सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary
देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा
३० / सम्राट अशोक के अभिलेख
१६. अंतला पि च सोतविया
१७. खने संतं एकेन पि सोतविया
१८. हेवँ च कलंतं छघथ संपतिपातयितवे
जौगड शिला : द्वितीय पृथक् अभिलेख / ३१
१६. और (तिष्य के दिनों के) बीच बीच में भी सुना जाना चाहिए।
१७. अवसर मिलने पर भले ही एक व्यक्ति द्वारा ही सुना जाना चाहिए।
१८. और ऐसा करते हुए (आप) सम्यक प्रतिपादन (की दिशा में)
यत्नशील होंगे।
खंड (२)
लघु शिलाओं पर उत्कीर्ण अभिलेख
पृष्ठ ३४
३४ / सम्राट अशोक के अभिलेख
मूल अभिलेख
लघु शिला : रूपनाथ
१. देवानंपिये हेव आहा
२. सातिरेकानि अढतियानि व य सुमि प्रकास सके
३. नो चु बाढि पकंते
४. सातिरेके चु छवछरे य सुमि हकं सघ उपेते बाढि च पकंते
५. या इमाय कालाय जंबुदिपसि अमिसा देवा हुसु ते दानि मिसा कटा
६. पकसहि हि एस फले
७. नो च एसा महतता पापोतवे खुदकेन पि पकममिनेना सकिये पिपुले पि
स्वगे आरोधेवे
८. एतिय अठाय च सावने कटे खुदका च उडाला च पकमतु ति अता पि
च जानंतु इय पकरा व किति चिरठितिके सिया
९. इय हि अठे वढि वढिसिति विपुलं च वढिसिति अपलधियेना दियढियं
वढिसत
१०. इय च अठे पवतिसु लेखापेत बालत
११. हथ च अथि सिलाथंभे सिलाथंभसि लाखापेतवय त
१२. एतिना च वयजनेना यावतक तुफक अहाले सव विवसेतवाय ति
१३. व्यूठेना सावने कटे
१४. २०० ५० ६ सत विवासा त
पृष्ठ ३५
लघु शिला : रूपनाथ / ३५
हिंदी रूपांतर
लघु शिला : रूपनाथ
१. देवानांप्रिय ऐसा कहते हैं।
२. अढाई वर्ष से कुछ अधिक समय हो गया है जब से मैं प्रकट रूप से
उपासक हूँ।
३. परंतु मैंने डट कर पराक्रम नहीं किया।
४. परंतु एक वर्ष से कुछ अधिक समय हो गया है जब से मैं संघ हो गया
हूँ और खूब पराक्रम किया है।
५. जो इस काल में जंबुद्वीप में देवगण (मनुष्यों से) विलग हो गये थे वे
अब (मेरे द्वारा उनसे) मिलवा दिये गये हैं।
६. यह पराक्रम का ही फल है।
७. और यह (केवल) बड़े (आदमी) के ही बस में नहीं है (बल्कि) पराक्रम
करने वाला छोटा (आदमी) भी, अथाह होने पर भी, स्वर्ग प्राप्त कर सकता है।
८. और इस प्रयोजन के लिए यह घोषणा की गयी है कि छोटे वा बड़े
(सभी) पराक्रम करें और (मेरे) सीमावर्ती लोग भी जान जायं कि यही पराक्रम
चिरस्थायी हो।
९. क्योंकि यह उद्देश्य आगे-से-आगे बढ़ेगा और खूब बढ़ेगा – कम-से-कम
ड्योढ़ा बढ़ जायगा।
१०. और इस विषय को सुयोग (उपस्थित) होने पर चट्टानों पर लिखवायें।
११. और यहां (अर्थात, मेरे साम्राज्य में जहां कहीं भी) शिलास्तंभ हों
(वहां-वहां) शिलास्तंभों पर इसे लिखवाया जाना चाहिए।
१२. और इस (घोषणा की) इबारत के अनुसार, जितनी (दूर तक)
आपका अधिकार-क्षेत्र हो, (आप) उन सब स्थानों पर (अपने अधिकारियों
को) भिजवायें।
१३. यह घोषणा प्रवास-काल में की गयी।
१४. (तब तक) २५६ पड़ाव (अर्थात, रात्रि-काल) बीत चुके थे।
[पृष्ठ ३६]
३६ / सम्राट अशोक के अभिलेख
लघु शिला : कोलकाता - बैराट
१. प्रियदसि लाजा मागधे संघं अभिवादेतूनं आहा अपाबाधतं च
फासुविहालतं चा
२. विदिते वे भंते आवतके हमा बुधसि धंमसि संघसी ति गालवे च प्रसादे च
३. ए केचि भंते भगवता बुधेन भासिते सर्वं से सुभासिते वा
४. ए चु खो भंते हमियाये दिसेया हेवं सधंमे चिरठीतीके होसती ति
अलहामि हकं तं वातवे
५. इमानि भंते धंमपलियायानि विनयसमुकसे अलियवसानि
अनागतभयानि मुनिगाथा मोनेयसूते उपतिसपसिने ए चा लाघुलोवादे मुसावादं
अधिगिच्य भगवता बुधेन भासिते एतानि भंते धंमपलियायानि इच्छामि किंति
बहुके भिखुपाये चा भिखुनिये चा अभिखिनं सुनेयु चा उपधारेयेयू चा
६. हेमेवा उपासका चा उपासिका चा
७. एतेनि भंते इमं लिखापयामि अभिप्रेतं मे जानंतू ति
लघु शिला : ब्रह्मगिरि
१. सुवणंगिरीते अयपुतस महामाताणं च वचनेन इसिलासि महामाता
आरोगियं वतविया हेवं च वतविया
२. देवाणांपिये आणपयति
३. अधिकानि अढातिियानि वसानि य हकं..... सके
४. नो तु खो बाढं प्रकंते हुसं एकं सवछरं
५. सातिरेके तु खो संवछरं यं मया संघे उपागीते बाढं च मे पक्वंते
