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सर्वकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 108 में से

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पृष्ठ 36

२६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १

व्याकृतनामरूपभेदत्वादनेकश्- | विषय था और इस समय नाम-
ब्दप्रत्ययगोचरमात्मैकशब्दप्रत्य- | रूपादि भेदके व्यक्त हो जानेसे वह अनेक शब्दोंकी प्रतीतिका विषय
यगोचरं चेति विशेषः । | तथा एकमात्र ‘आत्मा’ शब्दकी प्रतीतिका विषय भी हो रहा है ;
यथा सलिलात्पृथक्फेननाम- | जिस प्रकार जलसे पृथक् फेनके नाम और रूपकी अभिव्यक्ति होनेसे
रूपव्याकरणात्प्राक्सलिलैकशब्द- | पूर्व फेन एकमात्र ‘जल’ शब्दकी प्रतीतिक ही विषय था; किन्तु जिस
प्रत्ययगोचरमेव फेनम्, यदा | समय वह जलसे अलग नाम और रूप-
सलिलात्पृथङ्नामरूपभेदेन व्या- | के भेदसे व्यक्त हो जाता है उस समय
कृतं भवति तदा सलिलं फेनं | वह फेन ‘जल’ और ‘फेन’ इस प्रकार अनेक शब्दोंकी प्रतीतिका विषय
चेत्यनेकशब्दप्रत्ययभाक्सलिल- | तथा केवल ‘जल’ इस एक शब्द-
मेवेति चैकशब्दप्रत्ययभाक्च | की प्रतीतिका विषय भी हो जाता है; उसी प्रकार [ उपर्युक्त भेद भी
फेनं भवति तद्वत् । | समझना चाहिये ] ।
नान्यत्किंचन न किंचिदपि | उसके सिवा अन्य कोई व्यापार-
मिषन्निमिषद् व्यापारवदितरद्वा । | युक्त अथवा निष्क्रिय वस्तु नहीं थी ।
यथा सांख्यानामात्मपक्षपाति | जिस प्रकार सांख्यवादियोंके मतमें आत्मासे अतिरिक्त स्वतन्त्र प्रधान
स्वतन्त्रं प्रधानं यथा च काणा- | था, तथा कणादमतावलम्बियोंके
दानामणवो न तद्वदिहान्य- | विचारमें परमाणु थे उस प्रकार इस (औपनिषद सिद्धान्त) में आत्मासे
दात्मनः किंचिदपि वस्तु विद्यते । | अतिरिक्त और कोई वस्तु नहीं थी ।
किं तर्हि ? आत्मैवैक आसीदित्य- | तो फिर क्या था ? एकमात्र आत्मा
भिप्रायः । | ही था—यह इसका अभिप्राय है ।