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ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

खण्ड १ ] \t\t शाङ्करभाष्यार्थ \t\t १९

खण्ड १ ] \t\t शाङ्करभाष्यार्थ \t\t १९
“यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्” | क्योंकि “जहाँ इसके लिये सब कुछ
(बृ० उ० २।४।१४) इत्य- | आत्मा ही हो गया है” इस प्रकार
धिकृत्य क्रियाकारकफलादि- | आरम्भ करके विद्वान्‌के लिये क्रिया,
सर्वव्यवहारनिराकरणाद्विदुषः । | कारक और फल आदि सम्पूर्ण
तद्विपरीतस्याविदुषो “यत्र हि | व्यवहारका निराकरण किया है ।
द्वैतमिव” (बृ० उ० २।४। | तथा उसके विपरीत अविद्वान्‌के
१४) इत्युक्त्वा क्रियाकारक- | लिये वाजसनेयिब्राह्मणमें “जहाँ कि
फलरूपस्यैव संसारस्य दर्शित- | द्वैतके समान होता है” ऐसा कहकर
त्वाच्च वाजसनेयिब्राह्मणे । तथे- | क्रिया, कारक और फलरूप संसार-
हापि देवताख्यं संसारविषयं | विषयको प्रदर्शित किया है । इसी
यत्फलमशनायादिमद्वस्त्वात्मकं | प्रकार यहाँ ( ऐतरेयोपनिषद्‌में )
तत्फलमुपसंहृत्य केवलं सर्वात्म- | भी जो क्षुधा-पिपासादियुक्त वस्तुरूप
कवस्तुविषयं ज्ञानममृतत्वाय | संसारविषयक देवताख्यसंज्ञक फल
वक्ष्यामीति प्रवर्तते । | है उसका उपसंहार कर अब केवल
ऋणप्रतिबन्धश्चाविदुष एव | सर्वात्मक वस्तुविषयक ज्ञानका ही
[ऋणप्रतिबन्ध-] मनुष्यपितृदेवलोक- | अमरत्व-प्राप्तिके लिये वर्णन करूँगी
[विचारः] प्राप्तिं प्रति, न | —ऐसे अभिप्रायसे श्रुति प्रवृत्त
विदुषः । “सोऽयं मनुष्यलोकः | होती है ।
पुत्रेणैव०” (बृ० उ० १।५। | तथा देवलोक, पितृलोक और
१६ ) इत्यादिलोकत्रयसाधन- | मनुष्यलोककी प्राप्तिमें ऋणोंका प्रति-
नियमश्रुतेः । विदुषश्च ऋणप्रति- | बन्ध तो अज्ञानीके ही लिये है, ज्ञानीके
| लिये नहीं, जैसा कि “उस इस मनुष्य-
| लोकको पुत्रके द्वारा ही [ जीता
| जा सकता है ]” इत्यादि लोकत्रयकी
| प्राप्तिके साधनका नियम करनेवाली
| श्रुतिसे सिद्ध होता है । तथा आत्म-
| लोकके इच्छुक विद्वान्‌के लिये

२० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १


[मूल एवं संस्कृत-टीका]

बन्धाभावो दर्शित आत्मलोका-
र्थिनः “किं प्रजया करिष्यामः”
(बृ० उ० ४ । ४ । २२)
इत्यादिना । तथा “एतद्ध स्म
वै तद्विद्वांस आहुर्ऋषयः काव-
षेयाः” इत्यादि । “एतद्ध स्म वै
तत्पूर्वे विद्वांसोऽग्निहोत्रं न जुह-
वाञ्चक्रुः” (कौषी० २।५)
इति च कौषीतकिनाम् ।
अस्त्विदं तर्हि ऋणानपाकरणे
पारिव्राज्यानुपपत्तिरिति चेत् ?
न; प्राग्गार्हस्थ्यप्रतिपत्तेर्ऋणि-
त्वासंभवात् । अधिकाराना-
रूढोऽप्यृणी चेत्स्यात् सर्वस्य
ऋणित्वमित्यनिष्टं प्रसज्येत। प्रति-
पन्नगार्हस्थ्यस्यापि “गृहाद्वनी
भूत्वा प्रव्रजेद्यदि वेतरथा ब्रह्म-
चर्यादेव प्रव्रजेद्गृहाद्वा वनाद्वा”
(जा० उ० ४) इत्यात्मदर्शनो-
पायसाधनत्वेनेष्यत एव पारिव्रा-


[हिन्दी-अनुवाद]

“हम प्रजासे क्या करेंगे ?” इत्यादि
वाक्योंद्वारा ऋणोंके प्रतिबन्धका
अभाव दिखलाया है । इसी प्रकार
“वे प्रसिद्ध आत्मवेत्ता कावषेय
ऋषि बोले-[ मैं अध्ययन कैसे
करूँ ? होम कैसे करूँ ?]”
इत्यादि श्रुति है तथा ऐसी ही
“उस इस आत्मतत्त्वको जाननेवाले
पूर्ववर्ती विद्वान् अग्निहोत्र नहीं करते
थे” यह कौषीतकी शाखाकी श्रुति है।
पूर्व०-तब विद्वान्‌के लिये तो
ऋणोंका परिशोध बिना किये
संन्यास करना बन नहीं सकता ?
सिद्धान्ती-यह बात नहीं है,
क्योंकि गृहस्थाश्रमकी प्राप्तिसे पूर्व
तो ऋणित्व ही असम्भव है। यदि
अधिकारासढ न हुआ पुरुष भी ऋणी
हो सकता है तो सभीका ऋणी होना
सिद्ध होगा और इस प्रकार बड़ा
अनिष्ट प्राप्त होगा । जो गृहस्थाश्रम-
को प्राप्त हो गया है उस पुरुषके
लिये भी “गृहस्थाश्रमसे वानप्रस्थ
होकर संन्यास करे अथवा [ इस
क्रमको छोड़कर ] अन्य प्रकारसे
यानी ब्रह्मचर्यसे, गृहस्थाश्रमसे
अथवा वानप्रस्थाश्रमसे ही संन्यास
कर दे” इत्यादि श्रुतियोंद्वारा आत्म-
दर्शनके साधनके उपायरूपसे

