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ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

१२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

च ब्रह्मात्मविज्ञानस्याबाध्यमान- | भी बाधित होने योग्य न होनेके
त्वान्नानुत्पन्नं भ्रान्तं वेति शक्यं | कारण अनुत्पन्न या भ्रान्तिजनित
वक्तुम् । | नहीं कहा जा सकता ।
त्यागेऽपि प्रयोजनाभावस्य | यदि कहो कि “उसे इस लोकमें
[प्रयोजनाभावे] तुल्यत्वमिति चेत् | अकृत ( कर्मत्याग ) से भी कोई
[संन्यासस्य] “नाकृतेनेह कश्चन” | प्रयोजन नहीं है” इस स्मृतिके
[स्वतःसिद्धत्वम्] (गीता ३ । १८) | अनुसार बोधवान्को त्याग करनेमें
| भी प्रयोजनाभावकी समानता ही
इति स्मृतेः, य आहुर्विदित्वा | है; अर्थात् जो लोग कहते हैं कि
ब्रह्म व्युत्थानमेव कुर्यादिति | ब्रह्मको जानकर व्युत्थान ( कर्म-
| त्याग ) ही करना चाहिये उनके
तेषामप्येष समानो दोषः प्रयो- | लिये भी यह प्रयोजनाभावरूप दोष
जनाभाव इति चेन्न; अक्रिया- | समान ही है, तो उनका यह कथन
| ठीक नहीं क्योंकि व्युत्थान तो
मात्रत्वाद् व्युत्थानस्य । अविद्या- | अक्रिया ही है * । प्रयोजनका
निमित्तो हि प्रयोजनस्य भावो न | भाव तो अविद्याके कारण रहता है।
वस्तुधर्मः सर्वप्राणिनां तद्दर्शनात् । | वह वस्तुका धर्म नहीं है क्योंकि
| यह बात सभी प्राणियोंमें देखी
प्रयोजनतृष्णया च प्रेर्यमाणस्य | जाती है; अर्थात् प्रयोजनकी तृष्णा-
वाङ्मनःकायैः प्रवृत्तिदर्शनात् । | से प्रेरित होते हुए प्राणियोंकी वाणी
“सोऽकामयत जाया मे स्यात्” | मन और शरीरद्वारा प्रवृत्ति होतो देखी
(बृ० उ० १ । ४ । १७) | गयी है तथा वाजसनेयी ब्राह्मणमें
| भी “उस ( आदिपुरुष ) ने इच्छा
इत्यादिना पुत्रवित्तादि पाङ्क्त- | की कि मेरे पत्नी हो” इत्यादि कथनके
लक्षणं काम्यमेवेति “उभे ह्येते | द्वारा “ये दोनों (साध्य-साधनरूप)

  • प्रयोजन तो क्रियाके लिये अपेक्षित होता है; इसलिये अक्रियारूप
    व्युत्थानके लिये किसी प्रयोजनकी अपेक्षा नहीं है ।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३

एषणे एव" (बृ० उ० ३।५।१; | एषणाएँ ही हैं" इस निश्चयके अनुसार
४।४।२२) इति वाजसनेयि- | यही ज्ञात होता है कि पुत्र-वित्तादि
ब्राह्मणेऽवधारणात् । | पाङ्कलक्षण* कर्म काम्य ही है।
अविद्याकामदोषनिमित्ताया | अतः विद्वान्के अविद्या आदि
दोषोंका अभाव हो जानेके कारण
वाङ्मनःकायप्रवृत्तेः पाङ्कलक्ष- | अविद्या एवं कामनारूप दोषसे
णाया विदुषोऽविद्यादिदोषाभा- | होनेवाली मन, वाणी और शरीरकी
पाङ्क्तरूपा प्रवृत्ति उपपन्न नहीं
वादनुपपत्तेः क्रियाभावमात्रं | है; इसलिये व्युत्थान क्रिया-
का अभावमात्र है, वह यागादि-
व्युत्थानम्, न तु यागादिवदनु- | के समान अनुष्ठेयरूप और भावा-
ष्ठेयरूपं भावात्मकम् । तच्च | त्मक नहीं है। वह तो विद्यावान्
पुरुषका धर्म ही है; अतः उसके
विद्यावत्पुरुषधर्म इति न प्रयो- | लिये किसी प्रयोजनका अन्वेषण
करनेकी आवश्यकता नहीं है।
जनमन्वेष्टव्यम् । न हि तमसि | अन्धकारमें प्रवृत्त होनेवाला पुरुष
यदि प्रकाशके उदित होनेपर गड्ढे,
प्रवृत्तस्योदित आलोके यद्गर्त- | कीचड़ और काँटे आदिमें नहीं
पङ्ककण्टकाद्यपतनं तत्किंप्रयो- | गिरता तो 'इस (उसके न गिरने)
का क्या प्रयोजन है?' ऐसा प्रश्न
जनमिति प्रहार्हम् । | नहीं किया जा सकता ।
व्युत्थानं तर्ह्यर्थप्राप्तत्वान्न | तब तो स्वभावतः प्राप्त होनेके
कामाभावे चोदनार्हमिति गा- | कारण व्युत्थान चोदना (विधिवाक्य)
आत्मज्ञस्यापि र्हस्थ्ये चेत्परं ब्रह्म- | का विषय नहीं है। इसपर यदि
गार्हस्यानुपपत्तिः विज्ञानं जातं तन्नै- | कहो कि यदि किसीको गृहस्थाश्रममें
ही परब्रह्मका ज्ञान हो जाय तो उसे

  • पंक्ति छन्द पाँच अक्षरका होता है। उससे सदृशता होनेके कारण
    जिस कर्ममें पत्नी, पुत्र, दैववित्त, मानुषवित्त और कर्म इन पाँच साधनोंका योग
    होता है वह पांक्त कर्म कहलाता है।

