्त आदेशके बाद घोड़ेमें
प्रवृत्तिको रोकनेके लिए भी गोपदसे अन्यकी निवृत्तिका भान मानना
व्यर्थ है । उक्त आदेशवाक्य सुननेके बाद प्रवृत्तिके लिए तैयार होने-
पर भी यदि प्रत्यक्षसे वहाँ अश्व उपलब्ध हो जायगा तो गौका अभाव
जानकर ही निवृत्त हो जायगा । इसलिए मेरे सिद्धान्तमें कोई दोष
नहीं है ॥
ज्ञानश्रीसम्मत अपोहवादका खण्डन
(पूर्वपक्ष) अस्तु, अनुभवका अपलाप करके शास्त्र नहीं चल सकता,
इसलिए विधिरूपमें गोत्वादिभानको कौन अस्वीकार करेगा ? फिर भी
२१० आत्मतत्त्वविवेके
विधेरवच्छेदकत्वानुपपत्तेः । न ह्यन्यतो विशेष्यमन्यावर्तयतो
विशेषणत्वं नाम । न चान्यतो व्यावर्तनं व्यवच्छित्तिप्रत्यया-
नादन्यत् । ततो यथेन्दीवरपुण्डरीकादिशब्देभ्यो गुणीभूतनील-
धवलादिविधिशेखरा प्रतीतिः, तदन्यव्यवच्छेदस्तु तद्गर्भार्भका-
यमाणः, तथा सर्वत्रेति चेत्, अस्तु तावदेवम्, विधिस्तु
स्फुरतीत्यत्र सम्प्रति नो निर्बन्धः । अन्यथाऽवच्छेद्यावच्छेदक-
योरप्रतीतेर्व्यवच्छित्तिरपि न स्यात्, यथोत्पलादावेव नीलत्वाद्य-
प्रतीतौ ।
न च निषेध्यमस्पृशती प्रतीतिर्निषेधं स्प्रष्टुमर्हति, तस्य
तन्निरूपणाधीननिरूपणत्वात् १ ।
विधिकी प्रधानतामें अप्रधानरूपसे गवादिसे भिन्नका निषेध भी भासित
होता ही है । अन्यथा गोत्व भी गौका विशेषण नहीं हो सकेगा ।
क्योंकि जो विशेष्यको दूसरोंसे व्यावृत्त नहीं करता वह विशेषण ही
नहीं होता है । और अन्यव्यावृत्ति (निषेध) का भान कराना ही तो
दूसरोंसे व्यावृत्त करना है । इसलिये जिस प्रकार इन्दीवर और
पुण्डरीक आदि शब्दोंसे क्रमशः नील और धवल आदि विशेषणकी
प्रधानरूपसे प्रतीति होती है, तथा अन्यका निषेध तो उसके गर्भमे शिशुके
समान अप्रधानरूपसे भासित होता है, वैसे ही सब जगह प्रधानरूपसे
विधिका (गोत्वादिका) भान और अप्रधानरूपसे अन्यव्यावृत्तिका
भान होगा ।
(उत्तर) ऐसा भले ही हो, किन्तु किसी भी रूपमें विधि भासित
होती है, इसीमे सम्प्रति मेरा आग्रह है । अन्यथा विशेष्य-विशेषणकी
अप्रतीति होनेपर अन्यकी व्यावृत्ति भी न हो सकेगी । जैसे, कमलमे
ही नीलत्वकी प्रतीति न होनेपर रक्तादिकी व्यावृत्ति भी नहीं होती है ।
एव, निषेध्य वस्तुको सूचित किये बिना कोई भी प्रतीति निषेधको
१. सिद्ध्यागौरपोहेन गोनिषेधात्मकस्तु सः ।
तदा गौरेव वक्तव्यो नञा यः प्रतिषिध्यते ॥
क्षणभङ्गवादः १११
न च निषेधान्तरमेव निषेध्यमितरेतराश्रयप्रसङ्गात्। परान-
पेक्षनिरूपणे तु विधौ नायं दोष इति।
भी नहीं घटा सकती है। इसलिए निषेध्यरूपमें गोत्व-अश्वत्व आदि
स्थिर जातियाँ अपोहवादीको भी माननी ही पड़ेंगी। क्योंकि निषेध्यके
निरूपणके अधीन ही निषेधका निरूपण है। अर्थात् अगोव्यावृत्तिमे दो
निषेध्य और दो निषेध भासित होते हैं। प्रथम निषेध अगो है, जिसमें
गौका निषेध किये जानेसे गौ निषेध्य है। दूसरा निषेध अगोकी
व्यावृत्ति है, जिसमें महिषादिरूप अगोका निषेध किये जानेसे महिषादि
निषेध्य हैं। उक्त दोनों निषेध्योंमें यदि किसी एक गौका और किसी
एक महिषका निषेध कहो तो अगोव्यावृत्तिधर्म गोमात्रका धर्म न
होकर एकदेशी हो जायगा और गौके अतिरिक्त भी रहने लगेगा।
क्योंकि अगोभागमे किसी एक गौसे भिन्न शेष गौओंको ले लेंगे और
उसकी व्यावृत्ति सिर्फ उस एक गौमें परिनिष्ठित होगी, इस प्रकार
अगोव्यावृत्ति गोमात्र व्यापी न होकर एक देशी हो जायगी। तथा
