ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
ब्रह्मचर्यादिविद्यासाधनानां च | साधन ब्रह्मचर्यादिकी सिद्धि भी सम्यक्
साकल्येनात्याश्रमिषूपपत्तेर्गाहं- | रीतिसे संन्यासियोंमें ही हो सकती है,
स्थ्येऽसंभवात् । न चासंपन्नं साधनं | क्योंकि गृहस्थाश्रममें उन साधनोंका
कस्यचिदर्थस्य साधनायालम् । | होना असम्भव है; और अपूर्ण साधन
यद्विज्ञानोपयोगीनि च गार्हस्थ्या- | किसी अर्थको सिद्ध करनेमें समर्थ
श्रमकर्माणि तेषां परमफलमुप- | नहीं है । गृहस्थाश्रमके कर्म जिस
संहृतं देवताप्पयलक्षणं संसार- | विज्ञानमें उपयोगी हैं उसके देवतामें
विषयमेव । यदि कर्मिण एव | लय होनारूप संसारविषयक परम
परमात्मविज्ञानमभविष्यत् संसा- | फलका उपसंहार किया जा चुका है।
रविषयस्यैव फलस्योपसंहारो | यदि कर्मीको ही परमात्माका साक्षात्
नोपापत्स्यत् । | ज्ञान हुआ करता तो संसारविषयक
अङ्गफलं तदिति चेन्न । तद्वि- | फलका उपसंहार ( अन्त ) होना
[हाशिया: देवताप्ययस्य ज्ञानाङ्गत्वनिरासः] रोध्यात्मवस्तुविषय- | कभी सम्भव ही न था ।
त्वादात्मविद्यायाः । | यदि कहो कि वह तो अङ्गफल-
निराकृतसर्वनामरूपकर्मपरमार्थ- | मात्र है * तो ऐसा कहना ठीक
त्मवस्तुविषयं ज्ञानममृतत्वसा- | नहीं, क्योंकि आत्मविद्या तो उसके
धनम् । गुणफलसंबन्धे हि नि- | विरोधी आत्मतत्त्वसे सम्बन्ध रखने-
राकृतसर्वविशेषात्मवस्तुविषयत्वं | वाली है । सब प्रकारके नाम, रूप
ज्ञानस्य न प्राप्नोति । तच्चानिष्टम्, | और कर्मसे रहित परमार्थ आत्मतत्त्व-
| से सम्बन्ध रखनेवाला आत्मज्ञान
| तो अमरत्वका साधन है । उससे
| गौण फलका सम्बन्ध माननेपर तो
| ज्ञानका सर्वविशेषशून्य आत्मवस्तुसे
| सम्बन्धित होना ही सिद्ध नहीं
| होता । और यह इष्ट नहीं है,
* अर्थात् देवतादयरूप जो संसारविषयक फल है वह कर्मका अंग—गौण
फल है, मुख्य फल तो परमात्माका साक्षात्कार ही है।