६. इमिना चु कालेन अमिसा समाना मुनिसा जंबुदीपसि मिसा देवेहि
७. पकमस हि इयं फले
[पृष्ठ ३७]
लघु शिला : कोलकाता - बैराट / ३७
लघु शिला : कोलकाता - बैराट
१. मगध के राजा प्रियदर्शी संघ को अभिवादन करके उनके स्वास्थ्य और
सुखविहार की कामना करते हैं।
२. आप भदंतगण को विदित ही है कि मेरे मन में बुद्ध, धर्म और संघ के
प्रति कितना आदर एवं अनुराग है।
३. हे भदंतगण! जो कुछ भगवान् बुद्ध ने कहा है वह सब सुभाषित ही है।
४. परंतु, भदंतगण! जैसा कि मुझे सुझाई देता है कि सद्धर्म ऐसे चिरस्थायी
होगा, उस बारे में मैं यह बतलाना चाहता हूँ-
५. भदंतगण! यह परियाति है - विनयसमुत्कर्ष, अलियवसाणि,
अनागतभयानि, मुनिगाथा, मोनेयसूत्त, उपतिसपसिने और ऐसे ही लाघुलोवाद
में मुसावाद के बारे में भगवान बुद्ध ने जो कुछ कहा है। इस परियाति को,
भदंतगण! मैं चाहता हूँ कि बहुत से पूज्य भिक्षु एवं भिक्षुणियां बार-बार सुनें
और धारण करें।
६. और इसी प्रकार उपासक तथा उपासिकाएं (भी)।
७. भदंतगण! यह इस प्रयोजन से लिखवाता हूँ जिससे कि (लोग) मेरा
अभिप्राय जान जायं।
लघु शिला : ब्रह्मगिरि
१. सुवर्णगिरि से कुमार तथा महामात्रों के हवाले से इसिल के महामात्रों के
आरोग्य के बारे में पूछा जाय और (तत्पश्चात) यह कहा जाय -
२. देवानांप्रिय की आज्ञा है-
३. कि अढ़ाई वर्ष से अधिक (समय) हुआ है जब से मैं उपासक हूं।
४. परंतु मैंने एक वर्ष तक निःसंदेह डट कर पराक्रम नहीं किया।
५. परंतु एक वर्ष से कुछ अधिक समय हुआ है जब से मैं संघ हो गया हूं
और खूब पराक्रम कर रहा हूँ।
६. इस काल में जंबुद्वीप में (देवगण से) विलग हुए-हुए मनुष्य उनसे
मिलवा दिये गये हैं।
७. यह पराक्रम का ही फल है।
पृष्ठ ३८
३८ / सम्राट अशोक के अभिलेख
८. नो हीयं सक्ये महात्तेनेव पापोतवे कामं तु खो खुदकेन पि पकम-
णेण विपुले सुवगे आराधेत्तवे
९. एतायठाय इयं सावणे सावापिते.... महाप्पा च इमं पकमेयु ति अंता
मे जानेयु चिरठितीके च इयं पक....
१०. इयं च अठे वढिसिति विपुलं पि च वढिसिति अवरधिया दियढि
वढिसिति
११. इयं च सावणे सावापिते व्यूथेन
१२. २०० ५० ६
१३. से हेवं देवाणांपिये आह
१४. मातापितिसु सुस्रुसितविये हेमेव गरुसु प्राणेषु द्रहितव्यं सचं वतव्ये
से इमे धंमगुणा पवतितविया
१५. हेमेव अंतेवासिना अचारिये अपचायितविये ज्ञातिकेषु च कं य.... हे
पवतितविये
१६. एसा पोराणा पकिती दीघावुसे च एस
१७. हेवं एस कटिविये
१८. चपडेन लिखितं लिपिकरेण
पृष्ठ ३९
लघु शिला : ब्रह्मगिरि / ३९
८. निश्चय ही यह केवल बड़े (आदमी) द्वारा ही प्राप्त नहीं किया जा
सकता है बल्कि, चाहना होने पर, छोटे (आदमी) द्वारा भी पराक्रम करते हुए,
निःसंदेह, विपुल स्वर्ग प्राप्त किया जा सकता है।
९. इस प्रयोजन के लिए यह प्रज्ञापन करवाया गया है कि (छोटे) और बड़े
(सभी) यह पराक्रम करें और मेरे सीमावर्ती लोग भी (इसे) जान जायं और यह
पराक्रम चिरस्थायी हो।
१०. और यह उद्देश्य बढ़ेगा और खूब बढ़ेगा - कम से कम डेढ़ गुना (बढ़
जायगा)।
११. और यह प्रज्ञापन (मेरे) प्रवास-काल में किया गया है।
१२. (इस समय तक) २५६ (रात्रि-विश्राम किये जा चुके हैं)।
१३. और भी देवानांप्रिय का यह कहना है -
१४. माता-पिता की सेवा करनी चाहिए (और) ऐसे ही गुरुजनों की,
प्राणियों के प्रति (दयाभाव को) दृढ़ करना चाहिए, सच बोलना चाहिए, - तो
इन धर्मों के गुणों को व्यवहार में उतारना चाहिए।
१५. इसी प्रकार (आचार्य के सान्निध्य में रहने वाले) शिष्य द्वारा आचार्य
का आदर-सत्कार किया जाना चाहिए और ज्ञातिभाइयों के साथ यथायोग्य
बर्ताव किया जाना चाहिए।
१६. यह सनातन रीति है और इससे आयु बढ़ती है।
१७. इसी के अनुसार (कार्य) करना चाहिए।
१८. लिपिकार चपड द्वारा लिखा गया।
खंड (३)
लघु स्तंभों पर उत्कीर्ण अभिलेख
४२ / सम्राट अशोक के अभिलेख
मूल अभिलेख
लघु स्तंभ : सारनाथ
१-३. देवा.... ए लं.... पाट.... ये केनपि संघे भेतवे
४. ए चुं खो भिखु वा भिखुनि वा संघं भाखति से ओदातानि दुसानि
संनंघयिया अनावाससि आवासयिये
५. हेवं इयं सासने भिखुसंघसि च भिखुनिसंघसि च विंनपयितविये
६. हेवं देवानंपिये आहा