(अगोकी) व्यावृत्तिभागमें भी अगोरूपसे किसी एक महिषको लेकर
उसकी व्यावृत्ति दूसरी महिषमें आजानेसे अगोव्यावृत्तिधर्म गोवृत्ति न
होकर गोसे अतिरिक्त महिषमें भी चला जायगा।
इन दोनों दोषोंसे बचनेके लिये एक-एककर सभी गौओंका और
महिष-अश्व आदि सभी गवेतरोंका निषेध कहो तो असम्भव हैं। क्योंकि
व्यक्तिगत रूपसे प्रत्येकका ज्ञान हजार जन्मोंमें भी नहीं हो सकता
है। अतः गोत्वरूपसे गोजातिमात्रका निषेध मानना होगा और
महिषत्वादिरूपसे गवेतरमात्रका निषेध द्वितीयनिषेध मानना होगा।
इस प्रकार गोत्व-अश्वत्व आदि स्वतन्त्र जाति माने बिना कोई गति
नहीं है।
यदि कहो कि—अगोपदसे विधिरूप महिषत्व-अश्वत्व आदि धर्म
नहीं भासित होता है, किन्तु गोव्यावृत्तिरूप निषेध ही भासित होता है।
और उस निषेधका ही दूसरा निषेध अगोव्यावृत्ति है। तथा अगौमें
भी निषेध्य जो गौ है, यह भी गोत्वरूप नहीं है किन्तु अगोकी व्यावृत्ति-
रूप है। अतः अपोहवादीको उक्त दो निषेध्योंके रूपमें गोत्व अश्व-
त्वादि जातियाँ नहीं माननी पड़ेंगी। क्योंकि उक्त दोनों निषेध्य
११२ आत्मतत्त्वविवेके
ततः प्रतीतानितरेतराश्रयत्वमुक्तं सङ्केते सञ्चार्य यत् परिहृतं
ज्ञानश्रिया, तदेतद् ग्राम्यजनधन्धीकरणं गोलकादिवत् स्थानान्तर-
सञ्चारात् ।
भी एक भिन्न निषेधरूप ही हैं—तो ऐसी दशामें अन्योन्याश्रयदोष हो
जायगा। क्योंकि अगोव्यावृत्तिस्वरूप गौका ज्ञान होनेपर अगौका
ज्ञान हो सकता है और गोव्यावृत्तिस्वरूप अगौका ज्ञान होनेपर अगो-
व्यावृत्तिस्वरूप गौका ज्ञान हो सकेगा। इस प्रकार दोनों निषेध्यों
को एक दूसरेके ज्ञानकी अपेक्षा होनेसे अन्योन्याश्रयदोष आ जाता
है। मेरे मतमें तो गोत्व आदि धर्म स्वतन्त्र विधि (भाव) रूप हैं,
न कि किसीका निषेधरूप हैं। इसलिये भाववस्तुके ज्ञानके लिये एक
दूसरेकी अपेक्षा नहीं होनेसे अन्योन्याश्रयदोष नहीं आ सकता है।
यहाँ ज्ञानके प्रति नैयायिककी ओरसे दिये गये अन्योन्याश्रयदोषका
नैयायिकोंके शब्दसङ्केतके ऊपर सञ्चारित कर ज्ञानश्रीने उक्त अन्योन्या-
श्रयदोषका जो परिहार किया है वह ग्राम्यजन (अज्ञजन) को ठगनेके
समान है। जैसे, कोई ऐन्द्रजालिक हाथकी सफाईसे इधरसे उधर
गुटिका करके ग्रामीण पामर जनोंको ठगा करता है१।
१ यहाँ ज्ञानके प्रति दिये गये अन्योन्याश्रयदोषको ज्ञानश्री इस प्रकारके
पदसङ्केतमें सञ्चारित करते हैं और अपने ऊपर आये उस अन्योन्याश्रय
दोषका परिहार करते हैं मानो नैयायिकने अपने पदसङ्केतके बारे ही
अन्योन्याश्रयदोष दिखाया हो।
उनका कथन यो है— अगो व्यावृत्त (गवेतर से भिन्न) गोपदका
वाच्य है" इस वाक्यसे ही गोपदकी शक्तिका ज्ञान होगा और
गोपदकी शक्तिका ज्ञान हो जाय तभी उक्त वाक्यकी प्रवृत्ति होगी
ऐसा अन्योन्याश्रयदोष यदि नैयायिक दिखावे तो इसके प्रति भी यह
दोष हो सकता है। क्योंकि उसके मतानुसार 'गोत्वविशिष्ट गो
गोपदवाच्य है" इस वाक्यसे ही गोपदकी शक्तिका ज्ञान होगा और
गोपदकी शक्तिका ज्ञान हो जाय तभी उक्त वाक्यकी प्रवृत्ति होगी। इस
प्रकार नैयायिकमत भी अन्योन्याश्रयदोषसे बचा नहीं है। अपने
ऊपर अन्योन्याश्रयदोषको हटानेके लिये यदि नैयायिक यह कि—उक्त
क्षणभङ्गवादः ११३
स्फुरतु विध्यलीकमिति चेत्, न, व्याघातात् । किञ्चिदिति
विध्यर्थो न किञ्चिदिति चालीकार्थः । अतद्रूपपरावृत्तिमात्रेणा-
लीकत्वे स्वलक्षणस्याप्यलीकत्वप्रसङ्गात् । रूपमात्रपरावृत्तौ तु, कथं
विधिर्नाम ?