१४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

१४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
वास्तवकुर्वत आसनं न ततोऽन्यत्र | उस आश्रममें ही कुछ न करते हुए
| बैठा रहना चाहिये, वहाँसे कहीं
गमनमिति चेन्न, कामप्रयुक्तत्वा- | अन्यत्र नहीं जाना चाहिये, तो
द्गार्हस्थ्यस्य; "एतावान्वै कामः" | ऐसा कहना उचित नहीं, क्योंकि
| "इतनी ही कामना है" "ये दोनों
(बृ० उ० १।४।१७) इति "उभे | एषणाएँ ही हैं" इत्यादि वाक्योंसे
ह्येते एषणे एव" (बृ० उ० ३।५। | निश्चित किया जानेके कारण
| गृहस्थाश्रम तो कामनासे ही प्रयुक्त
१; ४।४। २२) इत्यवधार- | है। कामनाके निमित्तभूत पुत्र-
णात् । कामनिमित्तपुत्रवित्तादि- | वित्तादिके सम्बन्धके नियमका
संबन्धनियमाभावमात्रं न हि | अभावमात्र ही 'व्युत्थान' है;
| उनके पाससे कहीं अन्यत्र चला
ततोऽन्यत्र गमनं व्युत्थान- | जाना 'व्युत्थान' नहीं कहा जाता ।
मुच्यते । अतो न गार्हस्थ्य एवा- | अतः जिसे ज्ञान उत्पन्न हुआ है
| उसके लिये कुछ न करते हुए
कुर्वत आसनमुत्पन्नविद्यस्य । | गृहस्थाश्रममें ही स्थित रहना सम्भव
एतेन गुरुशुश्रूषातपसोरप्यप्रति- | नहीं है । इससे विद्वान्के लिये
| गुरुशुश्रूषा और तपस्याकी भी
पत्तिर्विदुषः सिद्धा । | अनुपपत्ति सिद्ध होती है ।
अत्र केचिद् गृहस्था भिक्षा- | इस विषयमें कोई-कोई गृहस्थ
टनादिभयात्परिभ- | पुरुष भिक्षाटनादिके भय और
.गृहस्थानामाक्षेपः |
वाच्च त्रस्यमानाः | तिरस्कारसे डरनेके कारण अपनी
| सूक्ष्मदर्शिता प्रकट करते हुए उत्तर
सूक्ष्मदृष्टितां दर्शयन्त उत्तरमाहुः। | देते हैं- 'केवल देहधारणमात्रके
भिक्षोरपि भिक्षाटनादिनियम- | इच्छुक भिक्षुके लिये भी भिक्षाटनादि-
दर्शनाद्देहधारणमात्रार्थिनो गृह- | का नियम देखा जाता है; अतः

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५

स्थस्यापि साध्यसाधनैषणोभयवि- | [ पुत्र-वित्तादि ] साध्य और [ कर्म-
निर्मुक्तस्य देहमात्रधारणार्थमश- | उपासना आदि ] साधन दोनोंकी
नाच्छादनमात्रमुपजीवतो गृह | एषणाओंसे मुक्त हुए केवल देह-
एवास्तवासनमिति । | धारणके लिये भोजनाच्छादनमात्रसे निर्वाह करनेवाले गृहस्थको भी घरहीमें रहना चाहिये ।'
न; स्वगृहविशेषपरिग्रहनियमस्य | परन्तु उनका ऐसा कहना ठीक
कामप्रयुक्तत्वादि- [तस्य निरासः] | नहीं । क्योंकि अपने गृहविशेषके
त्युक्तोत्तरमेतत् । स्व- | परिग्रहका नियम कामनाप्रयुक्त ही है—इस प्रकार इसका उत्तर पहले दिया
गृहविशेषपरिग्रहाभावे च शरीर- | ही जा चुका है । और अपने गृह-विशेषके परिग्रहका अभाव होनेपर
धारणमात्रप्रयुक्ताशनाच्छादना- | तो केवल शरीरधारणमात्रके लिये
र्थिनः स्वपरिग्रहविशेषाभावेऽर्था- | भोजनाच्छादनकी इच्छा करनेवाले पुरुषको अपने परिग्रह-विशेषका
द्भिक्षुकत्वमेव । | अभाव होनेके कारण स्वतः भिक्षुत्व ही प्राप्त हो जाता है ।
शरीरधारणार्थायां भिक्षाट- | जिस प्रकार भिक्षुके लिये शरीर-
नादिप्रवृत्तौ यथा [विद्वन्न्यास-विचारः] | रक्षामें उपयोगी भिक्षाटनादिकी प्रवृत्ति एवं शौचादिका नियम है
नियमो भिक्षोः शौ- | उसी प्रकार विद्वान् और निष्काम
चादौ च, तथा गृहिणोऽपि | गृहस्थको भी 'यावज्जीवादि' श्रुति-
विदुषोऽकामिनोऽस्तु नित्यकर्मसु | से नियुक्त होनेके कारण प्रत्यवायकी निवृत्तिके लिये नित्यकर्मोंमें नियमसे
नियमेन प्रवृत्तिर्यावज्जीवादिश्रुति- | प्रवृत्ति हो सकती है [ ऐसा यदि कोई कहे तो ] इस कथन-
नियुक्तत्वात् प्रत्यवायपरिहारा- | का तो पहले ही प्रतिवाद किया
येति । एतन्नियोगाविषयत्वेन | जा चुका है, क्योंकि नियोगका

१६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

१६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

विदुषः प्रत्युक्तमशक्यनियोज्य- | अविषय होनेके कारण विद्वान्
त्वाच्चेति । | नियुक्त नहीं किया जा सकता ।
यावज्जीवादिनित्यचोदनानर्थ- | पूर्व०—तब तो 'यावज्जीवन
| अग्निहोत्र करे' इत्यादि नित्य विधिकी
क्यमिति चेत् ? | व्यर्थता ही सिद्ध होती है ।
न, अविद्वद्विषयत्वेनार्थव- | सिद्धान्ती—नहीं, अविद्वान्-
| विषयक होनेके कारण वह सार्थक
त्त्वात् । यत्तु भिक्षोः शरीरधार- | है । केवल शरीरधारणमात्रके लिये
| भिक्षाटनादिमें प्रवृत्त हुए यतिकी
णमात्रप्रवृत्तस्य प्रवृत्तेर्नियतत्वं | प्रवृत्तिका जो नियतत्व है वह
तत्प्रवृत्तेर्न प्रयोजकम् । आचमन- | प्रवृत्तिका प्रयोजक नहीं है ।
| आचमनमें प्रवृत्त हुए पुरुषकी
प्रवृत्तस्य पिपासापगमवन्नान्यप्र- | पिपासानिवृत्तिके समान उसके
| भिक्षाटनादिका [क्षुधानिवृत्ति आदि-
योजनार्थत्वमवगम्यते । न चा- | के सिवा] कोई अन्य प्रयोजन नहीं
| समझा जाता । परन्तु इसके समान
ग्निहोत्रादीनां तद्वदर्थप्राप्तप्रवृत्ति- | अग्निहोत्रादि कर्मोंका स्वतःप्राप्त
| प्रवृत्तिको नियत करना नहीं माना
नियतत्वोपपत्तिः । | जा सकता ।*

अर्थप्राप्तप्रवृत्तिनियमोऽपि प्र- | पूर्व०—परन्तु प्रयोजनका अभाव
| हो जानेपर तो स्वतःप्राप्त प्रवृत्तिका
योजनाभावेऽनुपपन्न एवेति चेत् ? | नियम भी व्यर्थ ही है ?
न, तन्नियमस्य पूर्वप्रवृत्ति- | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि यह
| [भिक्षाटनादिका] नियम पूर्वप्रवृत्तिसे
सिद्धत्वात्तदतिक्रमे यत्नगौरवात् । | सिद्ध होनेके कारण उसके उल्लङ्घनमें
| अधिक प्रयत्नकी आवश्यकता है ।

