आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 147, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें९८ आत्मतत्त्वविवेके
अथोन्मज्जने को दोष इति चेत्, कालविच्छेदप्रत्ययस्यानु-
भयात्मकत्वप्रसङ्गः । अयथार्थत्वे तस्य द्विचन्द्रदर्शनकाले
चन्द्रदेशाविच्छेदवत् तद्वतः कालाविच्छेदे भावस्य प्राक्प्रध्वंससह-
वृत्तित्वेनाविरोधप्रसङ्गात् । यथार्थत्वे तु भेदस्थितौ तदुन्म-
ज्जनानुपपत्तेः ।
एतेन प्रागभावे प्रध्वंसोन्मज्जनं तत्काले च प्रागभावो-
न्मज्जनमपास्तम् । भाववदभावयोरपि उभयविरोधिस्वभाव-
त्वादिति ॥
ध्वस्त हुए घडेका भी पुन आविर्भाव मानना पड़ेगा । इस प्रकारके
प्रतिकूल तर्क भी उक्त अनुमानके बाधक हैं ।
यदि कहो कि—उस कालमें भी घटोन्मज्जन ( घटाविर्भाव ) मे
दोष ही क्या है ? तो यही है कि ध्वसदशामें या प्रागभावदशामें
“इदानीं घटो नास्ति यह जो कालके साथ घटकी विच्छेदप्रतीति होती
है उसे न अयथार्थ कह सकते और न यथार्थ कह सकते हो । क्योंकि
यदि अयथार्थ कहो तो, जिस प्रकार द्विचन्द्रदर्शनकालगे मध्यभागमे
होने वाली चन्द्रमाकी विच्छेदप्रतीतिका अयथार्थ होनेसे मध्यभागमें भी
चन्द्रमाकी सत्तामे कोई बाधा नहीं होती है, वैसे ही जहाँ घटका
ध्वस हुआ है, यहाँ भी उस कालके साथ घटका विच्छेद नहीं होनेसे
सभी भावपदार्थ अपने प्रागभाव और ध्वसके साथ रहने लगेंगे और
उनका परस्परका विरोध समाप्त हो जायगा ।
उक्त विच्छेदप्रतीतिको यदि यथार्थ कहो तो ध्वस और प्रागभावके
साथ घटका कालकृत और देशकृत विरोध स्थिर रहेगा । अत ध्वस और
प्रागभावके कालमें तुम्हारे द्वारा स्वीकृत घटोन्मज्जन (पुन घटाविर्भावका)
का प्रसङ्ग नहीं बन सकेगा ।
इसी प्रकार घटप्रागभावकालमे घटध्वसका उमज्जन ( आविर्भाव )
तथा घटध्वसकालमे घटप्रागभावका भी उमज्जन खण्डित समझना
चाहिये । क्योंकि प्रागभावको जैसे घटसे विरोध है, वैसे ही घटध्वस