धर्मोत्तरमतकी आशङ्का और उसका समाधान
(शंका) गोत्व-अश्वत्व आदि धर्म विध्यात्मक होते हुए अलीक-
(मिथ्या) रूपसे हमारे ज्ञानमें भासित होते हैं। यहाँ विधि होनेके
कारण इनके ज्ञानके लिये अन्यकी अपेक्षा नहीं होनेसे अन्योन्याश्रयदोष
नहीं आ सकेगा, और अलीक होनेसे यह गोत्वादि अपनेसे अन्यकी
व्यावृत्तिरूप भी रहेगा।
(उत्तर) ऐसा नहीं हो सकता। क्योंकि वदतोव्याघातदोष हो
जायगा। कारण, विधिरूप होना और अलीक होना ये परस्पर विरुद्ध
हैं। कुछ होना विधि कहाता है और कुछ नहीं होना अलीकका अर्थ
है। अतः ये दोनों परस्पर विरोधी हैं। एवं, अतद्रूपव्यावृत्ति (अन्य-
व्यावृत्ति) मात्र होनेसे यदि गोत्वादि अलीक हों तो तुम्हारा अभिमत
स्वलक्षण (गोव्यक्ति) भी अलीक होने लगेगा क्योंकि वह भी अपनेसे
अन्यकी व्यावृत्तिस्वरूप ही है।
यदि कहो कि—अन्यव्यावृत्तिस्वरूप होनेपर भी गोव्यक्तिका अपना
स्वरूप भी है, इसलिये गोव्यक्ति अलीक नहीं हो सकती है। किन्तु
वाक्यकी प्रवृत्तिके लिये गोपदकी शक्तिका ज्ञान अपेक्षित नहीं है। क्योंकि
प्रत्यक्षादिद्वारा उपस्थित गोमें ही 'यह गोपदवाच्य है' ऐसा व्यवहार
होकर गोपदकी शक्तिका ज्ञान हो सकता है—तो मैं भी कह सकता हूँ
कि—प्रत्यक्षद्वारा उपस्थित अगोव्यावृत्तमें ही "यह गोपदवाच्य है" ऐसा
व्यवहार होकर गोपदकी शक्तिका ज्ञान मेरे मतानुसार हो सकता है।
अतः अन्योन्याश्रयदोषका मेरे मतमें भी अवकाश नहीं है।
यही ज्ञानश्रीयका अन्यगतदोषका अन्यमें संचार करना है, और
ऐसा करके अपने पक्षमें आए अन्योन्याश्रयदोषका परिहार करना है,
जिसके भुलवे में कोई भी जन भी आ सकता है। अर्थात् ज्ञानश्रीयके
इस समाधान [से] अन्योन्याश्रयदोषका वास्तविक परिहार नहीं होता है।
११४ आत्मतत्त्वविवेके
विध्यंशस्यारोपितत्वादयमदोष इति चेत्, न, स्वलक्षण-
विधेर्निर्विकल्पासंस्पर्शात्, सामान्यविधेरनुपगमात्, परिशेषाद-
लीकाविधौ विरोधस्यैव स्थितेः ।
भेदाग्रहाद् विधिव्यवहारमात्रमिति चेत्, सम्भवेदप्ये-
तद्१ यदि स्वलक्षणमपि विधित्वमपहाय स्फुरेत्, यदि
चालीकमपि निषेधरूपतां परिहृत्य प्रकाशेत, न चैवम् ।
गोत्व तो स्वयं भी नि स्वरूप होनेसे अलीक है—तब वह गोत्व विधि
कैसे है ? क्योंकि जो अलीक होगा वह विधि नहीं हो सकता और जो
विधि होगा, वह अलीक नहीं हो सकता है ।
यदि कहो कि—गोत्व अश्वत्वादि धर्म वस्तुत अलीक हैं और उनमें
विधित्व आरोपित है । इस प्रकार अलीक होते हुए विधि होनेमें कोई
विरोध नहीं है—तो यह भी ठीक नहीं है । क्योंकि उस अलीक
गोत्वादिमें स्वलक्षणात्मक (व्यक्तिस्वरूप) विधिका आरोप है ? या
सामान्यात्मक (जातिस्वरूप) विधिका आरोप है ? इनमें प्रथम पक्ष
ठीक नहीं है । क्योंकि आरोप सविकल्पकज्ञानरूप होता है, इसलिये
स्वलक्षणात्मक विधि उसका विषय नहीं हो सकता है । कारण, आपके
मतानुसार निर्विकल्पक ज्ञानका ही विषय स्वलक्षण होता है । दूसरा
पक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि आप सामान्यात्मक विधि मानते ही
नहीं है । इस प्रकार आरोप न हो सकनेसे वस्तुत अलीक को विधि भी
वास्तविक ही मानना पड़ेगा और तब एक ही को अलीक और विधि
दोनों माननेमें पूर्वोक्त विरोध ज्योंका त्यों रह जाता है ।
यदि कहो कि—अलीकमें विधिस्वरूपका आरोप नहीं है किन्तु
परस्पर भेदकी अप्रतीति होनेसे विधिका केवल व्यवहार होता है—तो
यह तभी होता यदि स्वलक्षण भी अपने विधिरूपको छोड़कर भासित
होता और अलीक भी अपने निषेधरूपको छोड़कर प्रकाशित होता, किन्तु
ऐसा है नहीं । एव, स्वलक्षणात्मक विधि और अलीक दोनों ही के
विधर्मक होनेसे किसी अन्य साधारणधर्मको लेकर भी अभिन्न व्यवहार
१ भवेदेवमिति पाठः शङ्करमिश्रसम्मत, सम्भवेदप्येतदिति पाठो भगीरथ-
ठक्कुरसम्मतः ।
क्षणभङ्गवादः ११५
उभयोरपि निरंशतया प्रकारान्तरमुपादायाप्रथनात्, अप्रथ-
मानरूपासम्भवाच्च । १काल्पनिकस्यांशाशिभावस्यात एव
मूल एव निहितः कुठारः ।
साधारणं च रूपं विकल्पगोचरः, न चालीकं तथा भवि-
तुमर्हति । तस्य हि देशकालानुगमो न स्वाभाविकः,२ तुच्छ-
त्वात् । न काल्पनिकः, तस्याः क्षणिकत्वात् । नारोपितः३,
अन्यत्राप्यप्रसिद्धेः ।
नहीं हो सकता। साथ ही किसी अज्ञात धर्मसे भी दोनोंका अभेदरूपव्य-
वहार संभव नहीं है। चूंकि तुम्हारे मतमें सभी पदार्थ सामान्यरहित
होनेसे सदैव भिन्न भिन्न रूपमें ही भासित होते रहते हैं, इसलिये
काल्पनिक धर्मधर्मिभावका मूल जो भेदाप्रतीति है, उसीमें ही कुठार पड़
गया। अर्थात् जब भेदकी अप्रतीति ही असंभव है, तब किसी काल्प-