  • क्योंकि वे तो स्वर्गादिकी कामनासे ही किये जाते हैं, उनकी प्रवृत्ति स्वाभाविक नहीं है ।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७
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[मूल संस्कृत]
अर्थप्राप्तस्य व्युत्थानस्य पुनर्वि-
चनाद्विदुषः कर्तव्यत्वोपपत्तिः ।
अविदुषापि मुमुक्षुणा पारि-
[पार्श्व-टिप्पणी: विविदिषा-संन्यासविधानम्] व्राज्यं कर्तव्यमेव ।
तथा च “शान्तो
दान्तः०” ( बृ० उ० ४ । ४ ।
२३) इत्यादिवचनं प्रमाणम् ।
शमदमादीनां चात्मदर्शनसाध-
नानामन्याश्रमेष्वनुपपत्तेः । “अ-
त्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रं प्रोवाच
सम्यगृषिसङ्घजुष्टम्” ( ६ । २१)
इति च श्वेताश्वतरे विज्ञायते । “न
कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके
अमृतत्वमानशुः” ( कैवल्य० २)
इति च कैवल्यश्रुतिः । “ज्ञात्वा
नैष्कर्म्यमाचरेत्” इति च स्मृतेः।
“ब्रह्माश्रमपदे वसेत्” इति च

[भाष्यार्थ]
और स्वभावतः प्राप्त व्युत्थानका
[“व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति”
आदि वाक्योंसे] पुनः विधान किया
गया है, इसलिये विद्वान् मुमुक्षुके लिये
उसकी कर्तव्यता उचित ही है। जिस
मुमुक्षुको ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है
उसे भी संन्यास करना ही चाहिये।
इस विषयमें “शान्तो दान्त उपरत-
स्तितिक्षुः” आदि वचन प्रमाण हैं ।
तथा आत्मदर्शनके साधन शम-
दमादिका अन्य आश्रमोंमें होना
सम्भव भी नहीं है, जैसा कि “मन्त्रद्रष्टा
ऋषियोंद्वारा भलीप्रकार सेवित उस
परम पवित्र तत्त्वका परमहंसोंको
उपदेश किया” इत्यादि मन्त्रोंसे
श्वेताश्वतरोपनिषद्में बतलाया गया
है, तथा “कर्मसे, प्रजासे अथवा
धनसे नहीं बल्कि त्यागसे ही किन्हीं-
किन्हींने अमरत्व प्राप्त किया है”
ऐसी कैवल्योपनिषद्की श्रुति भी
है । और “ज्ञान प्राप्तकर नैष्कर्म्यका
आचरण करे” इस स्मृतिसे भी यही
सिद्ध होता है । “ब्रह्माश्रमपदे वसेत्”
इस स्मृतिके अनुसार ज्ञानप्राप्तिके


[पाद-टिप्पणी]
१. ब्रह्माश्रम [अर्थात् ब्रह्मज्ञानके साधनभूत संन्यासाश्रम] में निवास करे ।

१८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

१८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १


ब्रह्मचर्यादिविद्यासाधनानां च | साधन ब्रह्मचर्यादिकी सिद्धि भी सम्यक्
साकल्येनात्याश्रमिषूपपत्तेर्गाहं- | रीतिसे संन्यासियोंमें ही हो सकती है,
स्थ्येऽसंभवात् । न चासंपन्नं साधनं | क्योंकि गृहस्थाश्रममें उन साधनोंका
कस्यचिदर्थस्य साधनायालम् । | होना असम्भव है; और अपूर्ण साधन
यद्विज्ञानोपयोगीनि च गार्हस्थ्या- | किसी अर्थको सिद्ध करनेमें समर्थ
श्रमकर्माणि तेषां परमफलमुप- | नहीं है । गृहस्थाश्रमके कर्म जिस
संहृतं देवताप्पयलक्षणं संसार- | विज्ञानमें उपयोगी हैं उसके देवतामें
विषयमेव । यदि कर्मिण एव | लय होनारूप संसारविषयक परम
परमात्मविज्ञानमभविष्यत् संसा- | फलका उपसंहार किया जा चुका है।
रविषयस्यैव फलस्योपसंहारो | यदि कर्मीको ही परमात्माका साक्षात्
नोपापत्स्यत् । | ज्ञान हुआ करता तो संसारविषयक
अङ्गफलं तदिति चेन्न । तद्वि- | फलका उपसंहार ( अन्त ) होना
[हाशिया: देवताप्ययस्य ज्ञानाङ्गत्वनिरासः] रोध्यात्मवस्तुविषय- | कभी सम्भव ही न था ।
त्वादात्मविद्यायाः । | यदि कहो कि वह तो अङ्गफल-
निराकृतसर्वनामरूपकर्मपरमार्थ- | मात्र है * तो ऐसा कहना ठीक
त्मवस्तुविषयं ज्ञानममृतत्वसा- | नहीं, क्योंकि आत्मविद्या तो उसके
धनम् । गुणफलसंबन्धे हि नि- | विरोधी आत्मतत्त्वसे सम्बन्ध रखने-
राकृतसर्वविशेषात्मवस्तुविषयत्वं | वाली है । सब प्रकारके नाम, रूप
ज्ञानस्य न प्राप्नोति । तच्चानिष्टम्, | और कर्मसे रहित परमार्थ आत्मतत्त्व-
| से सम्बन्ध रखनेवाला आत्मज्ञान
| तो अमरत्वका साधन है । उससे
| गौण फलका सम्बन्ध माननेपर तो
| ज्ञानका सर्वविशेषशून्य आत्मवस्तुसे
| सम्बन्धित होना ही सिद्ध नहीं
| होता । और यह इष्ट नहीं है,


* अर्थात् देवतादयरूप जो संसारविषयक फल है वह कर्मका अंग—गौण
फल है, मुख्य फल तो परमात्माका साक्षात्कार ही है।

