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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 142, कुल 530 में से

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पृष्ठ 142

क्षणभङ्गवादः ९३
भिन्नाभावजन्मनि घटताद्रूप्यक्त्यं दोष इति चेत्, न, घट-
ताद्रूप्यक्त्यं हि यदि घटत्वमेव, धभिमतमेव तत् । नह्यभाव-
जन्मनि घटोऽघटतामुपैतीत्यभ्युपगच्छामः । तत्कालसत्त्वं चेत्,
न तर्ह्यभावो जातः, कालान्तरे घटानवस्थानस्वभाव एव हि
तदभावः ।
भी है । अतः घटसे युक्त भी उस दूसरे भूतलमें घटाभावका व्यवहार
होना चाहिये ।
उपर्युक्त दोनों व्याख्यानोंके अनुसार यही सिद्ध होता है कि
भूतलमें रहनेवाला घटाभाव भूतलरूप अधिकरणसे भिन्न एवं स्वतन्त्र
पदार्थ है ।
यहाँ पर यह आशङ्का नहीं की जा सकती है कि—भूतलमे रहने-
वाला अभाव यदि अधिकरणसे भिन्न है, तो उस भूतलगत अभावमें
रहनेवाला अभाव उससे भिन्न होगा और उस अभावमें भी रहनेवाला
घटाभावादि उस अभावसे भिन्न होगा, इस प्रकार भिन्न भिन्न अगणित
अभावोंकी परम्परा कायम हो जायगी और अनवस्थादोषका प्रसङ्ग
हो जायगा—क्योंकि घटाभावमे यदि अन्य घटाभावकी प्रतीति होती तो
उस प्रतीतिके वलसे अभावमें अभावान्तर स्वीकार किया जाता । किन्तु
वैसी प्रतीति होती नहीं है। क्योंकि अभाव तो अपने प्रतियोगीके विरुद्ध
स्वभाववाला है । इसलिए जब घटाभाव रहेगा तब उसका विरोधी घट
कैसे रह सकता है ? अत प्रथम घटाभावसे ही हमेशा “घटो नास्ति”
व्यवहार होता रहता है, तथा वहाँ अन्य घटाभावका अनुभव नहीं
होता । इस स्थितिमे अभावमे दूसरा अभाव क्यों माना जाय ?
एव “घटाभावमे यदि घटाभाव न हो तो उसमे घटकी सत्ता होने
लगेगी” इस प्रकारका तर्क भी अभावमे अभावान्तर सिद्ध करनेके लिए
नहीं दिया जा सकता है। क्योंकि प्रथम घटाभावसे ही ‘घटो नास्ति’
व्यवहारकी उपपत्ति हो जायगी और घटाभावमे घटसत्ताका आपादन
नहीं किया जा सकता ।
( शङ्का ) यदि घटसे भिन्न घटाभाव ( घटविनाश ) होता तो जिस
प्रकार घटसे भिन्न पटके होनेसे पटके उत्पन्न होनेपर भी घट अवस्थित