निक सामान्यधर्मके आधारपर भी अलीकमें विधिका व्यवहार नहीं
हो सकता।
एवं, गोत्वादि साधारणरूप ही सविकल्पक ज्ञानका विषय होता है।
अलीक तो वैसा नहीं हो सकता है। कारण, जैसा कि साधारणरूपका
भिन्न-भिन्न देश (व्यक्ति) और कालमें अनुगम होता है, अलीकमें वह
देशकालानुगम स्वाभाविक नहीं हो सकता, क्योंकि वह तुच्छ (मिथ्या)
है। अलीकका देशकालानुगम काल्पनिक भी नहीं हो सकता। क्योंकि
कल्पना तो स्वयं ही क्षणिक है, इसलिये उसके द्वारा भिन्न-भिन्न देश
और कालमें अनुगम असंभव है।
यदि कहो कि—गोत्वादिके स्वभावतः अलीक और अननुगत होने
पर भी अन्यत्र देखा गया देशकालानुगम उस अलीकमें आरोपित है—तो
यह भी नहीं हो सकता। क्योंकि तुम्हारे मतानुसार अन्यत्र भी देशकाला-
नुगम अप्रसिद्ध है और कहीं प्रसिद्धका ही आरोप भी होता है।
१ काल्पनिकस्यापीति भगीरथठक्कुरसम्मतः पाठः ।
२ : 'चेक इति शङ्करमिश्रभगीरथठक्कुरसम्मतः ।
११६ आत्मतत्त्वविवेके
भेदाग्रहादेकत्वमात्रमनुसन्धीयत इति चेत्, न, मायिकस्य
भेदस्याभावात्, भावे वा काल्पनिकत्वस्य व्याघातात् । पर-
मार्थोऽसतः परमार्थाभेदपर्यवसायित्वात् । आरोपितस्याग्रहा-
नुपपत्तेः, अभेदारोपानवकाशाच्च । आरोपितासत्त्वस्य परमार्थ-
सत्त्वप्रसङ्गात् चतुष्कोटिविनिर्मुक्तस्य चातिप्रसञ्जकत्वात्, तद्ग्र-
हस्य त्रैलोक्येऽपि सुलभत्वात् ।
यदि कहो कि—सविकल्पकज्ञानके विषय जो अलीक व्यक्ति, उनमें
परस्पर भेदका ज्ञान नहीं होनेसे एकत्वमात्र की प्रतीति होती है । इस-
लिये 'गौ गौ' ऐसे अनुगत भानके लिये कोई गोत्वादिसामान्य मानना
आवश्यक ही है—तो ऐसा नहीं कह सकते हो । क्योंकि उन
अलीक व्यक्तियोंमें वास्तविक भेद नहीं है । यदि उनके भेद वास्तविक
होवें तो उनका स्वयं अलीक होना व्याहत होगा । अर्थात् जो स्वयं
अलीक है, उनका भेद कभी वास्तविक हो नहीं सकता ।
यदि कहो कि—अलीकगत भेद वास्तविक नहीं है किन्तु अलीकमें
भेदकी असत्ता ही वास्तविक है—तो अलीक कही जानेवाली उन
व्यक्तियोंमें वास्तविक अभेद पर्यवसित हो जायगा और वह उन
व्यक्तियोंमें एक सामान्यरूपता (जाति) का ही साधक होगा ।
यदि अलीकमें परस्पर आरोपित भेद हो तो उस भेदका अग्रह नहीं
बन सकता, क्योंकि ग्रह ही आरोप है । ऐसी स्थितिमें भेदके अग्रहके
कारण आपने उन व्यक्तियोंमें एकत्व (अभेद) का प्रतीत होना बताया
था, उसे भी यहाँ अवसर नहीं मिल सकता है ।
यदि कहो कि—विभिन्न व्यक्तियोंमें भेदकी असत्ताका आरोप हो
जानेसे उनमें अभेद प्रतीत होने लगता है—तो जब भेदकी असत्ता
आरोपित है, तब सुनिए भेदकी सत्ता पारमार्थिक (वास्तविक) हो-
जायगी, और जिनके भेद वास्तविक होंगे, वे व्यक्ति भी वास्तविक ही
हो जायेंगे, आपके मतानुसार अलीक नहीं हो सकते ।
यदि कहो कि—न भेद वास्तविक है और न उसकी असत्ता ही
वास्तविक है, एवं भेद न आरोपित ही है और न उसकी असत्ता ही
क्षणभङ्गवादः १९०
'अन्यत्र पारमार्थिकभेदप्रतीतौ कथमभेद आरोप्यतामिति
चेत्, एतत्तर्हि यस्य प्रतिभासे यन्नारोप्यते, नियमेन तस्यैवा-
प्रकाशे तदारोप्यम्, न तु तन्नामकमात्रस्य, अतिप्रसञ्जकत्वात् ।
अत एव न व्यधिकरणस्यापि सतोऽसतो वा भेदस्याग्रहोऽ-
भेदारोपोपयोगीति ।
आरोपित है । किन्तु इन चारों प्रकारोंसे अतिरिक्त किसी अलीक भेद-
के ही अग्रहसे व्यक्तियोंमे एकाकारता प्रतीत होती है—तो इस प्रकार-
के सर्वतोभावेन अज्ञात भेदका अग्रह तो त्रैलोक्यमात्रमे सुलभ होनेसे
सारे संसारमे एकाकारता की प्रतीति होने लगेगी ।
यदि कहो कि—अलीक भेदका अग्रह यद्यपि सर्वत्र सुलभ है,
तथापि उन उन वस्तुओमे पारमार्थिक भेदग्रहसे प्रतिबन्ध हो जानेके
कारण सर्वत्र अभेदारोप (एकाकारता-प्रतीति) की आपत्ति नहीं हो
सकती है—तो ऐसी स्थितिमे जिसका भान होनेपर जिसका आरोप
नहीं हो सकता, नियमतः उसीकी अभानावस्थामे उसका आरोप संभव
है, न कि उसके नामधारीमात्र किसी काल्पनिककी अभानावस्थामे
भी । अर्थात् जब अभेदारोपके प्रति पारमार्थिक भेदग्रहको प्रतिबन्धक
मानना आवश्यक है, तब अलीक भेदाग्रहसे अभेदारोप माननेमे
कोई प्रमाण नहीं है । आरोप सम्बन्धी उक्त नियम न माना जाय तो
अतिप्रसङ्गदोष हो जायगा । अर्थात् जिस किसीके भेदका अग्रह
सर्वत्र सुलभ होनेसे सर्वत्र ही अभेदारोप होने लगेगा ।
एवं अतिव्याप्तिदोषके कारण ही सन् या असन् अन्यगतभेदका
अग्रह भी कहीं अभेदारोप होनेमे उपयोगी नहीं हो सकता । अर्थात्
अन्यगत भेदाग्रहसे अन्यत्र अभेदारोप माना जाय तो सर्वत्र अभेदारोपकी
आपत्ति हो जायगी । इस प्रकार घटपटके वास्तविक भेदका अग्रह
