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ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५
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अतो नाशक्नोद्वाचा ग्रहीतुमि- | अतः हमें जान पड़ता है कि वह
त्यवगच्छामः पूर्वजोऽपि ॥३॥ | पूर्वोत्पन्न विराट् पुरुष भी उसे वाणीसे
| ग्रहण करनेमें समर्थ नहीं हुआ था॥३॥
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समानमुत्तरम्— | आगेका प्रसंग भी इसीके समान
| है—
तत्प्राणेनाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोत्प्राणेन ग्रहीतुं स
यद्धैनत्प्राणेनाग्रहैष्यदभिप्राण्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ४ ॥
फिर उसने इसे प्राणसे ग्रहण करना चाहा; किन्तु इसे प्राणसे
ग्रहण करनेमें समर्थ न हुआ। यदि वह इसे प्राणसे ग्रहण कर लेता तो
[ इस समय भी पुरुष ] अन्नके उद्देश्यसे प्राणक्रिया करके तृप्त हो
जाता ॥ ४ ॥
तच्चक्षुषाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्चक्षुषा ग्रहीतुं स यद्धैन-
च्चक्षुषाग्रहैष्यद् दृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ५ ॥
उसने इसे नेत्रसे ग्रहण करना चाहा; परन्तु नेत्रसे ग्रहण करनेमें
समर्थ न हुआ। यदि वह इसे नेत्रसे ग्रहण कर लेता तो [ इस समय भी
पुरुष ] अन्नको देखकर ही तृप्त हो जाया करता ॥ ५ ॥
तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्छ्रोत्रेण ग्रहीतुं स
यद्धैनच्छ्रोत्रेणाग्रहैष्यच्छ्रुत्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ६ ॥
उसने इसे श्रोत्रसे ग्रहण करना चाहा; किन्तु वह श्रोत्रसे ग्रहण न
कर सका। यदि वह इसे श्रोत्रसे ग्रहण कर लेता तो [ इस समय भी
पुरुष ] अन्नको सुनकर ही तृप्त हो जाता ॥ ६ ॥