७. हेदिसा च एका लिपि तुफाकंतिकं हुवाति संसरनसि निखिता इकं च
लिपिं हेदिसमेव उपासकानंतिकं निक्खिपथ
८. ते पि च उपासका अनुपोसथं यातु एतमेव सासनं विस्वंसयितवे
अनुपोसथं च धुवाये इकिंके महामाते पोसथाये याति एतमेव सासनं
विस्वंसयितवे आजानेत्तवे च
९. आवते च तुफाकं आहाले सवत विवासयाथ तुफे एतेन वियंजनेन
१०. हेमेव सवेसु कोटविषवेसु एतेन वियंजनेन विवासापयाथा
लघु स्तंभ : सारनाथ / ४३
हिंदी रूपांतर
लघु स्तंभ : सारनाथ
१. देवा (नांप्रिय) ...................
२. ................... पाट (लिपुत्र) ...................
३. ........... किसी के भी द्वारा संघ का भेदन (नहीं किया जा सकता)।
४. परंतु यदि कोई भिक्षु अथवा भिक्षुणी संघ का भेदन करे तो उसे श्वेत
वस्त्र पहना कर (भिक्षुओं-भिक्षुणियों के) अयोग्य स्थान पर बसाया जाना
चाहिए।
५. इस प्रकार यह आदेश भिक्षुओं के संघ में और भिक्षुणियों के संघ में
जानकारी में लाया जाना चाहिए।
६. देवानंप्रिय ऐसा कहते हैं-
७. इस प्रकार की एक लिखावट आपके पास चौपाल में रखी हुई हो और
ऐसी ही एक लिखावट उपासकों के पास रखें।
८. और वे उपासक भी हर उपोसथ के दिन इस आदेश के प्रति (अपना)
विश्वास जमाने के लिए आयें और निश्चित रूप से प्रत्येक उपोसथ के दिन
प्रत्येक महामात्र इसी आदेश के प्रति (अपना) विश्वास जमाने और इसे पूरी
तरह समझने के लिए उपोसथ में आयें।
९. और जहां तक आपका अधिकार-क्षेत्र है, वहां तक सब जगह यह
आदेश लेकर (आप) दौरा करें।
१०. और इसी प्रकार सब दुर्गम प्रदेशों में इस आदेश के साथ (अपने
अधीनस्थ अधिकारियों को) भिजवायें।
[पृष्ठ ४४]
४४ / सम्राट अशोक के अभिलेख
लघु स्तंभ : रुम्मिनदेई
१. देवानंपियेन पियदसिन लाजिन वीसतिवसाभिसितेन अतन आगाच
महीयिते हिद बुधे जाते सक्यमुनी ति
२. सिला विगडभी चा कालापित सिलाथभे च उसपापिते हिद भगवं जाते ति
३. लुंमिनिगामे उबलिके कटे अठभागिये च
लघु स्तंभ : निगली सागर
१. देवानंपियेन पियदसिन लाजिन चोदसवसाभिसितेन बुधस कोनाकमनस
थुबे दुतियं वढिते
२. ....... साभिसितेन च अतन अगाच महीयिते ...... पापिते
[पृष्ठ ४५]
लघु स्तंभ : रुम्मिनदेई / ४५
लघु स्तंभ : रुम्मिनदेई
१. अभिषेक के बीस वर्ष हो चुकने पर देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा द्वारा
स्वयं (यहाँ) आकर पूजन किया गया क्योंकि यहां पर शाक्यमुनि बुद्ध का जन्म
हुआ था।
२. (उनके द्वारा यहां पर) पत्थर की बहुत बड़ी दीवार बनवायी गयी और
शिला-स्तंभ खड़ा करवाया गया क्योंकि यहां पर भगवान की उत्पत्ति हुई थी।
३. लुंबिनी ग्राम के धार्मिक कर माफ कर दिये गये और मालगुजारी के रूप
में केवल आठवां हिस्सा (रखा गया)।
लघु स्तंभ : निगली सागर
१. अभिषेक के चौदह वर्ष हो चुकने पर देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा द्वारा
कोणगमन बुद्ध का स्तूप दूसरी बार बड़ा करवाया गया।
२. और अभिषेक के (बीस) वर्ष हो चुकने पर (उन्होंने यहां) स्वयं आकर
पूजा की (और एक शिला-स्तंभ खड़ा) करवाया।
खंड (४)
स्तंभों पर उत्कीर्ण अभिलेख
, सत्य (और)
शुचिता (पवित्रता)।
Wait, let's check line 3:
"३. पाप-कर्मों से दूर रहना, खूब सत्कर्म करना, दया, दान, सत्य (और)"
Look at "दान": दया, दान, सत्य (और)
Line 4:
"शुचिता (पवित्रता)।"
Line 5:
"४. मेरे द्वारा अनेक प्रकार के चक्षुदान भी किये गये हैं।"
Line 6:
"५. दुपायों और चौपायों पर, और खे-चरों तथा जल-चरों पर प्राणदान देने"
Line 7:
"तक मैंने नाना प्रकार के उपकार किये हैं।"
Line 8:
"६. मेरे द्वारा और भी बहुत से कुशल कार्य किये गये हैं।"
Line 9:
"७. मेरे इस प्रयोजन के लिए यह धर्मलिपि लिखवायी गयी है कि (लोग)"
Line 10:
"इसके अनुसार आचरण करें और यह चिरस्थायी हो।"
Line 11:
"८. और जो इसके अनुसार आचरण करेगा वह सुकृत (सत्कर्म)"
Line 12:
"(ही) करेगा।"
Let's verify line by line carefully:
Under "स्तंभ देहली-टोपरा : द्वितीय अभिलेख":
१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं -
२. धर्म श्रेष्ठ है, परन्तु धर्म है क्या?