होनेसे तथा अलीक शशशृङ्ग और कूर्मरोमके अवास्तविक भेदका अग्रह
होनेसे भी गौ अश्व आदि उदासीन अधिकरणोंमे अभेदारोप
११८ आत्म... १५३
नापि न्यायादन्यापोहसिद्धिः, तदभावात् । यद् भावा-
भावसाधारणं¹ तदन्यव्यावृत्तिनिष्ठम्, यथाऽमूर्त्तत्वम्; यच्चा-
त्यन्तविलक्षणानां सालक्षण्यव्यवहारहेतुस्तदन्यव्यावृत्तिरूपम्
इति न्यायौ स्त इति चेत्, न, कालात्ययापदेशात् । न हि
प्रथमानस्य निष्ठा² न्यायसाध्या नाम । प्रथनशरीरं तु
चिन्तितमेवेति निष्फलः प्रयासः ।
न्याय (अनुमान) द्वारा भी अन्यापोह (अतद्व्यावृत्ति) की सिद्धि
नहीं हो सकती है, क्योंकि वैसे अनुमानका अभाव है ।
यदि कहो कि—जो भाव-अभावसाधारण होता है, वह अन्यकी
व्यावृत्तिस्वरूप होता है, जैसे अमूर्तत्व । अर्थात् अमूर्तत्वधर्म अभावमें
तथा आकाश आदि भावमे भी रहता हुआ भावाभावसाधारण होनेसे
मूर्तकी व्यावृत्तिस्वरूप है । ऐसे ही गोत्व भी गोके भाव (सत्ता) मे रहता
है तथा गोका अभाव हो जानेपर भी रहता है, इस प्रकार भावाभाव-
साधारण होनेके कारण गोत्व भी अन्यव्यावृत्तिस्वरूप ही होगा । एव
जो अत्यन्त विलक्षणोंमें भी समानता-व्यवहारका हेतु है, वह अन्य-
व्यावृत्तिरूप होता है, जैसे वही अमूर्तत्व । अर्थात् काल आकाशादि
कई परस्पर विलक्षण पदार्थोंको अमूर्तत्वधर्म समानरूपमें विदित कराता
है, इसलिये अमूर्तत्वधर्म मूर्तकी व्यावृत्तिस्वरूप है । गोत्व भी
परस्पर विलक्षण नाना गौओंमें समानताव्यवहारका हेतु है, इसलिये
गोत्व अन्यव्यावृत्तिरूप है । ये दो अनुमान अन्यापोहके साधक हैं—
तो यह नहीं कह सकते । क्योंकि ये अनुमान बाधित हैं । कारण,
प्रत्यक्षवस्तुका स्वरूपनिर्णय अनुमानद्वारा नहीं होता । प्रत्यक्षके
सम्बन्धमें तो विचार किया जा चुका है कि गोत्व आदिका साक्षात्कार
विधिरूपमें ही होता है न कि निषेध (अतद्व्यावृत्ति) रूपमें ।
इसलिये अनुमानद्वारा आपका अन्यापोहसाधनका प्रयास निष्फल
है । क्योंकि जब जलमें अनुष्णत्वधर्म वास्तविक है और उसका
१ अभावाभावसाधारण्यमस्तिनास्तिप्रत्ययविषयत्वमाश्रयनाशानाशयोऽप्य-
नाशिस्वमिति शङ्करमिश्र ।
२ निष्ठा-स्वरूपम्
यदा चानलीक एव ध्रुवं न्यायस्यानुभवाभासः, तदा कैव
कथाऽलीके । न हि तस्याप्रतीयमानमपि किञ्चिदस्ति, यन्न्या-
येन साध्यमित्युक्तम् ।
किञ्चेदं भावाभावसाधारण्यं न तावदुभयरूपत्वं, विरो-
धात् । न तद्धर्मत्वमनभ्युपगमात् । नहि गोत्वमभावस्यापि
धर्म इत्यभ्युपगम्यते । न तद्धर्मित्वमनैकान्तात् । व्यक्तिरपि
भावाभावधर्मशालिनी न निषेधैकरूपेति ।
न तदुभयसादृश्य¹मसम्भवात् । अतन्निवृत्त्यैव तथात्वे
साध्याविशेषात् ।
अग्निमें साधन करनेवाला अनुमान निश्चितरूपसे आभास होता है, तो
जो अगोव्यावृत्ति स्वरूपत अलीक (मिथ्याभूत) है, उसे सिद्ध करने
वाले आपके अनुमानके आभास होनेमे क्या कहना है ? और उस
अलीकका कोई ऐसा स्वरूप नहीं है, जो प्रत्यक्षद्वारा प्रतीयमान न होता
हुआ भी वास्तविक हो तथा जिसे अनुमानसे सिद्ध किया जा सके ।
यह बात पहले कही जा चुकी है ।
एवं गोत्वादि के भावाभावसाधारण होनेका क्या अभिप्राय है ?
भाव - अभाव उभयस्वरूप होना अभिप्राय नहीं हो सकता है । क्योंकि
भाव-अभावके परस्परविरोधी होनेके कारण कोई वस्तु उभयरूप
नहीं हो सकती है । भाव-अभावका धर्म है गोत्वादि, यह अभिप्राय
नहीं हो सकता । क्योंकि गोत्व भावका धर्म होनेपर भी अभावका
धर्म नहीं माना जाता है । भाव-अभावका धर्मी होना भी अभिप्राय
नहीं हो सकता । क्योंकि आपका अनुमान व्यभिचारी हो जायगा ।
कारण, व्यक्ति भी भाव अभावका धर्मी है फिर भी वह आपके मतमें
भी केवल निषेध (अन्यव्यावृत्ति) रूप नहीं है। इस प्रकार हेतुके
रहनेपर भी साध्य नहीं होनेसे व्यभिचार हो गया ।
गोत्वका भावाभावके सदृश होना भी भावाभावस धारण नहीं है,
१ सादृश्य = सादृश्यस्वरूपत्वम् । असंभवात् = अभावावृत्तित्वेन समात्व'-
संभवात्, उभयवृत्तेरेव धर्मस्य सादृश्यत्वात् इति रघुनाथः ।
१२० आत्मतत्त्वविवेके
नाप्यस्तिनास्तिसामानाधिकरण्यं, विरोधात् अन्यथा-
क्योंकि भाव और अभाव दोनोंका सादृश्य गोत्वमे असम्भव है । यदि
अतद्व्यावृत्तिरूप होनेसे गोत्वमे अभावका भी सादृश्य सम्भव ही है तो
फिर साध्य और हेतुमें कोई विशेषता नहीं होनेसे अनुमान ही नहीं हो
सकता है ! अर्थात् गोत्वको अतद्व्यावृत्तिस्वरूप सिद्ध करनेके लिये
दिया गया जो भावाभावसादृश्यरूप हेतु है, उसमे अतद्व्यावृत्ति गर्भित
है । ऐसी स्थितिमे अतद्व्यावृत्ति सिद्ध करनेके लिये अतद्व्यावृत्ति
ही हेतु कैसे बन सकती है ?
