सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 154

क्षणभङ्गवादः १०५
तत्र न प्रथमः पक्षः, तद्धि न तावदनुभवादेव तथा व्यवस्थाप्यं
तस्यालीकत्वानुल्लेखात्, तथात्वे वा प्रवृत्तिविरोधात् । न
ह्यलीकमेव तत् इत्यनुभूयाप्यर्थक्रियार्थी प्रवर्तते । अन्यनिवृत्ति-
स्फुरणान्नैव दोष इति चेत्, एतदेवासत्, विधिरूपस्यैव स्फुरणात् ।
न हि शब्दलिङ्गाभ्यामिह महीधरोद्देशेऽनग्निर्न भवतीति स्फुरण-
मपि त्वग्निरस्तीति ।
यद्यपि निवृत्तिमहं प्रत्येमीति न विकल्पः, तथापि निवृत्त-
पदार्थोल्लेख एव निवृत्त्युल्लेखः । न ह्यन्तर्भावितविशेषणा
विशिष्टप्रतीतिर्नाम । ततो यथा सामान्यमहं प्रत्येमीत्यनुव्यव-
( मिथ्या ) है ? या ज्ञानका आकारविशेष है ? अथवा बाह्यवस्तु है ?
ये तीन पक्ष हो सकते हैं । इनमें प्रथमपक्ष ठीक नहीं है । क्योंकि
उस अनुगतरूपको अनुभवके बलसे ही अलीक सिद्ध किया जा सकता
है, किन्तु अनुभवद्वारा उसका अलीकत्व सूचित नहीं होता है । यदि
अनुभव अनुगतरूपके साथ ही उसके अलीकत्वको भी सूचित करे तो
प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी । क्योंकि "वह अलीक ही है" ऐसा अनुभव
करता हुआ भी कोई अर्थक्रियाभिलाषी उसमे प्रवृत्त नहीं होता ।
यदि कहो कि- अनुगत धर्म ( गोत्वादि ) का अन्य ( अश्वत्वादि )
की निवृत्तिरूपसे स्फुरण होना ही यहाँ अलीकत्व है । इसलिये गवादि-
विषयक प्रवृत्तिमें कोई बाधा नहीं है-तो फिर यही असंगत है । क्यों कि
विषयकी प्रतीति विधिरूपसे होती है न कि अन्यकी निवृत्तिरूपसे ।
कारण, "पर्वतो अग्निमान्" इस शब्दद्वारा या धूमप्रत्यक्षद्वारा पर्वत-
प्रदेशमें "अनग्नि नहीं है" यह स्फुरण नहीं होता, किन्तु "अग्नि है"
यही स्फुरण होता है ।
( शङ्का ) यद्यपि "मैं अन्यनिवृत्तिका अनुभव करता हूँ" ऐसा
अनुव्यवसाय ( ज्ञानविषयक ज्ञान ) नहीं होता, फिर भी निवृत्तिपदार्थ
भासित हो ही जाता है । और इसे ही अनुभवद्वारा निवृत्तिश उल्लेख
हुआ कहेंगे । क्योंकि कोई भी विशिष्टबुद्धि विशेषणका अन्तर्भाव किये