३. पाप-कर्मों से दूर
पृष्ठ ५०
५० / सम्राट अशोक के अभिलेख
स्तंभ देहली-टोपरा : तृतीय अभिलेख
१. देवानंपिये पियदसि लाज हेव अहा
२. कयानमेव देखति इयं मे कयाने कटे ति
३. नो मिन पापं देखति इयं मे पापे कटे ति इयं वा आसिनवे नामा ति
४. दुपवेखे चु खो एसा
हेवं चु खो एस देखिये
५. इमानि आसिनवगामीनि नाम अथ चंडिये निठूलिये कोधे माने इस्या
कालनेन व हकं मा पलिसचयिसं
६. एस बाढ देखिये
७. इयं मे हिदिकाये इयमेव मे पालतिकाये
स्तंभ देहली-टोपरा : चतुर्थ अभिलेख
१. देवानंपिय पियदसि लाज हेव आहा
२. सडुवीसतिवसअभिसितेन मे इयं धंमलिपि लिखापिता
३. लजूका मे बहुसु पानसतसहसेसु जनसि आयता
४. तेसं ये अभिहाले वा दंडे वा अतपतिये मे कटे किंति लजूका असथ
अभीता कंमानि पवतवेवू जनस जानपदसा हितसुखं उपदहेवू अनुगहिनेवु चा
५. सुखीयदुखीयनं जानिसंति धंमयुतेन च वियोवदिसंति जनं जानपदं
किंति हिदतं च पालातं च आलाधयेवू ति
६. लजूका पि इच्छंति पटिचलितवे मं
७. पुलिसानि पि मे छंदनानि पटिचलिंसंति
पृष्ठ ५१
स्तंभ देहली-टोपरा : तृतीय अभिलेख / ५१
स्तंभ देहली-टोपरा : तृतीय अभिलेख
१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं-
२. (मनुष्य) (अपना) भला काम ही देखता है (और अपने मन में सोचता
है) 'मैंने यह भला काम किया है।'
३. (वह अपना) बुरा काम जरा भी नहीं देखता (और अपने मन में नहीं
सोचता है;) 'मैंने यह पाप-कर्म किया है', अथवा 'यह आसिनव (बांधने
वाला कर्म) है।'
४. इसकी पहचान करना बड़ा कठिन कार्य है।
५. परंतु इसे, निःसंदेह, इस प्रकार देखना चाहिए-
६. प्रचंडता, निष्ठुरता, क्रोध, अभिमान (और) ईर्ष्या - ये क्लेश को प्राप्त
कराने वाले हैं। इस कारण से मैं कहीं पतित न हो जाऊं।
७. इसे अच्छी तरह जान लेना चाहिए-
८. यह मेरे ऐहिक (लाभ) के लिए है और वह दूसरा मेरे पारलौकिक
(लाभ) के लिए।
स्तंभ देहली-टोपरा : चतुर्थ अभिलेख
१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं-
२. अभिषेक के २६ वर्ष हो चुकने पर मेरे द्वारा यह धर्मलिपि लिखवायी
गयी है।
३. मेरे 'रज्जुक' (नाम के अधिकारी) कई लाख प्राणियों और मनुष्यों के
बीच नियुक्त हैं।
४. उनको अभियोग चलाने अथवा दंड देने के मामलों में मैंने उन्हीं के
विवेक पर छोड़ दिया है। क्यों? (जिससे कि) रज्जुक आश्वस्त और निर्भय
होकर कर्मों में प्रवृत्त हों, देशवासियों को हित-सुख प्रदान करें और (उनका)
उपकार करें।
५. वे सुख-दुःख (के कारणों) को जानेंगे और धर्म का पालन करने वाले
(व्यक्तियों की सहायता से) देशवासियों को प्रेरित करेंगे जिससे कि वे इस
लोक और परलोक (का सुख) प्राप्त कर सकें।
६. रज्जुक भी मेरी आज्ञा का पालन करने के लिए उत्सुक रहते हैं।
७. (सामान्य) (राज-) पुरुष भी मेरी इच्छाओं के अनुसार चलेंगे।
ी, बिना हाड़ वाला मच्छ, वेदवेयक, गंगापुपुटक, संकुज-मत्स्य, कछुआ और शल्यक, पर्णशश, बारकपिंजर, सांड, ओकपिंड, गैंडा, श्वेत कपोत, ग्राम कपोत (और) सभी चौपाये जो उपयोग में नहीं आते और न खाये जाते हैं।`
Wait, look at "कछुवी" in page 53:
छोटी चींटी, कछुवी, बिना हाड़ वाला मच्छ (or कछवी) -> looks like कछुवी or कढवी? In line 2: दडी is translated as कछुवी or कछवी? Ah, दडी -> कछवी or कछुवी.