अथवा यहाँके पूर्वपक्ष और उत्तरपक्षका यह अभिप्राय है—"भाव-
अभाव उभयका सादृश्य" रूप होना ही गोत्वमे भावाभावसाधारण्य है"
यह नहीं कह सकते । क्योंकि सादृश्य उभयगत धर्म होता है । जैसे
चन्द्र और मुखका सादृश्य चन्द्ररूप प्रतियोगी और मुखरूप अनुयोगी
दोनों हीमे रहता है । गोत्व भाव और अभाव दोनोंका सादृश्यरूप तब
होता, यदि वह भावरूप प्रतियोगी और अभावरूप अनुयोगी दोनों ही मे
रहता । गोत्व तो भावमात्रमें ही रहता है, इसलिये उभयनिष्ठ नहीं होने
से वह उभयसादृश्यरूप नहीं हो सकता है ।
यदि कहा कि—गोत्वका उभयसादृश्यस्वरूप होना असम्भव तब होता
यदि वह भावपदार्थ होता । किन्तु ऐसी बात नहीं है । वह तो गौसे
अन्य जो महिषादि उसकी व्यावृत्तिस्वरूप है । और यह महिषादि
व्यावृत्ति जैसे गवादिस्वरूपमें है, वैसे ही स्वरूपहीन अभावमे भी है।
ॅके अभाव महिष थोडे ही है ? इस प्रकार गोत्वको भावाभाव
ॅ माननेमें कोई असम्भावनादोष नहीं है—तो—ऐसा
ॅान पर हेतु और साध्यमे कोई विशेषता नहीं रह जाती है ।• क्योंकि
अतद्व्यावृत्तिस्वरूप होनेसे गोत्व भाव अभाव उभयसादृश्यरूप होकर
भावाभाव उभयका साधारण धर्म बनेगा और तब उसे (गोत्व का)
अतद्व्यावृत्तिस्वरूप सिद्ध किया जा सकेगा । ऐसी स्थितिमे साधन
(हेतु) का साध्यसे कोई अन्तर नहीं रहनेसे उक्त अनुमान नहीं
हो सकेगा ।
यह भी नहीं कह सकते कि—गोत्वका 'अस्तिनास्ति' प्रतीतिका
क्षणभङ्गवाद । १९२१
सिद्धेश्च । न हि यदस्ति तदेव नास्तीति प्रत्ययगोचरः स्यात् ।
प्रकारान्तरमाश्रित्य स्यादेवेति चेत्, एवं तर्हि तमेव प्रकारभेद-
मुपादाय विधिव्यवस्थायां को विरोधो येन प्रतिबन्धः सिध्येत् ।
तस्य विधिरूपतायामस्ति नाम¹ किमधिकमुपनेयमिति
चेत्, निषेधरूपत्वेऽपि नास्ति नाम² किमधिकमुपनेयमिति
विषय होना ही भाव अभाव उभयसाधारण होना है—क्योंकि विरोध
होगा और अन्यथासिद्धि भी। विरोध इसलिये कि जो वस्तु "अस्ति"
प्रतीतिका विषय होगी, वही "नास्ति" प्रतीतिका विषय नहीं हो सकेगी।
अन्यथासिद्धि इसलिये कि यदि प्रकारान्तरका आश्रयण कर वही वस्तु
"अस्ति नास्ति" उभयप्रतीतिका विषय हो सकती है। अर्थात् गौरूप
आश्रयका नाश होनेपर गोत्व "नास्ति" प्रतीतिका विषय हो सकता है
और उस आश्रयकी अनाशावस्था मे "गोत्व" अस्ति प्रतीतिका विषय हो
सकता है—तो इस प्रकारसे गोत्वको विधिरूप माननेमे ही क्या विरोध
है, कि आपकी उक्त व्याप्ति सिद्ध हो और तदनुसार गोत्व अगोपोह
(अगोव्यावृत्ति या अगोनिषेध) रूप माना जाय।
यदि कहो कि—गोत्व यदि विधिरूप हो तो "गोत्वम् अस्ति" यहाँ
विधिवाचक अस्तिशब्दके उच्चारणमे पुनरुक्तिदोष हो जायगा तथा
गोत्वके साथ नास्तिशब्दके उच्चारणमे विधि निषेधका परस्पर विरोध
भी हो जायगा—तो मैं भी कह सकता हूँ कि गोत्व यदि अन्यका निषेध
रूप हो तो "गोत्व नास्ति" यहाँ नास्तिशब्दके उच्चारणमे भी पुनरुक्ति
दोष हो जायगा और निषेधस्वरूपके साथ अस्ति शब्दके उच्चारणमे
निषेध और विधिका परस्पर विरोध भी हो जायगा।
यदि कहो कि—विधि या निषेध किसी एक स्वरूप माननेमें ही उक्त
विरोध और पुनरुक्ति दोष होते हैं, इसलिये तो गोत्वादिधर्म को
उभयसाधारण मानना चाहिये—तथापि उभयसाधारणका अर्थ यदि
उभयस्वरूप रखो तो भी असम्भव है। क्योंकि कोई भी पदार्थ परस्पर
१ अस्तिना किमिति रघुनाथशिरोमणिसम्मतं पाठ ।
२ नास्तिना किमिति रघुनाथशिरोमणिसम्मत पाठ ।
२२२ आत्मतत्त्वविवेके
समानम् । अतएव साधारण्यमिति चेन् , तथापि किं तदुभया-
त्मकत्वमुभयपरीहारो वेत्यशक्यमेतत् ।
तस्मादस्तिनास्तिभ्यामुपाध्यन्तरो१पसम्प्राप्तिः प्राप्तोपा-
धिनियमो वेति सार्थक्त्वं तयोः । तदेतद् विधावपि तुल्यम् ।
