ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
तृतीय अध्याय
तृतीय अध्याय
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प्रथम खण्ड
आत्मसम्बन्धी प्रश्न
ब्रह्मविद्यासाधनकृतसर्वात्म- | श्रुतिद्वारा वामदेव आदि
भावफलावाप्तिं वामदेवाद्याचार्य- | आचार्योंकी परम्परासे प्रकाशित
परम्परया श्रुत्यावद्योत्यमानां ब्रह्म- | तथा ब्रह्मवेत्ताओंकी सभामें अत्यन्त
वित्परिषदत्यन्तप्रसिद्धामुपलभ- | प्रसिद्ध, ब्रह्मविद्यारूप साधनके
माना मुमुक्षवो ब्राह्मणा अधुनातना | किये हुए सर्वात्मभावरूप फलकी
ब्रह्मजिज्ञासवोऽनित्यात्साध्यसा- | प्राप्तिको उपलब्ध करनेवाले आधुनिक
धनलक्षणात्संसारादाजीवभावाद्व्या- | मुमुक्षु और ब्रह्मजिज्ञासु ब्राह्मणलोग
विवृत्सवो विचारयन्तो- | जीवभावपर्यन्त साध्य-साधनरूप
ऽन्योन्यं पृच्छन्ति कोऽयमात्मेति ? | अनित्य संसारसे निवृत्त होनेकी
कथम्— | इच्छासे परस्पर विचार करते हुए
| पूछते हैं—यह आत्मा कौन है ?
| किस प्रकार [पूछते हैं ? सो बतलाया
| जाता है ]—
कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे । कतरः स आत्मा,
येन वा पश्यति येन वा शृणोति येन वा गन्धानाजिघ्रति
येन वा वाचं व्याकरोति येन वा स्वादु चास्वादु च
विजानाति ॥ १ ॥
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३
हम जिसकी उपासना करते हैं वह यह आत्मा कौन है ? जिससे
[ प्राणी ] देखता है, जिससे सुनता है, जिससे गन्धोंको सूंघता है,
जिससे वाणीका विश्लेषण करता है, और जिससे स्वादु-अस्वादुका ज्ञान
प्राप्त करता है वह [ श्रुतिकथित दो आत्माओंमेंसे ] कौन-सा आत्मा
है ? ॥ १ ॥
यमात्मानमयमात्मेति साक्षा- | हम जिस आत्माकी 'यह आत्मा
द्द्वयमुपास्महे कः स आत्मेति यं | है' इस प्रकार साक्षात् उपासना
चात्मानमयमात्मेति साक्षादुपा- | करते हैं वह आत्मा कौन है ? तथा
सीनो वामदेवोऽमृतः समभवत्त- | जिस आत्माकी 'यह आत्मा है' इस
मेव वयमप्युपास्महे को नु खलु | प्रकार साक्षात् उपासना करनेवाला
| वामदेव अमर हो गया था उसी
स आत्मेति । | आत्माकी हम उपासना करते हैं ।
| किन्तु वस्तुतः वह आत्मा है कौन-सा?
एवं जिज्ञासापूर्वमन्योन्यं पृ- | इस प्रकार जिज्ञासापूर्वक एक-
च्छतामतिक्रान्तविशेषविषयश्रुति- | दूसरेसे प्रश्न करते हुए उन्हें आत्म-
| सम्बन्धी विशेष विवरणसे युक्त
संस्कारजनिता स्मृतिरजायत । | पूर्वोक्त श्रुतिके संस्कारसे यह स्मृति
'तं प्रपदाभ्यां प्रापद्यत ब्रह्मेमं | पैदा हुई—'इस पुरुषमें ब्रह्म पादाग्र-
पुरुषम्' 'स एतमेव सीमानं | भागद्वारा प्रविष्ट हुआ' तथा इसी
विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत' | पुरुषमें 'वह इस सीमाको ही
| विदीर्णकर इसके द्वारा प्राप्त हुआ।'
एतमेव पुरुषम् । अत्र द्वे ब्रह्मणी | इस प्रकार यहाँ एक-दूसरेसे प्रतिकूल
इतरेतरप्रातिकूल्येन प्रतिपन्ने | दो ब्रह्म ज्ञात होते हैं और वे
इति । ते चास्य पिण्डस्यात्मभूते । | इस पिण्डके आत्मस्वरूप हैं। इनमेंसे
तयोरन्यतर आत्मोपास्यो भवि- | कोई एक ही आत्मा उपासनीय हो