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सर्वकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 108 में से

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पृष्ठ 31

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१

ज्यम् । यावज्जीवादिश्रुतीनाम- संन्यास प्राप्त हो ही जाता है ।
विद्वदमुमुक्षुविषये अविद्वान् और अमुमुक्षु पुरुषोंके
यावज्जीवादि- विषयमें "यावज्जीवन अग्निहोत्र करे"
श्रुतीनाम- कृतार्थता। छान्दोग्ये
विद्वद्विषयत्वम् इत्यादि श्रुतियोंकी भी कृतार्थता है ।
च केषांचिद् द्वादश- छान्दोग्यमें तो किन्हीं-किन्हींके लिये
रात्रमग्निहोत्रं हुत्वा तत ऊर्ध्वं बारह रात्रि अग्निहोत्र करके तदनन्तर
परित्यागः श्रूयते । उसका परित्याग करना सुना
जाता है ।
यत्त्वनधिकृतानां पारिव्राज्य- और तुमने जो कहा कि जिन्हें
संन्यासस्य मिति, तन्न, तेषां कर्मका अधिकार नहीं है उन्हींके
कर्मानधिकारि- पृथगेव "उत्सन्ना- लिये संन्यासका विधान है, सो
विषयत्वनिरासः ग्निरनग्निको वा" ऐसी बात नहीं है, क्योंकि उनके
विषयमें "उत्सन्नाग्निरनग्निको वा" *
इत्यादिश्रवणात् । सर्वस्मृतिषु इत्यादि अलग ही श्रुति है । तथा
चाविशेषेणाश्रमविकल्पः प्रसिद्धः समस्त स्मृतियोंमें भी आश्रमोंका
समुच्चयश्च । विकल्प १ और समुच्चय सामान्यरूपसे
प्रसिद्ध ही है ।
यत्तु विदुषोऽर्थप्राप्तं व्युत्थान- तथा यह जो कहा कि विद्वान्-
व्युत्थानविधि- मित्यशास्त्रार्थत्वे, को जो कर्मत्यागकी स्वतः प्राप्ति
विचारः गृहे वने वा बतलायी है, सो शास्त्रका विषय न
होनेके कारण उसके घर या वनमें
तिष्ठतो न विशेष इति, रहनेमें कोई विशेषता नहीं है;

  • जिसके अग्निहोत्रकी अग्नि प्रमादवश शान्त हो गयी है अथवा जिसने
    अग्निका परिग्रह नहीं किया है ।
    १. क्रमकी अपेक्षा न करके जिस आश्रमसे संन्यास लेनेकी इच्छा हो
    उसीसे ले लेना ।
    २. एक आश्रमसे दूसरे आश्रममें क्रमानुसार जाना ।