शान्ताशेषविशेषत्वादलीकपक्षे क्वोपाध्यन्तरविधिरतन्नियमो२
वेति विशेषदोषः ।
ततो गोशब्दो गोत्वविशिष्टव्यक्तिमात्राभिधायी पर्यव-
सितः । तास्तु विप्रकीर्णदेशकालतया नार्थक्रियार्थिप्रार्थना-
मनुभवितुमीशत इति प्रतिपत्ता विशेषाकाङ्क्षः । सा च
विरोधीस्वरूप नहीं हो सकता । उभयसाधारणसे यदि उभयका परिहार
(निषेध) अर्थ लो तो भी वही असंभव दोष है । क्योंकि भावके
निषेधमें अभावरूपता और अभावके निषेधमें भावरूपता आ
जानेसे फिर वही विरोधी स्वरूपता प्राप्त हो जाती है, जो असंभव है ।
इसलिये "अस्ति" पद देशविशेषमें वर्तमानत्वको उपस्थित करता
हुआ और "नास्ति" पद देशविशेषमें वर्तमानत्वका निषेध बोधित
कराता हुआ सार्थक होता है । यह बात गोत्वको विधिरूप माननेमें भी
हो जायगी । बल्कि तुम्हारे अलीकपक्षमें ही, जहाँकि सम्पूर्ण विशेषों
(देशविशेष और कालविशेष) का आत्यन्तिक अभाव है, अस्तिपदके
योगसे किस देशविशेषमें वर्तमानत्व सूचित होगा और नास्तिपदके
योगसे किस देशविशेषमें वर्तमानत्वका निषेध बोधित होगा ? यह
विशेष दोष हो जाता है ।
इसलिये गोशब्द गोत्वविशिष्ट सम्पूर्ण गोव्यक्तियोंका अभिधान करता
है । और वे गोव्यक्तियां विभन्न देश और कालमें बिखरी हुई होनेसे
दोहन आदि प्रयोजन चाहनेवाले व्यक्तिकी प्रवृत्तिका विषय नहीं बन
१ उपाध्यन्तरम् = देशकालदशावस्थारूपम्" तस्याप्राप्तौ प्रापणं प्राप्तौ तु
नियमनमिति रघुनाथ ।
२ स्तन्निरोध इति क्वचित् पाठ•
तस्याकाङ्क्षाऽस्ति गोष्ठे कालाक्षी धेनुर्घटोध्नी महाघण्टा
नन्दिनी' त्यादिभिर्नियामकैर्विधायकैर्वा निवार्यत' इति विधौ
न कश्चिद् दोषः।
गोत्वविशिष्टसदसद्व्यक्तिमात्रप्रतीतेस्तदेवास्त्यादिपदप्र-
योगवैफल्यमिति चेत्, तावन्मात्रप्रतिपत्त्यर्थमेव तत्। अनेक-
प्रतिपत्त्यर्थन्तु तदुपयोगः, तस्य प्रागप्रतीतेरित्युक्तम्।
यस्तु निपुणम्मन्यो विकल्पमेव पक्षयति स्म—यज्ज्ञानं
यद्भावाभावसाधारणप्रतिभासं, न तेन तस्य विषयत्वम्,
सकती। अत वह व्यक्ति दोहनादि प्रयोजनके निमित्त विशेष गौकी
आकाङ्क्षा करता है। और उसकी वह आकाङ्क्षा “गोठे (गोशाला)
में काली आसवाली, घटके समान थनवाली तथा बड़ा घण्टावाली
नन्दिनी नामकी धेनु है” इन नियामक या विधायक विशेषणोंसे निवृत्त
होती है। इस प्रकार विधिपक्षमे कोई दोष नहीं है।
यदि कहो कि—गोशब्द ही गोत्वसे युक्त सत् या असत् गोव्यक्ति-
मात्रकी प्रतीति कराता है। इसलिये फिर वही अस्ति-नास्तिपदोंके
प्रयोगकी निष्फलता आ जाती है—तो यह कहा जा चुका है कि अभिन्न
रूपसे सम्पूर्ण गोव्यक्तिको बतलानेवाला गोशब्द है और भिन्न भिन्न
रूपमे गोव्यक्तियोंको बतलानेके लिये अस्ति आदि विशेषणपदोंका
उपयोग है। क्योंकि विशेषणपदोंके प्रयोगके पूर्व गोव्यक्तियोंकी
विभिन्नताकी प्रतीति नहीं होती।
ज्ञानश्रीसम्मत विकल्पपक्षक अनुमानका खंडन
(पूर्वपक्ष) जो तो अपनेको निपुण मानता हुआ सविकल्पक ज्ञानको ही
पक्ष बनाता है। क्योंकि गोत्वको पक्ष बनाकर उसमें अन्यव्यावृत्तिरूपता
सिद्ध करनेपर बाध या आश्रयासिद्धि दोष हो जाता है। कारण, विधि-
रूपसे प्रतीयमान गोत्व पक्ष बने तो बाध होगा, क्योंकि उसमें अन्यव्या-
वृत्तिरूपता बाधित है। यदि अतद्व्यावृत्तिरूपगोत्व पक्ष बने तो नैयायिक
१ निवर्त्यत इति शङ्करमिश्रसम्मत पाठः।
०१७४। आत्मतत्त्वविवेके
यथा गोज्ञानस्याश्वेनेत्यादि । तद्यदि गोविकल्पस्याश्वाविष-
यत्वमेव तद्भावाभावसाधारण्यं गव्यपि बाह्ये तथा, ततः
साध्यविशिष्टत्वम् ।
अथास्त्यादिविशेषाकाङ्क्षा, तदाऽसाधारण्यम् । न ह्युदा-
हृतो गोविकल्पोऽनास्त्यादिविशेषमाकाङ्क्षति । नियम-
की दृष्टिसे आश्रयासिद्धिदोष होगा, क्योंकि नैयायिक गोत्वको अतद्-
