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सर्वकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

पृष्ठ 24, कुल 108 में से

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पृष्ठ 24

१४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
वास्तवकुर्वत आसनं न ततोऽन्यत्र | उस आश्रममें ही कुछ न करते हुए
| बैठा रहना चाहिये, वहाँसे कहीं
गमनमिति चेन्न, कामप्रयुक्तत्वा- | अन्यत्र नहीं जाना चाहिये, तो
द्गार्हस्थ्यस्य; "एतावान्वै कामः" | ऐसा कहना उचित नहीं, क्योंकि
| "इतनी ही कामना है" "ये दोनों
(बृ० उ० १।४।१७) इति "उभे | एषणाएँ ही हैं" इत्यादि वाक्योंसे
ह्येते एषणे एव" (बृ० उ० ३।५। | निश्चित किया जानेके कारण
| गृहस्थाश्रम तो कामनासे ही प्रयुक्त
१; ४।४। २२) इत्यवधार- | है। कामनाके निमित्तभूत पुत्र-
णात् । कामनिमित्तपुत्रवित्तादि- | वित्तादिके सम्बन्धके नियमका
संबन्धनियमाभावमात्रं न हि | अभावमात्र ही 'व्युत्थान' है;
| उनके पाससे कहीं अन्यत्र चला
ततोऽन्यत्र गमनं व्युत्थान- | जाना 'व्युत्थान' नहीं कहा जाता ।
मुच्यते । अतो न गार्हस्थ्य एवा- | अतः जिसे ज्ञान उत्पन्न हुआ है
| उसके लिये कुछ न करते हुए
कुर्वत आसनमुत्पन्नविद्यस्य । | गृहस्थाश्रममें ही स्थित रहना सम्भव
एतेन गुरुशुश्रूषातपसोरप्यप्रति- | नहीं है । इससे विद्वान्के लिये
| गुरुशुश्रूषा और तपस्याकी भी
पत्तिर्विदुषः सिद्धा । | अनुपपत्ति सिद्ध होती है ।
अत्र केचिद् गृहस्था भिक्षा- | इस विषयमें कोई-कोई गृहस्थ
टनादिभयात्परिभ- | पुरुष भिक्षाटनादिके भय और
.गृहस्थानामाक्षेपः |
वाच्च त्रस्यमानाः | तिरस्कारसे डरनेके कारण अपनी
| सूक्ष्मदर्शिता प्रकट करते हुए उत्तर
सूक्ष्मदृष्टितां दर्शयन्त उत्तरमाहुः। | देते हैं- 'केवल देहधारणमात्रके
भिक्षोरपि भिक्षाटनादिनियम- | इच्छुक भिक्षुके लिये भी भिक्षाटनादि-
दर्शनाद्देहधारणमात्रार्थिनो गृह- | का नियम देखा जाता है; अतः