खण्ड १ ] \t\t शाङ्करभाष्यार्थ \t\t १९

खण्ड १ ] \t\t शाङ्करभाष्यार्थ \t\t १९
“यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्” | क्योंकि “जहाँ इसके लिये सब कुछ
(बृ० उ० २।४।१४) इत्य- | आत्मा ही हो गया है” इस प्रकार
धिकृत्य क्रियाकारकफलादि- | आरम्भ करके विद्वान्‌के लिये क्रिया,
सर्वव्यवहारनिराकरणाद्विदुषः । | कारक और फल आदि सम्पूर्ण
तद्विपरीतस्याविदुषो “यत्र हि | व्यवहारका निराकरण किया है ।
द्वैतमिव” (बृ० उ० २।४। | तथा उसके विपरीत अविद्वान्‌के
१४) इत्युक्त्वा क्रियाकारक- | लिये वाजसनेयिब्राह्मणमें “जहाँ कि
फलरूपस्यैव संसारस्य दर्शित- | द्वैतके समान होता है” ऐसा कहकर
त्वाच्च वाजसनेयिब्राह्मणे । तथे- | क्रिया, कारक और फलरूप संसार-
हापि देवताख्यं संसारविषयं | विषयको प्रदर्शित किया है । इसी
यत्फलमशनायादिमद्वस्त्वात्मकं | प्रकार यहाँ ( ऐतरेयोपनिषद्‌में )
तत्फलमुपसंहृत्य केवलं सर्वात्म- | भी जो क्षुधा-पिपासादियुक्त वस्तुरूप
कवस्तुविषयं ज्ञानममृतत्वाय | संसारविषयक देवताख्यसंज्ञक फल
वक्ष्यामीति प्रवर्तते । | है उसका उपसंहार कर अब केवल
ऋणप्रतिबन्धश्चाविदुष एव | सर्वात्मक वस्तुविषयक ज्ञानका ही
[ऋणप्रतिबन्ध-] मनुष्यपितृदेवलोक- | अमरत्व-प्राप्तिके लिये वर्णन करूँगी
[विचारः] प्राप्तिं प्रति, न | —ऐसे अभिप्रायसे श्रुति प्रवृत्त
विदुषः । “सोऽयं मनुष्यलोकः | होती है ।
पुत्रेणैव०” (बृ० उ० १।५। | तथा देवलोक, पितृलोक और
१६ ) इत्यादिलोकत्रयसाधन- | मनुष्यलोककी प्राप्तिमें ऋणोंका प्रति-
नियमश्रुतेः । विदुषश्च ऋणप्रति- | बन्ध तो अज्ञानीके ही लिये है, ज्ञानीके
| लिये नहीं, जैसा कि “उस इस मनुष्य-
| लोकको पुत्रके द्वारा ही [ जीता
| जा सकता है ]” इत्यादि लोकत्रयकी
| प्राप्तिके साधनका नियम करनेवाली
| श्रुतिसे सिद्ध होता है । तथा आत्म-
| लोकके इच्छुक विद्वान्‌के लिये

२० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १


[मूल एवं संस्कृत-टीका]

बन्धाभावो दर्शित आत्मलोका-
र्थिनः “किं प्रजया करिष्यामः”
(बृ० उ० ४ । ४ । २२)
इत्यादिना । तथा “एतद्ध स्म
वै तद्विद्वांस आहुर्ऋषयः काव-
षेयाः” इत्यादि । “एतद्ध स्म वै
तत्पूर्वे विद्वांसोऽग्निहोत्रं न जुह-
वाञ्चक्रुः” (कौषी० २।५)
इति च कौषीतकिनाम् ।
अस्त्विदं तर्हि ऋणानपाकरणे
पारिव्राज्यानुपपत्तिरिति चेत् ?
न; प्राग्गार्हस्थ्यप्रतिपत्तेर्ऋणि-
त्वासंभवात् । अधिकाराना-
रूढोऽप्यृणी चेत्स्यात् सर्वस्य
ऋणित्वमित्यनिष्टं प्रसज्येत। प्रति-
पन्नगार्हस्थ्यस्यापि “गृहाद्वनी
भूत्वा प्रव्रजेद्यदि वेतरथा ब्रह्म-
चर्यादेव प्रव्रजेद्गृहाद्वा वनाद्वा”
(जा० उ० ४) इत्यात्मदर्शनो-
पायसाधनत्वेनेष्यत एव पारिव्रा-


[हिन्दी-अनुवाद]

“हम प्रजासे क्या करेंगे ?” इत्यादि
वाक्योंद्वारा ऋणोंके प्रतिबन्धका
अभाव दिखलाया है । इसी प्रकार
“वे प्रसिद्ध आत्मवेत्ता कावषेय
ऋषि बोले-[ मैं अध्ययन कैसे
करूँ ? होम कैसे करूँ ?]”
इत्यादि श्रुति है तथा ऐसी ही
“उस इस आत्मतत्त्वको जाननेवाले
पूर्ववर्ती विद्वान् अग्निहोत्र नहीं करते
थे” यह कौषीतकी शाखाकी श्रुति है।
पूर्व०-तब विद्वान्‌के लिये तो
ऋणोंका परिशोध बिना किये
संन्यास करना बन नहीं सकता ?
सिद्धान्ती-यह बात नहीं है,
क्योंकि गृहस्थाश्रमकी प्राप्तिसे पूर्व
तो ऋणित्व ही असम्भव है। यदि
अधिकारासढ न हुआ पुरुष भी ऋणी
हो सकता है तो सभीका ऋणी होना
सिद्ध होगा और इस प्रकार बड़ा
अनिष्ट प्राप्त होगा । जो गृहस्थाश्रम-
को प्राप्त हो गया है उस पुरुषके
लिये भी “गृहस्थाश्रमसे वानप्रस्थ
होकर संन्यास करे अथवा [ इस
क्रमको छोड़कर ] अन्य प्रकारसे
यानी ब्रह्मचर्यसे, गृहस्थाश्रमसे
अथवा वानप्रस्थाश्रमसे ही संन्यास
कर दे” इत्यादि श्रुतियोंद्वारा आत्म-
दर्शनके साधनके उपायरूपसे

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१

ज्यम् । यावज्जीवादिश्रुतीनाम- संन्यास प्राप्त हो ही जाता है ।
विद्वदमुमुक्षुविषये अविद्वान् और अमुमुक्षु पुरुषोंके
यावज्जीवादि- विषयमें "यावज्जीवन अग्निहोत्र करे"
श्रुतीनाम- कृतार्थता। छान्दोग्ये
विद्वद्विषयत्वम् इत्यादि श्रुतियोंकी भी कृतार्थता है ।
च केषांचिद् द्वादश- छान्दोग्यमें तो किन्हीं-किन्हींके लिये
रात्रमग्निहोत्रं हुत्वा तत ऊर्ध्वं बारह रात्रि अग्निहोत्र करके तदनन्तर
परित्यागः श्रूयते । उसका परित्याग करना सुना
जाता है ।
यत्त्वनधिकृतानां पारिव्राज्य- और तुमने जो कहा कि जिन्हें
संन्यासस्य मिति, तन्न, तेषां कर्मका अधिकार नहीं है उन्हींके
कर्मानधिकारि- पृथगेव "उत्सन्ना- लिये संन्यासका विधान है, सो
विषयत्वनिरासः ग्निरनग्निको वा" ऐसी बात नहीं है, क्योंकि उनके
विषयमें "उत्सन्नाग्निरनग्निको वा" *
इत्यादिश्रवणात् । सर्वस्मृतिषु इत्यादि अलग ही श्रुति है । तथा
चाविशेषेणाश्रमविकल्पः प्रसिद्धः समस्त स्मृतियोंमें भी आश्रमोंका
समुच्चयश्च । विकल्प १ और समुच्चय सामान्यरूपसे
प्रसिद्ध ही है ।
यत्तु विदुषोऽर्थप्राप्तं व्युत्थान- तथा यह जो कहा कि विद्वान्-
व्युत्थानविधि- मित्यशास्त्रार्थत्वे, को जो कर्मत्यागकी स्वतः प्राप्ति
विचारः गृहे वने वा बतलायी है, सो शास्त्रका विषय न
होनेके कारण उसके घर या वनमें
तिष्ठतो न विशेष इति, रहनेमें कोई विशेषता नहीं है;