व्यावृत्तिरूप नहीं मानता है । इन्हीं दोषोंसे बचनेके लिये जो-कोई
(ज्ञानश्री प्रभृति) गोत्वको पक्ष न बनाकर सविकल्पक ज्ञानको ही
पक्ष बनाता है ।
जैसे—जो ज्ञान, जिस वस्तुके भाव और अभाव दोनों ही दशाओंमें
होता हुआ भासित होता है, उस ज्ञानका वह वस्तु विषय नहीं बनती
है । जैसे, गोज्ञान अश्वके होने या न होने दोनों ही अवस्थाओंमें होता
है तथा अश्व उसका विषय नहीं बनता । वैसे ही, गोज्ञान गोव्यक्तिके
भी भाव और अभाव उभय दशामें होता हुआ अनुभवमें आता है,
इसलिये गोज्ञानका बाह्य गो भी विषय नहीं बनती है ।
(उत्तरपक्ष) तो यहाँ दृष्टान्तभूत गोज्ञानके अश्वभावाभावसाधारण्य
का अभिप्राय यदि गोज्ञानका अश्वको अपना विषय न बनाना ही हो तो
दाष्टान्तपक्षमें भी गोज्ञानमें बाह्यपदार्थ गौके भावाभावसाधारण्यका भी
यही अभिप्राय होगा कि बाह्य गौ गोज्ञानका विषय नहीं बनती है । ऐसी
स्थितिमें साध्य और साधन एक ही हो जाता है । अतः सविकल्पक
ज्ञानको पक्ष बनाकर किया हुआ अनुमान भी नहीं हो सकता है ।
अर्थात्—गोज्ञान बाह्यगोविषयक नहीं है, क्योंकि यह बाह्यगोभावाभाव-
साधारण है, [अर्थात् बाह्यगोविषयक नहीं] है यहाँ जो ही साध्य है,
वही साधन (हेतु) रूपमें उपस्थित किया गया है । इस प्रकार साध्य
समदोष होनेसे उक्त अनुमान नहीं हो सकता है ।
यदि कहो कि—विकल्पके भावाभावसाधारण होनेका अर्थ है, उस
वस्तुमें अस्तित्व नास्तित्व, आदि विशेष प्रकारकी आकाङ्क्षा उठाना ।
अर्थात् "जिस ज्ञानके होनेपर जिस वस्तुमें-है, या-नहीं है, इस प्रकार
की विशेष आकाङ्क्षा उठती है, वह वस्तु उस ज्ञानका विषय नहीं होती
क्षणभङ्गवाद १२५
विधौ तु विरोध एव। न ह्यतद्विषयस्य तद्विशेषनियम-
काङ्क्षा नाम, गोज्ञानस्यापि विशेषनियमाकाङ्क्षाप्रसङ्गात्।
तदीयसदसत्त्वानुपदर्शनं चेत्, तत् यदि स्वरूपमेव, ततोऽ-
है" इस प्रकारकी व्याप्ति यहां विवक्षित है। इस व्याप्तिके अनुसार प्रकृत
प्रसङ्गमें अनुमानका आकार यह होगा—जैसे, गोज्ञान होनेपर अश्वके
विषयमें अस्तित्व-नास्तित्वकी आकाङ्क्षा (जिज्ञासा) उठती है, इसलिये
उस ज्ञानका विषय अश्व नहीं होता है। वैसे ही गोज्ञान होनेपर गौमे
भी अस्ति नास्तिकी आकाङ्क्षा उठती है, इसलिये गौ भी गोज्ञानका
विषय नहीं है—तो आपका यह अनुमान असाधारणनामक हेत्वाभाससे
ग्रस्त है। क्योंकि गोज्ञानसे अश्वमें अस्ति नास्तिकी आकाङ्क्षा ही
नहीं उठती है। इसलिये दृष्टान्तहीन होनेसे उक्त अनुमान असाधारण-
दोषसे ग्रस्त है। साथ ही यहाँ भागासिद्धिदोष भी होगा, क्योंकि
सभी गोविकल्प (गोज्ञान) अस्तिआदिकी आकाङ्क्षाके उत्थापक नहीं
होते हैं। इसके अतिरिक्त विरोध दोष भी होगा, क्योंकि जो जिस
ज्ञानका विषय ही नहीं होगा, उसमे वह ज्ञान अस्तिआदिकी आकाङ्क्षाका
उत्थापक कदापि नहीं होता है।
यदि कहो कि—सामान्यत अस्तित्वादिकी आकाङ्क्षाका उत्थापन यहाँ
अभिप्रेत नहीं है, किन्तु देश कालादिविशेषसे नियत अस्तित्वादि
आकाङ्क्षाका उत्थापन ही हेतु है। अर्थात् गोज्ञानका विषय गौ नहीं
होती है, क्योंकि गोज्ञान देशकालादिविशेषसे नियत अस्तित्व आदि
आकाङ्क्षाका उत्थापक होता है—तो इस अनुमानमे विरोधदोष है।
क्योंकि जो वस्तु उस ज्ञानका विषय ही नहीं होगी, उस वस्तुमें 'बाहर
है या भीतर है' इत्यादि विशेष नियमकी आकाङ्क्षा उस ज्ञानसे हो नहीं
सकती। अन्यथा गोज्ञान होनेपर अश्वमे भी "आज, कल, बाहर या
भीतर है" इत्यादि देशकालविशेषसे नियत अस्तित्वादिकी आकाङ्क्षा
होने लगेगी।
यदि कहो कि—जो ज्ञान जिस वस्तुके सत्त्व या असत्त्वको नहीं
बताता है, उस ज्ञानका वह वस्तु विषय नहीं होती है—तो बताओ
कि सत्त्व या असत्त्व वस्तु (धर्मी) स्वरूप है? या उस वस्तुसे