And बेदवेयक / वेदवेयक.
Let's present both pages clearly, labeling Page 52 and Page 53, line by line.### पृष्ठ ५२
५२ / सम्राट अशोक के अभिलेख
८. ते पि च कति विसंनपयितवे येन मं लघुकं चलेयुति अताथयेनिसं
९. अथा हि पजं वियते धातिपे निसितिज अस्यथ होति वियत धाति
चघति मे पजं सुख
पृष्ठ ५४
५४ / सम्राट अशोक के अभिलेख
३. ...... एडका चा सूकली चा गभिनी व पायमीना व अवधिय - प...
तके पि च कानि आंसमासिके
४. वधिकुकुटे नो कटविये
५. तुसे सजीवे नो झापेतविये
६. दावे अनठाये वा विहिसाये वा नो झापेतविये
७. जीवेन जीवे नो पुसितविये
८. तीसु चातुंमासीसु तिसायं पुंनमसिं तिनि दिवसानि चावुदसं पंनडसं
पटिपदाये धुवाये चा अनुपोसथं मच्छे अवधिये नो पि विकेतविये
९. एतानि येवा दिवसानि नागवनसि केवटभोगसि यानि अंनानि पि
जीवनिकायानि न हंतवियानि
१०. अठमीपखाये चावुदसाये पंनडसाये तिसाये पुनावसुने तीसु
चातुंमासीसु सुदिवसाये गोने नो नीलखितविये अजके एडके सूकले ए वा पि
अंने नीलखियति नो नीलखितविये
११. तिसाये पुनावसुने चातुंमासिपखाये अस्वसा गोनसा लखनं
नो कटविये
१२. यावडुवीसतिवसाभिसितेन मे एताये अंतलिकाये पंनवीसति
बंधनमोखानि कटानि
स्तंभ देहली-टोपरा : षष्ठ अभिलेख
१. देवानंपिये पियदसि लाज हेव अहा
२. दुवाडसवसाभिसितेन मे धंमलिपि लिखापिता लोकासा हितसुखाये से तं
अपहटा तं तं धंमवडि पापोवा
३. हेवं लोकसा हितसुखे ति पटवेखामि अथ इयं नातिसु हेवं पतियासंनेसु
हेवं अपकठेसु किमं कानि सुखं अवहामी ति तथ च विदहामि
पृष्ठ ५५
स्तंभ देहली-टोपरा : षष्ठ अभिलेख / ५५
३. गर्भिणी अथवा दूध पिलाने वाली (बकरी,) भेड़ और सूकरी (भी)
अवध्य हैं - और छः माह तक की आयु वाले इनके बच्चे भी।
४. मुर्गों को बधिया नहीं किया जाना चाहिए।
५. जिस भूसे में जीव हों उसे नहीं जलाया जाना चाहिए।
६. बिना किसी प्रयोजन के अथवा (प्राणियों की) विहिंसा के लिए जंगल
को आग नहीं लगानी चाहिए।
७. जीव से जीव का पोषण नहीं किया जाना चाहिए।
८. तीनों चौमासों में और तैष की पूनम के तीन दिनों तक - अर्थात
चौहदसी, पंद्रहवीं और प्रतिपदा को - और उपोसथ के दिनों में ध्रुव-नियम के
समान मछली न तो मारी जानी चाहिए और न ही इसका विक्रय होना चाहिए।
९. इन्हीं दिनों में हस्तिवन में, अथवा मछुआरों के तालाब में, जो कोई
दूसरे जीव-समुदाय हों उनका भी हनन नहीं किया जाना चाहिए।
१०. प्रत्येक पक्ष की अष्टमी, चौदस और पंचदशी को, तिष्य और पुनर्वसु
के दिन, तीनों चौमासों की पूर्णिमा के दिन और शुभ दिनों में बैलों को बधिया
नहीं किया जाना चाहिए। (इसी प्रकार) बकरों, मेढ़ों, सूअरों, अथवा अन्य
जानवरों को जिनको (प्रायः) बधिया किया जाता है, बधिया नहीं किया जाना
चाहिए।
११. तिष्य, पुनर्वसु, ऋतुओं की पूर्णिमाओं के दिन, और प्रत्येक ऋतु की
पूर्णिमा वाले पक्ष में घोड़ों और बैलों को दागा नहीं जाना चाहिए।
१२. छब्बीस वर्ष पहले अपने अभिषेक के समय से लेकर इस अंतराल में
मेरे द्वारा पच्चीस बार (बंदियों की) बंधन से रिहाई करवायी गयी है।
स्तंभ देहली-टोपरा : षष्ठ अभिलेख
१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं -
२. अभिषेक के बारह वर्ष हो चुकने पर मेरे द्वारा लोगों के हित-सुख के
लिए धर्मलिपि लिखवायी गयी जिससे कि वे उसकी अवज्ञा न करते हुए धर्म
में अनेक प्रकार की पुष्टता प्राप्त कर सकें।
३. (यह सोच कर कि) "इसी प्रकार लोगों का हित-सुख हो सकता है", मैं
केवल (अपने) ज्ञातिभाइयों का ही ध्यान नहीं रखता हूँ, अपितु उनका भी जो
समीप हैं अथवा दूर हैं, जिससे कि मैं उन्हें सुख पहुँचा सकूँ और (फिर) मैं
वैसी ही व्यवस्था कर देता हूँ।
