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ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 108 में से

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पृष्ठ 30

२० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १


[मूल एवं संस्कृत-टीका]

बन्धाभावो दर्शित आत्मलोका-
र्थिनः “किं प्रजया करिष्यामः”
(बृ० उ० ४ । ४ । २२)
इत्यादिना । तथा “एतद्ध स्म
वै तद्विद्वांस आहुर्ऋषयः काव-
षेयाः” इत्यादि । “एतद्ध स्म वै
तत्पूर्वे विद्वांसोऽग्निहोत्रं न जुह-
वाञ्चक्रुः” (कौषी० २।५)
इति च कौषीतकिनाम् ।
अस्त्विदं तर्हि ऋणानपाकरणे
पारिव्राज्यानुपपत्तिरिति चेत् ?
न; प्राग्गार्हस्थ्यप्रतिपत्तेर्ऋणि-
त्वासंभवात् । अधिकाराना-
रूढोऽप्यृणी चेत्स्यात् सर्वस्य
ऋणित्वमित्यनिष्टं प्रसज्येत। प्रति-
पन्नगार्हस्थ्यस्यापि “गृहाद्वनी
भूत्वा प्रव्रजेद्यदि वेतरथा ब्रह्म-
चर्यादेव प्रव्रजेद्गृहाद्वा वनाद्वा”
(जा० उ० ४) इत्यात्मदर्शनो-
पायसाधनत्वेनेष्यत एव पारिव्रा-


[हिन्दी-अनुवाद]

“हम प्रजासे क्या करेंगे ?” इत्यादि
वाक्योंद्वारा ऋणोंके प्रतिबन्धका
अभाव दिखलाया है । इसी प्रकार
“वे प्रसिद्ध आत्मवेत्ता कावषेय
ऋषि बोले-[ मैं अध्ययन कैसे
करूँ ? होम कैसे करूँ ?]”
इत्यादि श्रुति है तथा ऐसी ही
“उस इस आत्मतत्त्वको जाननेवाले
पूर्ववर्ती विद्वान् अग्निहोत्र नहीं करते
थे” यह कौषीतकी शाखाकी श्रुति है।
पूर्व०-तब विद्वान्‌के लिये तो
ऋणोंका परिशोध बिना किये
संन्यास करना बन नहीं सकता ?
सिद्धान्ती-यह बात नहीं है,
क्योंकि गृहस्थाश्रमकी प्राप्तिसे पूर्व
तो ऋणित्व ही असम्भव है। यदि
अधिकारासढ न हुआ पुरुष भी ऋणी
हो सकता है तो सभीका ऋणी होना
सिद्ध होगा और इस प्रकार बड़ा
अनिष्ट प्राप्त होगा । जो गृहस्थाश्रम-
को प्राप्त हो गया है उस पुरुषके
लिये भी “गृहस्थाश्रमसे वानप्रस्थ
होकर संन्यास करे अथवा [ इस
क्रमको छोड़कर ] अन्य प्रकारसे
यानी ब्रह्मचर्यसे, गृहस्थाश्रमसे
अथवा वानप्रस्थाश्रमसे ही संन्यास
कर दे” इत्यादि श्रुतियोंद्वारा आत्म-
दर्शनके साधनके उपायरूपसे