  • जिसके अग्निहोत्रकी अग्नि प्रमादवश शान्त हो गयी है अथवा जिसने
    अग्निका परिग्रह नहीं किया है ।
    १. क्रमकी अपेक्षा न करके जिस आश्रमसे संन्यास लेनेकी इच्छा हो
    उसीसे ले लेना ।
    २. एक आश्रमसे दूसरे आश्रममें क्रमानुसार जाना ।

२२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
तदसद्; व्युत्थानस्यैवार्थ- | ऐसा कहना ठीक नहीं ।
प्राप्तत्वान्नान्यत्रावस्थानं स्यात् । | व्युत्थानके स्वतः प्राप्त होनेके कारण ही उसकी अन्यत्र [ यानी
अन्यत्रावस्थानस्य कामकर्म- | गृहस्थाश्रममें ] स्थिति नहीं हो सकती । अन्यत्र स्थितिको तो हमने
प्रयुक्तत्वं ह्यवोचाम, तदभाव- | कामना और कर्मसे प्रेरित ही बतलाया है; और उसके अभावको
मात्रं व्युत्थानमिति च । | ही व्युत्थान कहा है ।
यथाकामित्वं तु विदुषोऽत्यन्त- | स्वेच्छाचार तो अत्यन्त मूढ़का
[विदुषो यथा-] मप्राप्तं अत्यन्तमूढ- | विषय समझा गया है, इसलिये विद्वान्
[कामित्वनिषेधः] विषयत्वेनावगमात् । | के लिये वह अत्यन्त अप्राप्त है। तथा विद्वान्‌के लिये तो अत्यन्त भाररूप
तथा शास्त्रचोदितमपि कर्म | होनेके कारण शास्त्रोक्त कर्मकी भी
आत्मविदोऽप्राप्तं गुरुभारताव- | अप्राप्ति समझी जाती है । फिर
गम्यते । किमुतात्यन्ताविवेक- | अत्यन्त अविवेकके कारण होनेवाले स्वेच्छाचारकी तौ बात ही क्या है?
निमित्तं यथाकामित्वम् । न हि | उन्माद अथवा तिमिररोगसे दूषित
उन्मादतिमिरदृष्ट्युपलब्धं वस्तु | दृष्टिद्वारा उपलब्ध हुई वस्तु उसके निवृत्त हो जानेपर भी वैसी ही
तदपगमेऽपि तथैव स्यात् । | नहीं रहती, क्योंकि वह तो उन्माद
उन्मादतिमिरदृष्टिनिमित्तत्वादेव | अथवा तिमिरदृष्टिके कारण ही वैसी प्रतीत होती है । अतः यह
तस्य । तस्मादात्मविदो व्यु- | सिद्ध हुआ कि आत्मवेत्ताके लिये
त्थानव्यतिरेकेण न यथाकामित्वं | व्युत्थानको छोड़कर न तो स्वेच्छा-चार ही है और न कोई अन्य
न चान्यत्कर्तव्यमित्येतत्सिद्धम् । | कर्तव्य ही शेष रहता है ।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३


मूल एवं भाष्यभाष्यार्थ
यत्तु—“विद्यां चाविद्यां च<br><sub>[हाशिया: विदुषो ज्ञानकर्म-समुच्चयानुपपत्तिः]</sub> यस्तद्वेदोभयँसह” ( ई० उ० ११ ) इति न विद्यावतो विद्यया सहाविद्यापि वर्तते इत्ययमर्थः; कस्तर्हि एकस्मिन्पुरुषे एते एकदैव न सह संबध्येयातामित्यर्थः । यथा शुक्तिकायां रजतशुक्तिकाज्ञाने एकस्य पुरुषस्य । “दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता” ( क० उ० १ । २ । ४ ) इति हि काठके । तस्मान्न विद्यायां सत्यामविद्यासंभवोऽस्ति ।तथा ऐसा जो कहा है कि “जो पुरुष विद्या और अविद्या दोनोंको साथ-साथ जानता है” वह इसलिये नहीं है कि विद्वान्में विद्याके साथ अविद्या भी रहती है। तो फिर उसका क्या प्रयोजन है ? उसका तात्पर्य तो यही है कि एक ही पुरुषमें ये दोनों साथ-साथ नहीं रह सकते; जिस प्रकार कि सीपीमें एक पुरुषको [ एक ही समय ] चाँदी और सीपी दोनोंका ज्ञान नहीं हो सकता । कठोपनिषद्‌में भी कहा है—“जो विद्या और अविद्या नामसे जानी जाती हैं वे परस्पर अत्यन्त विपरीत (विरुद्ध स्वभाववाली) हैं ।” अतः विद्याके रहते हुए अविद्याका रहना किसी प्रकार सम्भव नहीं है ।
“तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व” ( तै० उ० ३ । २ ) इत्यादि-श्रुतेः, तपआदि विद्योत्पत्तिसाधनं गुरुपासनादि च कर्म अविद्यात्मकत्वादविद्योच्यते तेन विद्यामुत्पाद्य मृत्युं काममतितरति । ततो निष्कामस्त्यक्तैषणो ब्रह्मविद्यया अमृतत्वमश्नुत इत्ये-“तपसे ब्रह्मको जाननेकी इच्छा कर” इत्यादि श्रुतिके अनुसार तप आदि विद्योत्पत्तिके साधन और गुरुकी उपासना आदि कर्म अविद्यामय होनेके कारण 'अविद्या' कहे जाते हैं । उस अविद्यारूप कर्मसे विद्याको उत्पन्न करके वह मृत्यु यानी कामनाको पार कर जाता है। तब वह निष्काम और एषणामुक्त पुरुष ब्रह्मविद्यासे अमरत्व प्राप्त कर लेता है—

