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सर्वकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 108 में से

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पृष्ठ 25

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५

स्थस्यापि साध्यसाधनैषणोभयवि- | [ पुत्र-वित्तादि ] साध्य और [ कर्म-
निर्मुक्तस्य देहमात्रधारणार्थमश- | उपासना आदि ] साधन दोनोंकी
नाच्छादनमात्रमुपजीवतो गृह | एषणाओंसे मुक्त हुए केवल देह-
एवास्तवासनमिति । | धारणके लिये भोजनाच्छादनमात्रसे निर्वाह करनेवाले गृहस्थको भी घरहीमें रहना चाहिये ।'
न; स्वगृहविशेषपरिग्रहनियमस्य | परन्तु उनका ऐसा कहना ठीक
कामप्रयुक्तत्वादि- [तस्य निरासः] | नहीं । क्योंकि अपने गृहविशेषके
त्युक्तोत्तरमेतत् । स्व- | परिग्रहका नियम कामनाप्रयुक्त ही है—इस प्रकार इसका उत्तर पहले दिया
गृहविशेषपरिग्रहाभावे च शरीर- | ही जा चुका है । और अपने गृह-विशेषके परिग्रहका अभाव होनेपर
धारणमात्रप्रयुक्ताशनाच्छादना- | तो केवल शरीरधारणमात्रके लिये
र्थिनः स्वपरिग्रहविशेषाभावेऽर्था- | भोजनाच्छादनकी इच्छा करनेवाले पुरुषको अपने परिग्रह-विशेषका
द्भिक्षुकत्वमेव । | अभाव होनेके कारण स्वतः भिक्षुत्व ही प्राप्त हो जाता है ।
शरीरधारणार्थायां भिक्षाट- | जिस प्रकार भिक्षुके लिये शरीर-
नादिप्रवृत्तौ यथा [विद्वन्न्यास-विचारः] | रक्षामें उपयोगी भिक्षाटनादिकी प्रवृत्ति एवं शौचादिका नियम है
नियमो भिक्षोः शौ- | उसी प्रकार विद्वान् और निष्काम
चादौ च, तथा गृहिणोऽपि | गृहस्थको भी 'यावज्जीवादि' श्रुति-
विदुषोऽकामिनोऽस्तु नित्यकर्मसु | से नियुक्त होनेके कारण प्रत्यवायकी निवृत्तिके लिये नित्यकर्मोंमें नियमसे
नियमेन प्रवृत्तिर्यावज्जीवादिश्रुति- | प्रवृत्ति हो सकती है [ ऐसा यदि कोई कहे तो ] इस कथन-
नियुक्तत्वात् प्रत्यवायपरिहारा- | का तो पहले ही प्रतिवाद किया
येति । एतन्नियोगाविषयत्वेन | जा चुका है, क्योंकि नियोगका