आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतत्प्रतीतविरोधानां संसर्गः ? अथाप्रतीतस्वरूपविरोधसंसर्गा एव
केचिद् विरुद्धतया ? संसृष्टतया वेति ?
न प्रथमः, प्रागेव निराकृतत्वात् । न द्वितीयः, अयोग्याना-
मनुपलम्भबाधितत्वात् । योग्यानामपि कारणादिव्याप्यव्यापक-
विगमविलोचनव्यावर्तितत्वात् । न तृतीयः, तस्यातिप्रसञ्ज-
कतया सर्वत्रैकत्वोच्छेदप्रसङ्गादिति ।
एतेन प्रत्यभिज्ञानादेव लक्षणभागमाकृष्यानुमानेन स्थैर्य-
(उत्तर) तो यहाँ मैं पूछता हूँ कि क्या “यह वही स्फटिक है” यहाँपर
प्रमाणद्वारा जिनका एकत्र संसर्ग प्रतीत है, ऐसे सत्त्व द्रव्यत्व और
स्फटिकत्व धर्मों के विरोधकी संभावना है ? अथवा जिनका प्रमाण-
द्वारा विरोध प्रतीत है, ऐसे गोत्व-अश्वत्व आदि धर्मों के संसर्गकी
संभावना है अथवा ? जिनका स्वरूप, विरोध और संसर्ग तीनों
अज्ञात हैं, ऐसे धर्मोंका विरुद्धरूपमे होना या उनका संसृष्टरूपमे होना
संभावित है ?
इनमें प्रथम आशंकाका निराकरण पूर्वमें ही हो चुका है, जहाँ एक
ही बीजमें सामर्थ्य, असामर्थ्य, अङ्कुरकरण और अङ्कुराकरण आदिका
अविरोधीरूपम रहना सिद्ध किया गया है ।
द्वितीय आशंका (संभावना) भी नहीं हो सकती है । क्योंकि जो
विरोधी धर्म प्रत्यक्षके अयोग्य हैं, उनके संसर्गका भान सर्वथा असंभव
है । तथा प्रत्यक्षके योग्य जो गोत्व अश्वत्व आदि विरोधी धर्म हैं,
उनका भी परस्परमें कार्यकारणभाव या व्याप्यव्यापकभाव आदि न
होनेसे एकत्र संसर्ग असंभव है ।
तीसरा पक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि उसके अतिव्याप्तिदोषसे
ग्रस्त होनेके कारण सर्वत्र एकत्वका उच्छेद होने लगेगा, या सर्वत्र एकत्व
ही होने लगेगा । अर्थात् ज्ञात अज्ञात सभी धर्म या तो परस्परमे विरोधी
बन जायेंगे या अविरोधी ही बन जायेंगे ।
इस प्रकार विरुद्धधर्मसंसृष्टविषयकज्ञानस्वरूप जो यथार्थ प्रत्यभि-