२४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

२४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
तमर्थं दर्शयन्नाह—"अविद्यया | इसी अर्थको प्रदर्शित करते हुए कहते
मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते" | हैं कि "अविद्यासे मृत्युको पारकर
(ई० उ० ११) इति । | विद्यासे अमरत्व प्राप्त कर लेता है।"
यत्तु पुरुपायुः सर्वं कर्मणैव | "कर्म करते हुए ही सौ वर्षतक
[उपसंहारः] व्याप्तं "कुर्वन्नेवेह | जीवित रहनेकी इच्छा करे" इस
कर्माणि जिजीवि- | मन्त्रद्वारा जो यह कहा गया था कि
षेच्छत्ँ समाः" (ई० उ० २) | पुरुषकी सारी आयु कर्मसे ही व्याप्त है
इति तदविद्वद्विषयत्वेन परिहृत- | उसका 'वह अविद्वान्‌से सम्बन्ध रखने-
मितरथासंभवात् । यत्तु वक्ष्य- | वाला है'—ऐसा बतलाकर खण्डन कर
माणमपि पूर्वोक्ततुल्यत्वात्कर्म- | दिया गया, क्योंकि अन्य प्रकार वैसा
णाविरुद्धमात्मज्ञानमिति, तत्स- | होना असम्भव है । तथा तुमने जो
विशेषनिर्विशेषतात्मतया प्रत्युक्तम्, | कहा था कि आगे कहा जानेवाला
उत्तरत्र व्याख्याने च दर्शयि- | आत्मज्ञान भी पूर्वोक्त [श्रुतिकथित]
ष्यामः । अतः केवलनिष्क्रिय- | ज्ञानके तुल्य होनेके कारण कर्मसे
ब्रह्मात्मैकत्वविद्यादर्शनार्थमुत्तरो | अविरुद्ध ही है उस कथनको भी
ग्रन्थ आरभ्यते— | सविशेष और निर्विशेष आत्मविषयक
| बतलाकर खण्डन कर चुके हैं और
| आगेकी व्याख्यामें इसका दिग्दर्शन भी
| करायेंगे। अब यहाँसे केवल निष्क्रिय
| ब्रह्म और आत्माकी एकताका ज्ञान
| प्रदर्शित करनेके लिये आगेका ग्रन्थ
| आरम्भ किया जाता है—
आत्माके ईक्षणपूर्वक सृष्टि
ॐ आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् । नान्य-
त्किंचन मिषत् । स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति ॥ १ ॥

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५
❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦
पहले यह [ जगत् ] एकमात्र आत्मा ही था; उसके सिवा और
कोई सक्रिय वस्तु नहीं थी । उसने यह सोचा कि 'लोकोंकी रचना
करूँ' ॥ १ ॥
आत्मा आप्नोतेरत्तेरततेर्वा | [व्याप्तिबोधक] 'आप्',[भक्षणा-
परः सर्वज्ञः सर्वशक्तिरशनाया- | र्थक] 'अद्' अथवा [सतत गमन-
| बोधक ] 'अत्' धातुसे 'आत्मा'
दिशर्वसंसारधर्मवर्जितो नित्य- | शब्द निष्पन्न हुआ है । यह जो
| नाम, रूप और कर्मके भेदसे विविध-
शुद्धबुद्धमुक्तस्वभावोऽजोऽजरो- | रूप प्रतीत होनेवाला जगत् कहा गया
| है वह पहले यानी संसारकी सृष्टिसे
ऽमरोऽमृतोऽभयोऽद्वयो वै; इदं | पूर्व सर्वश्रेष्ठ, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्,
| क्षुधा-पिपासा आदि सम्पूर्ण सांसारिक
यदुक्तं नामरूपकर्मभेदभिन्नं जग- | धर्मोंसे रहित, नित्य-शुद्ध-बुद्ध-
दात्मैवैकोऽग्रे जगतः सृष्टेः | मुक्तस्वभाव, अजन्मा, अजर, अमर,
| अमृत, अभय और अद्वयरूप आत्मा
प्रागासीत् । | ही था ।
किं नेदानीं स एवैकः ? | पूर्व०-क्या इस समय भी एक-
| मात्र वही नहीं है ?
न । | सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है।
कथं तर्ह्यासीदित्युच्यते ? | पूर्व०-तो फिर 'आसीत् (था)'
| ऐसा क्यों कहा है ?
यद्यपीदानीं स एवैकस्तथा- | सिद्धान्ती-यद्यपि इस समय भी
| अकेला वही है तो भी कुछ विशेषता
प्यस्ति विशेषः । प्रागुत्पत्तेरव्या- | अवश्य है । [वह विशेषता यही
| है कि ] उत्पत्तिसे पूर्व यह
कृतनामरूपभेदमात्मभूतमात्मैक- | जगत् नाम-रूपादि भेदके व्यक्त न
| होनेके कारण आत्मभूत और एक
शब्दप्रत्ययगोचरं जगदिदानीं | 'आत्मा' शब्दकी प्रतीतिका ही
ऐतरेयो० २—

