आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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विकल्पा हि साधारणं रूपमनुपस्थापयन्तो न तृणकुब्जीकरणेऽपि
समर्था इत्यविवादम्, बाह्यार्थस्थितौ स्थिरास्थिरविचारात् ॥
तच्चालीकं वा, आकारो वा, बाह्यं वस्तु वेति त्रयः पक्षाः ।
व्यवहार होता है। अन्यथा प्रत्येक गोव्यक्तिके लिए भिन्न भिन्न प्रकारका
व्यवहार होता।
एव विभिन्नकालीन विभिन्नदेशस्थ गोओंमें यदि अनुगत एक (गोत्व
आदि) साधारण (स्थिर) धर्म न माना जाय तो शब्द लिङ्ग और
विकल्प एक तृण भी टेढा नहीं कर सकते, यह निर्विवाद है। अर्थात्
उनसे होनेवाला सामान्यविषयक ज्ञान भी नहीं हो सकेगा। यह
साधारणधर्म बौद्धद्वारा स्वीकृत विज्ञान ही है, ऐसा नहीं कहा जा
सकता। क्योंकि, विज्ञानातिरिक्त बाह्यवस्तु मानकर ही उसके स्थिरत्व
और क्षणिकत्वका विचार आरम्भ किया गया है। अर्थात् अनुगत धर्मके
बिना शब्दका अर्थके साथ सम्बन्धग्रहण नहीं हो सकता और सम्बन्ध
ग्रहण हुए बिना वाक्यार्थज्ञान नहीं हो सकता।
इसी प्रकार साधारण धर्मके बिना लिङ्ग (हेतु) और साध्यकी
परस्पर व्याप्तिका ज्ञान नहीं हो सकता और व्याप्तिज्ञानके अभावमे
साध्यका अनुमान नहीं हो सकता है।
एव "यह मेरे इष्टका साधन है" इस प्रकारके इष्टसाधनताज्ञानरूप
सविकल्पकज्ञान होनेपर प्रवृत्ति होती है, और प्रवृत्तिका विषय कोई
अभिनव वस्तु ही हुआ करती है, जिसमे प्रवृत्तिके पहले इष्टसाधनताका
प्रत्यक्ष होना अशक्य है। अतः पूर्वमे कभी जिसे इष्ट सिद्ध करते हुए
प्रत्यक्ष कर चुके हैं, उसी जातिका होनेके कारण अभिनव वस्तुमे भी
अनुमानसे ही इष्टसाधनताका ज्ञान करके उसे प्राप्त करनेके लिए हम
प्रवृत्त होते हैं। इस प्रकार स्थिरजाति माने बिना इष्टसाधनताज्ञानरूप
सविकल्पकज्ञानसे होनेवाली प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी। अतः शब्द, लिङ्ग
और सविकल्पकका सार्थकता तभी है, जब कि साधारण अनुगत स्थिर
जाति मानी जाय। ऐसी स्थितिमे क्षणिकत्व वहीं समाप्त हो जाता है॥
कीर्ति दिङ्नागसम्मत अलीकरूप निराकरण
'गौ गौ' ऐसी एकाकार प्रतीति कराने वाला यह अनुगतरूप अलीक