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सर्वकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 108 में से

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पृष्ठ 37

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७
स सर्वज्ञस्वाभाव्याद् आत्मा | सर्वज्ञस्वभाव होनेके कारण
एक एव सन्नीक्षत । ननु प्रागु- | उस आत्माने अकेले होते हुए ही
त्पत्तेरकार्यकरणत्वात्कथमीक्षित- | ईक्षण (चिन्तन) किया। यदि
वान् । नायं दोषः, सर्वज्ञस्वाभा- | कहो कि जगत्‌की उत्पत्तिसे पूर्व
व्यात्; तथा च मन्त्रवर्णः- | कार्य और करणका अभाव रहते
"अपाणिपादो जवनो ग्रहीता" | हुए भी उसने किस प्रकार ईक्षण
(श्वे० उ० ३ । १९) इत्यादिः। | किया ? तो यह कोई दोषकी बात
केनाभिप्रायेणेत्याह-लोकान् | नहीं है, क्योंकि वह आत्मा स्वभाव-
अम्भःप्रभृतीन् प्राणिकर्मफलोप- | से ही सर्वज्ञ है। इस विषयमें "हाथ-
भोगस्थानभूतान्नु सृजै सृजेऽह- | पाँववाला न होकर भी वेगवान् और
मिति ॥ १ ॥ | ग्रहण करनेवाला है" इत्यादि मन्त्र-
वर्ण भी है। उसने किस अभिप्रायसे
ईक्षण किया ? इसपर श्रुति कहती
है-'मैं प्राणियोंके कर्मफलोपभोगके
आश्रयभूत अम्भ आदि लोकोंकी
रचना करूँ' इस प्रकार ईक्षण
किया ॥ १ ॥

सृष्टिक्रम

एवमीक्षित्वा आलोच्य— | इस प्रकार ईक्षण यानी आलोचना
करके—

स इमाँल्लोकानसृजत । अम्भो मरीचीर्मरमापो-
दोऽम्भः परेण दिवं द्यौः प्रतिष्ठान्तरिक्षं मरीचयः पृथिवी
मरो या अधस्तात्ता आपः ॥ २ ॥