ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 26विदुषः प्रत्युक्तमशक्यनियोज्य- | अविषय होनेके कारण विद्वान्
अर्थप्राप्तप्रवृत्तिनियमोऽपि प्र- | पूर्व०—परन्तु प्रयोजनका अभाव
१६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
विदुषः प्रत्युक्तमशक्यनियोज्य- | अविषय होनेके कारण विद्वान्
त्वाच्चेति । | नियुक्त नहीं किया जा सकता ।
यावज्जीवादिनित्यचोदनानर्थ- | पूर्व०—तब तो 'यावज्जीवन
| अग्निहोत्र करे' इत्यादि नित्य विधिकी
क्यमिति चेत् ? | व्यर्थता ही सिद्ध होती है ।
न, अविद्वद्विषयत्वेनार्थव- | सिद्धान्ती—नहीं, अविद्वान्-
| विषयक होनेके कारण वह सार्थक
त्त्वात् । यत्तु भिक्षोः शरीरधार- | है । केवल शरीरधारणमात्रके लिये
| भिक्षाटनादिमें प्रवृत्त हुए यतिकी
णमात्रप्रवृत्तस्य प्रवृत्तेर्नियतत्वं | प्रवृत्तिका जो नियतत्व है वह
तत्प्रवृत्तेर्न प्रयोजकम् । आचमन- | प्रवृत्तिका प्रयोजक नहीं है ।
| आचमनमें प्रवृत्त हुए पुरुषकी
प्रवृत्तस्य पिपासापगमवन्नान्यप्र- | पिपासानिवृत्तिके समान उसके
| भिक्षाटनादिका [क्षुधानिवृत्ति आदि-
योजनार्थत्वमवगम्यते । न चा- | के सिवा] कोई अन्य प्रयोजन नहीं
| समझा जाता । परन्तु इसके समान
ग्निहोत्रादीनां तद्वदर्थप्राप्तप्रवृत्ति- | अग्निहोत्रादि कर्मोंका स्वतःप्राप्त
| प्रवृत्तिको नियत करना नहीं माना
नियतत्वोपपत्तिः । | जा सकता ।*
अर्थप्राप्तप्रवृत्तिनियमोऽपि प्र- | पूर्व०—परन्तु प्रयोजनका अभाव
| हो जानेपर तो स्वतःप्राप्त प्रवृत्तिका
योजनाभावेऽनुपपन्न एवेति चेत् ? | नियम भी व्यर्थ ही है ?
न, तन्नियमस्य पूर्वप्रवृत्ति- | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि यह
| [भिक्षाटनादिका] नियम पूर्वप्रवृत्तिसे
सिद्धत्वात्तदतिक्रमे यत्नगौरवात् । | सिद्ध होनेके कारण उसके उल्लङ्घनमें
| अधिक प्रयत्नकी आवश्यकता है ।
- क्योंकि वे तो स्वर्गादिकी कामनासे ही किये जाते हैं, उनकी प्रवृत्ति स्वाभाविक नहीं है ।