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ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११

न चेष्टयोगचिकीर्षा आत्म- | इसके सिवा अपनी इष्टवस्तुके
[सिद्धवस्तुनः] नोऽनिष्टवियोगचि- | संयोगकी इच्छा तथा अनिष्ट पदार्थके
[शास्त्रबोध्यत्वम्] कीर्षा च शास्त्रकृता, | परित्यागकी अभिलाषा भी शास्त्र-
सर्वप्राणिनां तद्दर्शनात् । शास्त्र- | जनित नहीं है, क्योंकि यह सभी
कृतं चेत्तदुभयं गोपालादीनां न | प्राणियोंमें [ स्वभावसे ही ] देखी
दृश्येत, अशास्त्रज्ञत्वात्तेषाम् । | जाती है । यदि शास्त्रजनित होतीं
यद्धि स्वतोऽप्राप्तं तच्छास्त्रेण | तो ये दोनों इच्छाएँ ग्वाले आदिमें
बोधयितव्यम् । तच्चेत्कृतकर्तव्य- | दिखायी न देतीं; क्योंकि वे अशास्त्रज्ञ
ताविरोध्यात्मज्ञानं शास्त्रेण | होते हैं । जो वस्तु स्वतः प्राप्त नहीं
कृतम्, कथं तद्विरुद्धां कर्तव्यतां | होती वही शास्त्रद्वारा बोद्धव्य होती
पुनरुत्पादयेच्छीततामिवाग्नौ तम | है । इस प्रकार यदि शास्त्रने कृत
इव च भानौ । | और कर्तव्यताके विरोधी आत्मज्ञान-
| का उपदेश किया है तो फिर वह
| अग्निमें शीतलताके समान तथा
| सूर्यमें अन्धकारके समान उसकी
| विरुद्ध कर्तव्यताको किस प्रकार
| उत्पन्न करेगा ?
न बोधयत्येवेति चेन्न, "स | यदि कहो कि वह ऐसा बोध
म आत्मेति विद्यात्" (कौ० उ० | कराता ही नहीं है तो ऐसा कथन
३।९)"प्रज्ञानं ब्रह्म"(३।१।३) | भी ठीक नहीं, क्योंकि "वह मेरा
इति चोपसंहारात् । "तदात्मा- | आत्मा है-ऐसा जाने" तथा "प्रज्ञान
नमेवावेत्" (बृ० उ० १।४। | ही ब्रह्म है" इस प्रकार उपसंहार
९) "तत्त्वमसि" (छा० उ० | किया गया है, तथा "उस (जीव-
६। ८-१६) इत्येवमादिवा- | रूपसे अवस्थित ब्रह्म) ने अपनेको
क्यानां तत्परत्वात् । उत्पन्नस्य | ही जाना" "वह तू ही है"
| इत्यादि वाक्य भी आत्मज्ञानपरक
| ही हैं । उत्पन्न हुआ ब्रह्मात्मविज्ञान

१२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

च ब्रह्मात्मविज्ञानस्याबाध्यमान- | भी बाधित होने योग्य न होनेके
त्वान्नानुत्पन्नं भ्रान्तं वेति शक्यं | कारण अनुत्पन्न या भ्रान्तिजनित
वक्तुम् । | नहीं कहा जा सकता ।
त्यागेऽपि प्रयोजनाभावस्य | यदि कहो कि “उसे इस लोकमें
[प्रयोजनाभावे] तुल्यत्वमिति चेत् | अकृत ( कर्मत्याग ) से भी कोई
[संन्यासस्य] “नाकृतेनेह कश्चन” | प्रयोजन नहीं है” इस स्मृतिके
[स्वतःसिद्धत्वम्] (गीता ३ । १८) | अनुसार बोधवान्को त्याग करनेमें
| भी प्रयोजनाभावकी समानता ही
इति स्मृतेः, य आहुर्विदित्वा | है; अर्थात् जो लोग कहते हैं कि
ब्रह्म व्युत्थानमेव कुर्यादिति | ब्रह्मको जानकर व्युत्थान ( कर्म-
| त्याग ) ही करना चाहिये उनके
तेषामप्येष समानो दोषः प्रयो- | लिये भी यह प्रयोजनाभावरूप दोष
जनाभाव इति चेन्न; अक्रिया- | समान ही है, तो उनका यह कथन
| ठीक नहीं क्योंकि व्युत्थान तो
मात्रत्वाद् व्युत्थानस्य । अविद्या- | अक्रिया ही है * । प्रयोजनका
निमित्तो हि प्रयोजनस्य भावो न | भाव तो अविद्याके कारण रहता है।
वस्तुधर्मः सर्वप्राणिनां तद्दर्शनात् । | वह वस्तुका धर्म नहीं है क्योंकि
| यह बात सभी प्राणियोंमें देखी
प्रयोजनतृष्णया च प्रेर्यमाणस्य | जाती है; अर्थात् प्रयोजनकी तृष्णा-
वाङ्मनःकायैः प्रवृत्तिदर्शनात् । | से प्रेरित होते हुए प्राणियोंकी वाणी
“सोऽकामयत जाया मे स्यात्” | मन और शरीरद्वारा प्रवृत्ति होतो देखी
(बृ० उ० १ । ४ । १७) | गयी है तथा वाजसनेयी ब्राह्मणमें
| भी “उस ( आदिपुरुष ) ने इच्छा
इत्यादिना पुत्रवित्तादि पाङ्क्त- | की कि मेरे पत्नी हो” इत्यादि कथनके
लक्षणं काम्यमेवेति “उभे ह्येते | द्वारा “ये दोनों (साध्य-साधनरूप)

  • प्रयोजन तो क्रियाके लिये अपेक्षित होता है; इसलिये अक्रियारूप
    व्युत्थानके लिये किसी प्रयोजनकी अपेक्षा नहीं है ।