सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 137

८ आत्मतत्त्वविवेके
भाविति चेत्, न तावज्जातिकृतमन्यत्वमुपलभ्यते¹। व्यक्तिकृतं तु
नाद्यापि सिध्यति । अतएव² तत्सिद्धावितरेतराश्रयत्वम्³ । तथापि
यद्येवं स्यात् कीदृशो दोष इति चेत्, न कश्चित्, केवलं प्रमाणा-
भावो व्यवहाराननुरोधश्च । तदसिद्धावपि सिध्यतस्तस्य निमित्ता-
न्तरापेक्षणात् ।
स्वरूप है, उसीमें पहले पट कैसे था ? अथवा तुम्हारे मतानुसार
वही तन्तुमाला पहले पटस्वरूप कैसे थी ?
यदि कहो कि-पटनाशकालीन तन्तुमाला पटकालीन तन्तुमालासे
भिन्न है, इसलिए पूर्व तन्तुमाला पटरूप होगी और उत्तर तन्तुमाला पट-
नाशरूप होगी, इसमें कोई विरोध नहीं है-तो यह भी ठीक नहीं है।
क्योंकि पूर्व और उत्तर तन्तुमालाओंमें जातिकृत भेदकी उपलब्धि नहीं
होती और व्यक्तिकृत भेद तो बिना क्षणभंग सिद्ध हुए हो नहीं सकता,
जो अभीतक सिद्ध नहीं हो सका है । इसीलिये यहाँ अन्योन्याश्रयदोष
भी हो जाता है । क्योंकि पूर्व तन्तुमालासे उत्तर तन्तुमाला भिन्न
सिद्ध हो तो उत्तर तन्तुमाला पटनिवृत्तिरूप सिद्ध हो और उत्तर तन्तु
मालाके पटनिवृत्तिस्वरूप सिद्ध होनेपर ही वह (उत्तर तन्तुमाला) पट-
स्वरूप पूर्व तन्तुमालासे भिन्न सिद्ध हो सकती है ।
(शङ्का) फिर भी उत्तर तन्तुमालारूप अग्रिम कार्यको ही पटात्मक
पूर्व तन्तुमालास्वरूप कारणका विनाशरूप माननेमें क्या हानि है ?
(उत्तर) कोई हानि नहीं है । केवल इतनी बात है कि प्रमाणका
अभाव है और ऐसा व्यवहार भी नहीं होता । जहाँपर तन्तुनाशसे ही
पट नाश हुआ हो, वहाँपर पटनाश तन्तुमालास्वरूप नहीं सिद्ध हो
सकता, क्योंकि तन्तुमाला भी वहाँ नहीं है । किंतु यहाँपर पटध्वंसरूप
निमित्तान्तरसे ही पटनाशका व्यवहार तुम भी मानोगे ।
१. मान्यदुपलभ्यते—१ पु० पा० ।
२. इत एव—पा० क्वचित् । टीकाकारसम्मततोऽपि ।
३—पूर्वापरतन्तुमाल्योर्भेदे सति निवृत्तिरूपत्व निवृत्तिरूपतायाञ्च सत्यां
भेद इत्य यान्याश्रय इति शङ्करमिश्रः ।