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठों का पूर्ण एवं शुद्ध लिप्यंतरण दिया गया है:
[पृष्ठ ५६]
५६ / सम्राट अशोक के अभिलेख
[स्तंभ-लेख ६ (अवशेष)]
४. हेमेवा सवानिकायेसु पटिवेखामि
५. सवपासंडा पि मे पूजिता विविथाय पूजाय।
६. ए चु इयं अतना पचूपगमने से मे मोख्यमते
७. सडुवीसतिवसअभिसितेन मे इयं धंमलिपि लिखापिता
स्तंभ देहली-टोपरा : सप्तम अभिलेख
१. देवानांपिये पियदसि लाजा हेवं आहा
२. ये अतिक्कतं अंतरं लाजाने हुसु हेव इच्छिसु कथं जने धंमवडिया वढेया
नो चु जुने अनुवुपया धंमवडिया वढिथा
३. एतं देवानांपिये पियदसि लाजा हेवं आहा
४. एस मे हुथा
५. अतिक्कतं च अंतरं हेव इच्छिसु लाजाने कथं जने अनुपथाया धंमवडिया
वढेया ति नो च
पृष्ठ ५८
५८ / सम्राट अशोक के अभिलेख
१७. देवानंपिये पियदसि लाजा हेवं आहा
१८. मंगुसु पि मे निगोहानि लोपापितानि छायोपगानि होसंति पसुमुनिसानं
अंबावडिक्या लोपापिता
१९. अड्ढकोसिक्यानि पि मे उदुपानानि खानापितानि निसिढिया च
कालापिता
२०. आपानानि मे बहुकानि तत तत कालापितानि पटीभोगाये पसुमुनिसानं
२१. ल.... एस पटीभोगे नाम
२२. विविधाया हि सुखायनाया पुलिमेहि पि लाजीहि ममया च सुखीयिते
लोके
२३. इमं चु धंमानुपटीपती अनुपटीपजंतु ति एतदथा मे एस कटे
२४. देवानंपिये पियदसि हेवं आहा
२५. धंममहामाता पि मे ते बहुविधेसु अठेसु आनुगहिकेसु वियापटासे
पवजीतानं चेव गिहिथानं च सव... डेसु पि च वियापटासे
२६. संघठसि पि मे कटे इमे वियापटा होहंति ति हेवेव बाभनेसु
आजीविकेसु पि मे कटे इमे वियापटा होहंति ति निगंठेसु पि मे कटे इमं
वियापटा होहंति नानापासंडेसु पि मे कटे इमे वियापटा होहंति ति पटीविसिटं
पटीविसिटं तेसु तेषु ते.... माता
२७. धंममहामाता चु मे एतेसु चेव वियापटा सवेसु च अंनेसु पासंडेसु
२८. देवानंपिये पियदसि लाजा हेवं आहा
२९. एते च अंने च बहुका मुखा दानविसगसि वियापटासे मम चेव देविनं
च सवसि च मे ओलोधनसि ते बहुविधेन आकारेन तानि तानि तुठायतनानि
पटी..... हिद चेव दिसासु च
३०. दालकानं पि च मे कटे अंनानं च देविंकुमालानं इमे दानविसगेसु
वियापटा होहंति ति धंमापदानठाये धंमानुपटिपतिये
पृष्ठ ५९
स्तंभ देहली-टोपरा : सप्तम अभिलेख / ५९
१७. देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं -
१८. मार्गों पर भी मेरे द्वारा वट-वृक्ष लगवाये गये हैं जिससे वे पशुओं
और मनुष्यों को छाया दे सकें (और) आम के बगीचे (भी) लगवाये गये हैं।
१९. आधे-आधे कोस पर मेरे द्वारा कुएं खुदवाये गये हैं (और)
विश्राम-स्थल बनवाये गये हैं।
२०. पशुओं और मनुष्यों के उपभोग के लिए मेरे द्वारा जहां-तहां बहुत से
प्याऊ बनवाये गये हैं।
२१. (परंतु) यह तथाकथित 'उपभोग' तुच्छ है।
२२. क्योंकि (मेरे) पूर्ववर्ती राजाओं ने और मैंने भी विविध प्रकार से
(सांसारिक) सुख पहुँचाने वाले कार्यों से लोगों को सुखी बनाया था।
२३. इस धर्मचरण का लोग अनुसरण करें - इस प्रयोजन से यह (कार्य)
मैंने (ही) किया है।
२४. देवानंप्रिय प्रियदर्शी ऐसा कहते हैं -
२५. मैंने वे धर्ममहामात्र भी गृह-त्यागियों तथा गृहस्थों के अनेक प्रकार के
कल्याणकारी कार्यों में लगे हुए हैं और सब संप्रदायों में भी व्याप्त हैं।
२६. मेरे द्वारा (ऐसी) व्यवस्था की गयी है कि वे संघ के कार्यों के लिए भी
व्यापृत रहेंगे; इसी प्रकार मेरे द्वारा व्यवस्था की गयी है कि वे ब्राह्मणों तथा
आजीविकों में भी व्यापृत रहेंगे; मेरे द्वारा व्यवस्था की गयी है कि वे निर्ग्रन्थों में
भी व्यापृत रहेंगे; मेरे द्वारा व्यवस्था की गयी है कि वे विभिन्न संप्रदायों में भी
व्यापृत रहेंगे- (इस प्रकार) प्रत्येक प्रकार की विशेषता के अनुसार उन-उन