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१

ज्यम् । यावज्जीवादिश्रुतीनाम- संन्यास प्राप्त हो ही जाता है ।
विद्वदमुमुक्षुविषये अविद्वान् और अमुमुक्षु पुरुषोंके
यावज्जीवादि- विषयमें "यावज्जीवन अग्निहोत्र करे"
श्रुतीनाम- कृतार्थता। छान्दोग्ये
विद्वद्विषयत्वम् इत्यादि श्रुतियोंकी भी कृतार्थता है ।
च केषांचिद् द्वादश- छान्दोग्यमें तो किन्हीं-किन्हींके लिये
रात्रमग्निहोत्रं हुत्वा तत ऊर्ध्वं बारह रात्रि अग्निहोत्र करके तदनन्तर
परित्यागः श्रूयते । उसका परित्याग करना सुना
जाता है ।
यत्त्वनधिकृतानां पारिव्राज्य- और तुमने जो कहा कि जिन्हें
संन्यासस्य मिति, तन्न, तेषां कर्मका अधिकार नहीं है उन्हींके
कर्मानधिकारि- पृथगेव "उत्सन्ना- लिये संन्यासका विधान है, सो
विषयत्वनिरासः ग्निरनग्निको वा" ऐसी बात नहीं है, क्योंकि उनके
विषयमें "उत्सन्नाग्निरनग्निको वा" *
इत्यादिश्रवणात् । सर्वस्मृतिषु इत्यादि अलग ही श्रुति है । तथा
चाविशेषेणाश्रमविकल्पः प्रसिद्धः समस्त स्मृतियोंमें भी आश्रमोंका
समुच्चयश्च । विकल्प १ और समुच्चय सामान्यरूपसे
प्रसिद्ध ही है ।
यत्तु विदुषोऽर्थप्राप्तं व्युत्थान- तथा यह जो कहा कि विद्वान्-
व्युत्थानविधि- मित्यशास्त्रार्थत्वे, को जो कर्मत्यागकी स्वतः प्राप्ति
विचारः गृहे वने वा बतलायी है, सो शास्त्रका विषय न
होनेके कारण उसके घर या वनमें
तिष्ठतो न विशेष इति, रहनेमें कोई विशेषता नहीं है;

  • जिसके अग्निहोत्रकी अग्नि प्रमादवश शान्त हो गयी है अथवा जिसने
    अग्निका परिग्रह नहीं किया है ।
    १. क्रमकी अपेक्षा न करके जिस आश्रमसे संन्यास लेनेकी इच्छा हो
    उसीसे ले लेना ।
    २. एक आश्रमसे दूसरे आश्रममें क्रमानुसार जाना ।

२२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
तदसद्; व्युत्थानस्यैवार्थ- | ऐसा कहना ठीक नहीं ।
प्राप्तत्वान्नान्यत्रावस्थानं स्यात् । | व्युत्थानके स्वतः प्राप्त होनेके कारण ही उसकी अन्यत्र [ यानी
अन्यत्रावस्थानस्य कामकर्म- | गृहस्थाश्रममें ] स्थिति नहीं हो सकती । अन्यत्र स्थितिको तो हमने
प्रयुक्तत्वं ह्यवोचाम, तदभाव- | कामना और कर्मसे प्रेरित ही बतलाया है; और उसके अभावको
मात्रं व्युत्थानमिति च । | ही व्युत्थान कहा है ।
यथाकामित्वं तु विदुषोऽत्यन्त- | स्वेच्छाचार तो अत्यन्त मूढ़का
[विदुषो यथा-] मप्राप्तं अत्यन्तमूढ- | विषय समझा गया है, इसलिये विद्वान्
[कामित्वनिषेधः] विषयत्वेनावगमात् । | के लिये वह अत्यन्त अप्राप्त है। तथा विद्वान्‌के लिये तो अत्यन्त भाररूप
तथा शास्त्रचोदितमपि कर्म | होनेके कारण शास्त्रोक्त कर्मकी भी
आत्मविदोऽप्राप्तं गुरुभारताव- | अप्राप्ति समझी जाती है । फिर
गम्यते । किमुतात्यन्ताविवेक- | अत्यन्त अविवेकके कारण होनेवाले स्वेच्छाचारकी तौ बात ही क्या है?
निमित्तं यथाकामित्वम् । न हि | उन्माद अथवा तिमिररोगसे दूषित
उन्मादतिमिरदृष्ट्युपलब्धं वस्तु | दृष्टिद्वारा उपलब्ध हुई वस्तु उसके निवृत्त हो जानेपर भी वैसी ही
तदपगमेऽपि तथैव स्यात् । | नहीं रहती, क्योंकि वह तो उन्माद
उन्मादतिमिरदृष्टिनिमित्तत्वादेव | अथवा तिमिरदृष्टिके कारण ही वैसी प्रतीत होती है । अतः यह
तस्य । तस्मादात्मविदो व्यु- | सिद्ध हुआ कि आत्मवेत्ताके लिये
त्थानव्यतिरेकेण न यथाकामित्वं | व्युत्थानको छोड़कर न तो स्वेच्छा-चार ही है और न कोई अन्य
न चान्यत्कर्तव्यमित्येतत्सिद्धम् । | कर्तव्य ही शेष रहता है ।