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सर्वकोश
सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary

देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा

DevanagariHindipublished80 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 80 में से

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पृष्ठ 36

पृष्ठ ५४

५४ / सम्राट अशोक के अभिलेख

३. ...... एडका चा सूकली चा गभिनी व पायमीना व अवधिय - प...
तके पि च कानि आंसमासिके
४. वधिकुकुटे नो कटविये
५. तुसे सजीवे नो झापेतविये
६. दावे अनठाये वा विहिसाये वा नो झापेतविये
७. जीवेन जीवे नो पुसितविये
८. तीसु चातुंमासीसु तिसायं पुंनमसिं तिनि दिवसानि चावुदसं पंनडसं
पटिपदाये धुवाये चा अनुपोसथं मच्छे अवधिये नो पि विकेतविये
९. एतानि येवा दिवसानि नागवनसि केवटभोगसि यानि अंनानि पि
जीवनिकायानि न हंतवियानि
१०. अठमीपखाये चावुदसाये पंनडसाये तिसाये पुनावसुने तीसु
चातुंमासीसु सुदिवसाये गोने नो नीलखितविये अजके एडके सूकले ए वा पि
अंने नीलखियति नो नीलखितविये
११. तिसाये पुनावसुने चातुंमासिपखाये अस्वसा गोनसा लखनं
नो कटविये
१२. यावडुवीसतिवसाभिसितेन मे एताये अंतलिकाये पंनवीसति
बंधनमोखानि कटानि

स्तंभ देहली-टोपरा : षष्ठ अभिलेख

१. देवानंपिये पियदसि लाज हेव अहा
२. दुवाडसवसाभिसितेन मे धंमलिपि लिखापिता लोकासा हितसुखाये से तं
अपहटा तं तं धंमवडि पापोवा
३. हेवं लोकसा हितसुखे ति पटवेखामि अथ इयं नातिसु हेवं पतियासंनेसु
हेवं अपकठेसु किमं कानि सुखं अवहामी ति तथ च विदहामि


पृष्ठ ५५

स्तंभ देहली-टोपरा : षष्ठ अभिलेख / ५५

३. गर्भिणी अथवा दूध पिलाने वाली (बकरी,) भेड़ और सूकरी (भी)
अवध्य हैं - और छः माह तक की आयु वाले इनके बच्चे भी।
४. मुर्गों को बधिया नहीं किया जाना चाहिए।
५. जिस भूसे में जीव हों उसे नहीं जलाया जाना चाहिए।
६. बिना किसी प्रयोजन के अथवा (प्राणियों की) विहिंसा के लिए जंगल
को आग नहीं लगानी चाहिए।
७. जीव से जीव का पोषण नहीं किया जाना चाहिए।
८. तीनों चौमासों में और तैष की पूनम के तीन दिनों तक - अर्थात
चौहदसी, पंद्रहवीं और प्रतिपदा को - और उपोसथ के दिनों में ध्रुव-नियम के
समान मछली न तो मारी जानी चाहिए और न ही इसका विक्रय होना चाहिए।
९. इन्हीं दिनों में हस्तिवन में, अथवा मछुआरों के तालाब में, जो कोई
दूसरे जीव-समुदाय हों उनका भी हनन नहीं किया जाना चाहिए।
१०. प्रत्येक पक्ष की अष्टमी, चौदस और पंचदशी को, तिष्य और पुनर्वसु
के दिन, तीनों चौमासों की पूर्णिमा के दिन और शुभ दिनों में बैलों को बधिया
नहीं किया जाना चाहिए। (इसी प्रकार) बकरों, मेढ़ों, सूअरों, अथवा अन्य
जानवरों को जिनको (प्रायः) बधिया किया जाता है, बधिया नहीं किया जाना
चाहिए।
११. तिष्य, पुनर्वसु, ऋतुओं की पूर्णिमाओं के दिन, और प्रत्येक ऋतु की
पूर्णिमा वाले पक्ष में घोड़ों और बैलों को दागा नहीं जाना चाहिए।
१२. छब्बीस वर्ष पहले अपने अभिषेक के समय से लेकर इस अंतराल में
मेरे द्वारा पच्चीस बार (बंदियों की) बंधन से रिहाई करवायी गयी है।

स्तंभ देहली-टोपरा : षष्ठ अभिलेख

१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं -
२. अभिषेक के बारह वर्ष हो चुकने पर मेरे द्वारा लोगों के हित-सुख के
लिए धर्मलिपि लिखवायी गयी जिससे कि वे उसकी अवज्ञा न करते हुए धर्म
में अनेक प्रकार की पुष्टता प्राप्त कर सकें।
३. (यह सोच कर कि) "इसी प्रकार लोगों का हित-सुख हो सकता है", मैं
केवल (अपने) ज्ञातिभाइयों का ही ध्यान नहीं रखता हूँ, अपितु उनका भी जो
समीप हैं अथवा दूर हैं, जिससे कि मैं उन्हें सुख पहुँचा सकूँ और (फिर) मैं
वैसी ही व्यवस्था कर देता हूँ।