(वर्गों) में वे महामात्र (व्यापृत रहेंगे)।
२७. और मेरे धर्ममहामात्र इनमें तथा अन्य सब संप्रदायों में व्याप्त हैं।
२८. देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं -
२९. ये तथा अन्य बहुत से मुख्य (अधिकारी) मेरा तथा रानियों का दान
बांटने में लगे रहते हैं और यहां तथा प्रांतों में, मेरे समूचे रनिवास में अनेक
विधियों से भिन्न-भिन्न प्रकार के तुष्टि प्रदान करने वाले कार्य करते रहते हैं।
३०. और मेरे द्वारा व्यवस्था की गयी है कि वे धर्म-संबंधी उत्तम कार्यों
(की बढ़ोत्तरी) के लिए और धर्मचरण के लिए (मेरे) लड़कों और अन्य
रानियों के लड़कों का दान बांटने में भी लगे रहें।
पृष्ठ ६०
६० / सम्राट अशोक के अभिलेख
३१. एस हि धंमपदाने धंमपटीपति च या इयं दया दाने सचे सोचवे मदवे साधवे च लोकस हेव वढिसति ति
३२. देवानंपिये प.....स लाजा हेव आहा
३३. यानि हि कानिचि ममिया साधवानि कटानि तं लोके अनूपटीपने तं च अनुविधीयंति
३४. तेन वढिता च वढिसति च मातापितिसु सुसुसाया गुरुसु सुसुसाया वयोमहालकानं अनुपटीपतीया बाभनसमनेसु कपनवलकेसु आव दासभटकसु संपटीपतीया
३५. देवानंपिय.... यदति लाजा हेव आहा
३६. मुनिसानं चु या इयं धंमवढि वढिता दुवीहि येव आकालेहि धंमनियमेन च निझतिया च
३७. तत चु लघु से धंमनियमे निझतिया व भूये
३८. धंमनियमे चु खो एस ये मे इयं कटे इमानि च इमानि जातानि अवधियानि
३९. अंनानि पि चु बहुक.... धंमनियमानि यानि मे कटानि
४०. निझतिया व चु भूये मुनिसानं धंमवढि वढिता अविहिंसाये भूतानं अनालंभाये पानानं
४१. से एताये अथाये इयं कटे पुतापपोतिके चंदमसुलियिके होतु ति तथा च अनूपटीपजंतु ति
४२. हेवं हि अनूपटीपजंतं हिदतपालते आलधे होति
४३. सतविसतिवसाभिसितेन मे इयं धंमलिपि लिखापापिता ति
४४. एतं देवानंपिये आहा
४५. इयं धंमलिपि अत अथि सिलाथंभानि वा सिलाफलकानि वा तत कटविया एन एस चिलठितीके सिया
पृष्ठ ६१
स्तंभ देहली-टोपरा : सप्तम अभिलेख / ६१
३१. क्योंकि धर्म-संबंधी उत्तम कार्य और धर्माचरण यह है जो ये दया, दान, सत्य, पवित्रता, मृदुता और साधुता इस विधि से लोगों में बढ़ेंगी।
३२. देवानंप्रिय (प्रियदर्शी) राजा ऐसा कहते हैं-
३३. मेरे द्वारा जो कोई भले काम किये गये हैं लोगों ने उनका अनुसरण किया है और (आगे भी) करते रहेंगे।
३४. इससे (उनकी) बढ़ोतरी हुई है और माता-पिता की सेवा, गुरुजनों की सेवा, वयोवृद्धों के अनुसरण, ब्राह्मणों, श्रमणों, दीन-हीनों - यहां तक कि दासों और भृत्यों - के प्रति सम्यक व्यवहार से (और) बढ़ोतरी होगी।
३५. देवानंप्रिय (प्रि)यदर्शी राजा ऐसा कहते हैं-
३६. मनुष्यों में जो यह धर्म की बढ़ोतरी हुई है वह दो प्रकार से हुई है- धर्म के नियमों से और (विपश्यना) ध्यान करने से।
३७. और इनमें भी धर्म के नियमों से कम और (विपश्यना) ध्यान करने से कहीं अधिक (हुई है।)
३८. धर्म के नियम तो यह हैं जो मैंने यह (विधान) किया कि अमुक-अमुक प्राणी अवध्य हैं।
३९. और दूसरे भी अनेकानेक धर्म के नियम हैं जिनका मैंने (विधान) किया है।
४०. परंतु (विपश्यना) ध्यान करने से मनुष्यों की धर्म में खूब बढ़ोतरी हुई है (क्योंकि) इससे जीवों की अ-विहिंसा और प्राणियों का अ-वध होता है।
४१. तो इस उद्देश्य से यह किया गया है जिससे कि यह (मेरे) बेटों-पोतों (के शासनकाल) तक (और) चंद्रमा या सूर्य (के भासमान रहने) तक टिकने वाली हो और (लोग) इसका अनुसरण करें।
४२. क्योंकि इस प्रकार अनुसरण करने वाले को इहलोक तथा परलोक (का सुख) प्राप्त होता है।
४३. मेरे अभिषेक के २७ वर्ष हो चुकने पर मेरे द्वारा यह धर्मलिपि लिखवायी गयी है।