२६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

व्याकृतनामरूपभेदत्वादनेकश्- | विषय था और इस समय नाम-
ब्दप्रत्ययगोचरमात्मैकशब्दप्रत्य- | रूपादि भेदके व्यक्त हो जानेसे वह अनेक शब्दोंकी प्रतीतिका विषय
यगोचरं चेति विशेषः । | तथा एकमात्र ‘आत्मा’ शब्दकी प्रतीतिका विषय भी हो रहा है ;
यथा सलिलात्पृथक्फेननाम- | जिस प्रकार जलसे पृथक् फेनके नाम और रूपकी अभिव्यक्ति होनेसे
रूपव्याकरणात्प्राक्सलिलैकशब्द- | पूर्व फेन एकमात्र ‘जल’ शब्दकी प्रतीतिक ही विषय था; किन्तु जिस
प्रत्ययगोचरमेव फेनम्, यदा | समय वह जलसे अलग नाम और रूप-
सलिलात्पृथङ्नामरूपभेदेन व्या- | के भेदसे व्यक्त हो जाता है उस समय
कृतं भवति तदा सलिलं फेनं | वह फेन ‘जल’ और ‘फेन’ इस प्रकार अनेक शब्दोंकी प्रतीतिका विषय
चेत्यनेकशब्दप्रत्ययभाक्सलिल- | तथा केवल ‘जल’ इस एक शब्द-
मेवेति चैकशब्दप्रत्ययभाक्च | की प्रतीतिका विषय भी हो जाता है; उसी प्रकार [ उपर्युक्त भेद भी
फेनं भवति तद्वत् । | समझना चाहिये ] ।
नान्यत्किंचन न किंचिदपि | उसके सिवा अन्य कोई व्यापार-
मिषन्निमिषद् व्यापारवदितरद्वा । | युक्त अथवा निष्क्रिय वस्तु नहीं थी ।
यथा सांख्यानामात्मपक्षपाति | जिस प्रकार सांख्यवादियोंके मतमें आत्मासे अतिरिक्त स्वतन्त्र प्रधान
स्वतन्त्रं प्रधानं यथा च काणा- | था, तथा कणादमतावलम्बियोंके
दानामणवो न तद्वदिहान्य- | विचारमें परमाणु थे उस प्रकार इस (औपनिषद सिद्धान्त) में आत्मासे
दात्मनः किंचिदपि वस्तु विद्यते । | अतिरिक्त और कोई वस्तु नहीं थी ।
किं तर्हि ? आत्मैवैक आसीदित्य- | तो फिर क्या था ? एकमात्र आत्मा
भिप्रायः । | ही था—यह इसका अभिप्राय है ।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७
स सर्वज्ञस्वाभाव्याद् आत्मा | सर्वज्ञस्वभाव होनेके कारण
एक एव सन्नीक्षत । ननु प्रागु- | उस आत्माने अकेले होते हुए ही
त्पत्तेरकार्यकरणत्वात्कथमीक्षित- | ईक्षण (चिन्तन) किया। यदि
वान् । नायं दोषः, सर्वज्ञस्वाभा- | कहो कि जगत्‌की उत्पत्तिसे पूर्व
व्यात्; तथा च मन्त्रवर्णः- | कार्य और करणका अभाव रहते
"अपाणिपादो जवनो ग्रहीता" | हुए भी उसने किस प्रकार ईक्षण
(श्वे० उ० ३ । १९) इत्यादिः। | किया ? तो यह कोई दोषकी बात
केनाभिप्रायेणेत्याह-लोकान् | नहीं है, क्योंकि वह आत्मा स्वभाव-
अम्भःप्रभृतीन् प्राणिकर्मफलोप- | से ही सर्वज्ञ है। इस विषयमें "हाथ-
भोगस्थानभूतान्नु सृजै सृजेऽह- | पाँववाला न होकर भी वेगवान् और
मिति ॥ १ ॥ | ग्रहण करनेवाला है" इत्यादि मन्त्र-
वर्ण भी है। उसने किस अभिप्रायसे
ईक्षण किया ? इसपर श्रुति कहती
है-'मैं प्राणियोंके कर्मफलोपभोगके
आश्रयभूत अम्भ आदि लोकोंकी
रचना करूँ' इस प्रकार ईक्षण
किया ॥ १ ॥

सृष्टिक्रम

एवमीक्षित्वा आलोच्य— | इस प्रकार ईक्षण यानी आलोचना
करके—

स इमाँल्लोकानसृजत । अम्भो मरीचीर्मरमापो-
दोऽम्भः परेण दिवं द्यौः प्रतिष्ठान्तरिक्षं मरीचयः पृथिवी
मरो या अधस्तात्ता आपः ॥ २ ॥

२८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

२८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
उसने अम्भ, मरीचि, मर और आप्—इन लोकोंकी रचना की।
जो द्युलोकसे परे है और स्वर्ग जिसकी प्रतिष्ठा है वह 'अम्भ' है,
अन्तरिक्ष (भुवर्लोक) 'मरीचि' है, पृथिवी 'मर-लोक' है और जो
[पृथिवीके] नीचे है वह 'आप' है ॥ २ ॥
स आत्मेमाँल्लोकानसृजत | उस आत्माने इन लोकोंकी
रचना की। जिस प्रकार इस लोकमें
सृष्टवान् । यथेह बुद्धिमांस्तक्षादि- | बुद्धिमान् शिल्पकार आदि 'मैं
इस प्रकारके महल आदि बनाऊँ'
रेवंप्रकारान्प्रासादादीन्सृज इति | ऐसा विचार करके उस विचारके
ईक्षित्वेक्षानन्तरं प्रासादादीन्सृज- | अनन्तर ही महल आदिकी रचना
करते हैं उसी प्रकार [उसने ईक्षण
ति तद्वत् । | करके इन लोकादिकी रचना की] ।
ननु सोपादानस्तक्षादिः प्रा- | शंका—शिल्पकारादि तो उन
महल आदिकी उपादान सामग्रीसे
सादादीन्सृजतीति युक्तं निरुपा- | युक्त होते हैं इसलिये वे महल
आदिकी रचना करते हैं—ऐसा कहना
दानस्त्वात्मा कथं लोकान् | ठीक ही है; किन्तु उपादान (सामग्री)
से रहित आत्मा किस प्रकार
सृजति ? | लोकोंकी रचना करता है ?
नैष दोषः; सलिलफेनस्था- | समाधान—यह कोई दोष नहीं
[निरुपादानस्य] नीये आत्मभूते | है, क्योंकि जलमें [व्यक्त न हुए]
[आत्मनः सृष्टि-] नामरूपे अव्याकृते | फेनस्थानीय अव्याकृत नाम और
[कर्तृत्वम्] रूप, जो आत्मस्वरूप और एकमात्र
आत्मैकशब्दवाच्ये | 'आत्मा' शब्दके ही वाच्य हैं,
व्याकृतफेनस्थानीयस्य जगतः | व्याकृत फेनस्वरूप जगत्के उपादान
उपादानभूते संभवतः । तस्माद् | हो सकते हैं। अतः वह सर्वज्ञ

