आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 150, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः
धर्मसंसर्गमीक्षामहे, अथ च प्रत्यभिज्ञानमवधूय तत्र भेद एव पदं
धत्त इति चेन्, कस्य प्रमाणस्य बलेन ? आश्रयनाशस्य हुताशन-
नाशहेतुत्वेन विज्ञातत्वात्, तस्य चात्र प्रतिक्षणमुपलब्धेः । वर्त्ति-
तैल योरुत्तरोत्तरमपचीयमानत्वात् पूर्वस्य नाश उत्तरोत्पादश्च
न्यायसिद्ध इति चेत्, नन्वयं प्रत्यनीकधर्मसंसर्ग एव, नष्टत्वानष्ट-
त्वयोराश्रयनाशानाशयोर्वा एकत्र तेजस्यनुपपत्तेः ।
सोऽयं शतं शिरश्छेदेऽपि न ददाति, विंशतिपञ्चकं तु
प्रयच्छतीति किमत्र ब्रूमः ।
भविष्यति तर्हीहापि विरुद्धधर्मसंसर्गो दुरूह इति चेत्, अथ न
एवायं स्फटिक इत्यत्र प्रमाणप्रतीतसंसर्गाणां विरोध आशङ्क्यते ?
वही दीपकलिका है" इस प्रत्यभिज्ञा की अवहेलना कर भेद ही अपना
पैर जमा लेता है । इसलिये "जहाँ भेद है, वहाँ अवश्य विरुद्ध धर्मोंका
संसर्ग है" यह नियम नहीं हो सकता है—ठीक नहीं है । क्योंकि
दीप कलियोंमे विरुद्धधर्मोंका संसर्ग नहीं दीखनेपर भी किस प्रमाणसे
भिन्नता मानते हो ?
यदि—आश्रयका नाश अग्निके नाशका हेतु है, यह बात प्रसिद्ध
है । और वह आश्रयनाश यहाँ प्रतिक्षण मालूम होता है । इस प्रकार
बत्ती और तैलके उत्तरोत्तर क्षीण हुए जानेसे पूर्वज्वालाका नाश और
उत्तरज्वालाकी उत्पत्ति अनुमान सिद्ध है—ऐसा कहो, तब तो यहाँ विरुद्ध
धर्मोंका संसर्ग ही सिद्ध हुआ । और इसी कारण दीपकलियाँ भी भिन्न भिन्न
सिद्ध हुईं । क्योंकि एक ही ज्वालामे नष्टत्व और अनष्टत्व अथवा उसके
आश्रयका नाश और अनाश साथ-साथ नहीं बन सकते हैं । इस प्रकार
यह प्रतिपक्षी सिर कट जानेपर भी सौ नहीं देता किन्तु अपने आप पाँच
बीस देता है, इसमे हम क्या कहें । अर्थात् दीपकलिकामे सीधे विरुद्ध
धर्मों के संसर्गको नहीं स्वीकार करता हुआ भी प्रकारान्तरसे उसे ही
स्वीकार करता है ।
( शङ्का ) वैसे ही यथार्थ प्रत्यभिज्ञास्थलमें भी घटादिमे विरुद्ध
धर्मोंका संसर्ग संभव है, जो मालूम नहीं देता है ।