४४. इस बारे में देवानंप्रिय कहते हैं-
४५. यह धर्मलिपि जहां शिला-स्तंभ अथवा शिला-फलक हों वहां लिखवायी जानी चाहिए जिससे कि यह चिर-स्थायी हो।
खंड (५)
गुहा पर उत्कीर्ण अभिलेख
६४ / सम्राट अशोक के अभिलेख
गुहा : बराबर / ६५
मूल अभिलेख
हिंदी रूपांतर
गुहा : बराबर
गुहा : बराबर
प्रथम मूल अभिलेख
प्रथम अभिलेख
लाजिना पियदसिना दुवाडसवसाभिसितेना
अभिषेक के बारह वर्ष हो चुकने पर राजा प्रियदर्शी द्वारा यह न्यग्रोध-गुहा
इयं निगोहकुभा दिना आजीविकेहि
आजीविकों को दी गयी।
द्वितीय मूल अभिलेख
द्वितीय अभिलेख
लाजिना पियदसिना दुवाडसवसाभिसितेना इयं
अभिषेक के बारह वर्ष हो चुकने पर राजा प्रियदर्शी द्वारा खलतिक पर्वत
कुभा खलतिकपवतसि
पर यह गुफा आजीविकों को दी गयी।
दिना आजीविकेहि
तृतीय अभिलेख
तृतीय मूल अभिलेख
राजा प्रियदर्शी के अभिषेक के उन्नीस वर्ष हो चुकने पर अतीव मनोहारी
लाज पियदसी एकुनवी-
खलतिक पर्वत पर) यह गुफा वर्षा (से बचाव) के लिए दी गयी।
सतिवसाभिसिते जलघो-
सागमथात मे इयं कुभा
सुपिये ख........ दिना
शब्द-विवेचन
स्पष्टीकरण
शब्दों के विवेचन का क्रम प्रायःकर निम्न प्रकार से रखा गया है –
१. अभिलेख में प्रयुक्त हुए शब्द-विशेष
२. उनका हिंदी में अर्थ
३. इन शब्दों का सँस्कृत स्वरूप
४. सँस्कृत पदों का विश्लेषण (यथासंभव शब्दकोषों की सहायता से)
५. पालि शब्द अपने सामान्य रूप में (कोष्ठक में तत्सम सँस्कृत शब्द
सहित)
उदाहरण -
गिरनार शिला : प्रथम अभिलेख
(पृष्ठ ६९-७०)
१. समाजो
२. समाज (अर्थात इंद्रियलोलुपता को बढ़ाने वाले जमघट अथवा उत्सव)
३. समाजः (संवीयते अत्रेति)।
४. ‘पशुभिन्नानां सङ्घः’ (हलायुध०)। ‘समजस्तु पशूनां स्यात्
समाजस्त्वन्यदेहिनाम्’ (अभिधान० ३.४८१)। समाजः- ‘पशुभिन्नानां
समूहे, सभायाम्, हस्तिनि च’ (शब्द०)।
५. समज्ज समज्जा। [सँ.- √अज् (हांकना)]
[नोट - संदर्भ-ग्रंथों के लिए कृपया देखें संदर्भ-सूची पृष्ठ सं (ix) पर]
शिला अभिलेख - शब्द-विवेचन
गिरनार शिला : प्रथम अभिलेख
▪ इयं = यह।
▪ धंमलिपी = धर्म से संसिक्त अक्षररचना (अथवा अक्षरसंस्थान)। सँ.-
धर्मलिपी। 'धर्म:'-'ध्रियते लोकोऽनेन, धरति लोकं वा। 'लिपी', 'लिपि:'-
√लिप् से। इनके अन्य रूप 'लिबी', 'लिबि:' भी देखने को मिलते हैं।
'अक्षरन्यासे लिपिर्लिबि:' (अभिधान० ४८४)।
▪ देवानंप्रियेन प्रियदसिना राजा = देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा द्वारा।
'देवानांप्रिय'-मौर्य राजाओं की उपाधि। 'प्रियदर्शी'-राजा अशोक का
विशेषण। 'देव:'-दीपनात्, द्योतनात्, दानात् (नि० ७.१५)।
'प्रिय:'-प्रीणातीति। मनोरम, मञ्जुल, हृद्य। 'राजा'-राजतेः (नि० २.३)।
Lat. 'Rex' (a king)
▪ लेखापिता = लिखवायी गयी।
▪ इध = यहां (अर्थात, मेरे साम्राज्य में)। सँ.-'इह'। पालि-'इध'। (हिंदी
का 'इधर' शब्द इसी से निष्पन्न हुआ प्रतीत होता है।)
▪ किंचि = कोई। सँ.- किञ्चित्।
▪ जीवं = प्राणी को। सँ.- जीवः (जीवतीति 'जीव् प्राणधारणे')। 'जीवः
पुरुषपुद्गलौ' (त्रिकाण्ड० ११९)।
▪ आरभित्पा = मार कर। सँ.- आलभ्य। आलम्भः, आलम्भनं -पकड़ना,
स्पर्श करना, चीरना, फाड़ना, यज्ञ में बलिदान के लिए पशु का वध करना,
यथा 'अश्वालम्भं, गवाल्म्भं'। (सँस्कृत०)। ('प्रातर्वै पशूनालभन्ते।' शतपथ०
३.७.२.४)
▪ प्रजूहितव्यं = होम किया जाय। (प्र - √हु से)।
▪ च = और। सँ.- च। पालि = च। 'च पादपूरणे पक्षान्तरे हेतौ विनिश्चये'
(त्रिकाण्ड० १०१८)
▪ समाजो = समाज (अर्थात, इंद्रियलोलुपता बढ़ाने वाले जमघट अथवा
उत्सव)। सँ.- समाजः (संवीयतेऽत्रेति)। 'पशुभिन्ननां सङ्घ:' (हलायुध०)।
'समजस्तु पशूनां स्यात् समाजस्त्वन्यदेहिनाम्' (अभिधान० ३.४८१)।