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९

आत्मभूतनामरूपोपादानभूतः | आत्मा अपने आत्मभूत नाम और
सन्सर्वज्ञो जगन्निर्मिमीत इत्य- | रूपका उपादानस्वरूप होकर जगत्-
विरुद्धम् । | की रचना करता है—इसमें कोई
| विरोध नहीं है ।
अथवा, यथा विज्ञानवान्मा- | अथवा जिस प्रकार बुद्धियुक्त
यावी निरुपादान आत्मानमेव | मायावी कोई उपादान न होनेपर
आत्मान्तरत्वेनाकाशेन गच्छन्त- | भी स्वयं अपनेहीको अपने अन्यरूपसे
मिव निर्मिमीते, तथा सर्वज्ञो | आकाशमें चलता हुआ-सा बना लेता
देवः सर्वशक्तिर्महामाय आत्मान- | है, उसी प्रकार वह सर्वशक्तिमान्,
मेवान्तरत्वेन जगद्रूपेण नि- | महामायावी, सर्वज्ञ देव अपनेहीको
र्मिमीत इति युक्ततरम् । एवं च | जगत्-रूप अपने अन्य स्वरूपसे रच
सति कार्यकारणोभयासद्वाद्यादि- | लेता है—यह बहुत युक्तियुक्त ही
पक्षाश्च न प्रसज्यन्ते सुनिरा- | है । ऐसा होनेपर कार्य और कारण-
कृताश्च भवन्ति । | इन दोनोंको असत् बतलानेवालोंके
| [असद्वाद आदि] पक्षोंकी प्राप्ति नहीं
| होती, और उनका पूर्णतया निरा-
| करण हो जाता है ।
कांल्लोकानसृजतेत्याह- | उसने किन लोकोंकी रचना
[आत्मसृष्ट- अम्भो मरीचीर्मरमाप | की ? इसपर कहते हैं—अम्भ,
लोकाख्यानम् इति । आकाशादि- | मरीची, मर और आप आदिकी ।
क्रमेण अण्डमुत्पाद्याम्भःप्रभृतीन् | उसने आकाशादि क्रमसे अण्डको
लोकानसृजत । तत्राम्भःप्रभृतीन् | उत्पन्न कर अम्भ आदि लोकोंकी
स्वयमेव व्याचष्टे श्रुतिः । | रचना की । उन अम्भ आदि लोकों-
| की श्रुति स्वयं ही व्याख्या करती है ।
अदस्तदम्भःशब्दवाच्यो लोकः, | अदः—वह 'अम्भ' शब्दसे कहा
परेण दिवं द्युलोकात्परेण पर- | जानेवाला लोक है, जो द्युलोकसे
स्तात्; सोऽम्भःशब्दवाच्यः, अम्भो- | परे है; वह जल (मेघों) को धारण

३० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

३० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
भरणात् । द्यौः प्रतिष्ठाश्रयस्तस्या- | करनेवाला होनेसे 'अम्भ' शब्दसे
| कहा जाता है। उस अम्भलोकका
म्भसो लोकस्य । द्युलोकादधस्ता- | द्युलोक प्रतिष्ठा यानी आश्रय है।
| द्युलोकसे नीचे जो अन्तरिक्ष है वह
दन्तरिक्षं यत्तन्मरीचयः । ए- | मरीचि लोक है। वह एक होनेपर भी
| अनेकों स्थानभेदोंके कारण 'मरीचयः'
कोऽप्यनेकस्थानभेदत्वाद्वहुवच- | इस प्रकार बहुवचनरूपसे प्रयुक्त
नभाक्-मरीचय इति; मरीचि- | हुआ है। अथवा किरणोंसे सम्बन्धित
| होनेके कारण वह 'मरीचि' कह-
भिर्वा रश्मिभिः सम्बन्धात् । पृथिवी | लाता है। पृथिवी 'मर' है, क्योंकि
| उसमें प्राणी मरते हैं। जो लोक
मरो म्रियन्तेऽस्मिन् भूतानीति । | पृथिवीसे नीचेकी ओर हैं वे 'आप'
| कहलाते हैं, क्योंकि 'अप्' शब्द
या अधस्तात् पृथिव्यास्ता आप | [नीचेके लोकोंमें रहनेवाले प्राणियों-
| द्वारा प्राप्य होनेके कारण प्राप्तिरूप
उच्यन्ते; आप्नोतेः, लोकाः । यद्यपि | अर्थवाले ] 'आप्' धातुसे बना हुआ
| है। यद्यपि सभी लोक पञ्चभूतमय
पञ्चभूतात्मकत्वं लोकानां तथा- | हैं तथापि अम्भ, मरीचि, मर और
प्यब्बाहुल्यादब्नामभिरेवाम्भो | आप-ये लोक आप (जल) की
| अधिकता होनेके कारण 'आप'
मरीचीर्मरमाप इत्युच्यन्ते ॥२॥ | ही कहे जाते हैं ॥ २ ॥
पुरुषरूप लोकपालकी रचना
सर्वप्राणिकर्मफलोपादानाधि- | सम्पूर्ण प्राणियोंके कर्मफलरूप
ष्ठानभूतांश्चतुरो लोकान् सृष्ट्वा- | उपादानके अधिष्ठानभूत चारों
| लोकोंकी रचना कर-
स ईक्षतेमे नु लोका लोकपालान्नु सृजा इति सोऽद्भ्य
एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्छयत् ॥ ३ ॥

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१

उसने ईक्षण (विचार) किया कि—'ये लोक तो तैयार हो गये,
अब लोकपालोंकी रचना करूँ'—ऐसा सोचकर उसने जलमेंसे ही एक
पुरुष निकालकर अवयवयुक्त किया ॥ ३ ॥

स ईश्वरः पुनरेवेक्षत । इमे नु | उस ईश्वरने फिर भी ईक्षण
अम्भःप्रभृतयो मया सृष्टा लोकाः | (विचार) किया । मेरे रचे हुए ये
परिपालयितृवर्जिता विनश्येयुः; | अम्भ आदि लोक बिना किसी
तस्मादेषां रक्षणार्थं लोकपालाँ- | रक्षकके नष्ट हो जायँगे । अतः इनकी
ल्लोकानां पालयितॄन्नु सृजै | रक्षाके लिये मैं लोकपालोंकी—
सृजेऽहमिति । | लोकोंकी रक्षा करनेवालोंकी रचना करूँ ।
एवमीक्षित्वा सोऽद्भ्य एव | ऐसा सोच कर उसने जलसे—
अप्रधानेभ्य एव पञ्चभूतेभ्यो | जलप्रधान पञ्चभूतोंसे अर्थात् जिनसे
येभ्योऽम्भःप्रभृतीन्ससृजांस्तेभ्य | उसने अम्भ आदि लोकोंकी रचना
एवेत्यर्थः । पुरुषं पुरुषाकारं | की थीं उन्हींसे पुरुष यानी शिर और
शिरःपाण्यादिमन्तं समुद्धृत्य | हाथ आदि वाले पुरुषाकारको, जिस
अद्भ्यः समुपादाय मृत्पिण्डमिव | प्रकार कुम्हार पृथिवीसे मिट्टीका पिण्ड
कुलालः पृथिव्याः, अमूर्च्छयत् | निकालता है, उसी प्रकार निकाल-
मूर्च्छितवान् संपिण्डितवान् स्वाव- | कर मूर्च्छित किया अर्थात् अवयवोंकी
यवसंयोजनेनेत्यर्थः ॥ ३ ॥ | योजना कर उसको बढ़ाया ॥ ३ ॥

इन्द्रियगोलक, इन्द्रिय और इन्द्रियाधिष्ठाता देवताओंकी उत्पत्ति
तमभ्यतपत्तस्याभितप्तस्य मुखं निरभिद्यत यथाण्डं
मुखाद्वाग्वाचोऽग्निर्नासिके निरभिद्येतां नासिकाभ्यां प्राणः
प्राणाद्वायुरक्षिणी निरभिद्येतामक्षिभ्यां चक्षुश्चक्षुष आदित्यः