ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
४८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
जा सके, यदि त्वचासे स्पर्श कर लिया जाय, यदि मनसे चिन्तन कर
लिया जाय, यदि अपानसे भक्षण कर लिया जाय और यदि शिश्नसे
विसर्जन किया जा सके तो मैं कौन रहा ? [ अर्थात् यदि मेरे बिना ये सब
इन्द्रियोंके व्यापार हो जाते तो मेरा तो कोई प्रयोजन ही न था; तात्पर्य
यह कि राजाकी प्रेरणाके बिना नगरके कार्योंके समान मेरी प्रेरणाके बिना
इनका होना असम्भव है ]' ॥ ११ ॥
[मूल शाङ्करभाष्य]
स एवं लोकलोकपालसंघात-
स्थितिमन्ननिमित्तां कृत्वा पुर-
पौरतत्पालयितृस्थितिसमां स्वा-
मीव ईक्षत—कथं नु केन प्रका-
रेणेति वितर्कयन्निदं मदृते माम-
न्तरेण पुरस्वामिनम्, यदिदं
कार्यकरणसंघातकार्यं वक्ष्यमाणं
कथं नु खलु मामन्तरेण स्यात्प-
रार्थं सत् । यदि वाचाभिव्या-
हृतमित्यादि केवलमेव वाग्व्य-
वहरणादि तन्निरर्थकं न कथंचन
भवेद्बलिस्तुत्यादिवत्; पौर-
वन्द्यादिभिः प्रयुज्यमानं स्वाम्यर्थं
सत्तत्स्वामिनमन्तरेणासत्येव स्वा-
मिनि तद्वत् ।
[भाष्यानुवाद]
उस परमात्माने नगर, नगरनिवासी
और उनके रक्षक [ राजकर्मचारी
आदि ] की नियुक्तिके समान अन्नरूप
निमित्तवाली लोक और लोकपालोंके
संघातकी स्थिति कर नगरके स्वामीके
समान विचार किया—'कथं नु'
यानी किस प्रकारसे—इस प्रकार
वितर्क करते हुए [ उसने सोचा ]
यह जो आगे बतलाया जानेवाला
कार्य ( भूत ) और करणों (इन्द्रियों)
के संघातका कार्य ( व्यापार ) है
वह परार्थ ( दूसरेके लिये ) होनेके
कारण मेरे सिवा अर्थात् पुरके स्वामी-
रूप मेरे बिना कैसे होगा ? जिस
प्रकार अपने स्वामीके लिये प्रयुक्त
पुरवासी और बन्दीजन आदिकी
बलि (कर) एवं स्तुति आदि स्वामीके
बिना अर्थात् स्वामीके अभावमें निरर्थक
ही है उसी प्रकार [ मेरे बिना भी ]
यह जो वाणीसे बोलना आदि है
अर्थात् केवल वाग्व्यापारादि है वह
निरर्थक ही होगा यानी किसी
प्रकार न हो सकेगा।