Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

सोलहवीं पुतली १६. ( १०७ )

Page 109Permalink

सोलहवीं पुतली १६. ( १०७ )
थालोंमें रख और चार घोड़े खासे लेकर राजाके नगरको चला
और वहांसे खटोला जो लेगया था, वहभी फेर देन जब द्वारेपर
पहुंचा तब द्वारपालसे कहा-कि, महाराजको मेरी खबर दो.
तब द्वारपालोंने राजाको जाकर कहा. राजाने खबर सुन उसे
बुला लिया और जो कुछ वह लेगयाथा जाकर उसने राजाकी
भेंट किया. और कहा-महाराज ! आपके पुण्यप्रतापसे सब
काम अच्छा हुवा. अब इस दासकी भेंट आपको कबूल करनी
चाहिये. तब राजा सुन हँसकर बोला कि, मेरा यह स्वभाव
है कि, दी हुई चीज मैं फेर नहीं लेता ! यह खलोटा
मैने तुझको दिया. और जो कुछ तू तुहफे-लाया है यह सब
तुहफे और लाख रुपये अपने खजानेसे मँगवाया और कहा
कि, ये हमने तेरे बेटेको दिये. इस वास्ते कि, इसकी शादी हुई है
गरज ये सब कुछ इनायत करके मानदै उसे रुखसत किया.
वह प्रसन्न हो अपने घरको आया. इतनी बात कह वह पुतली
बोली-सुन राजा भोज ! राजा बीरविक्रमादित्यकी बराबरी
इंद्रभी नहीं कर सकता था. और तुम तो किस गिनतीमें हो ?
जो तूने अपना मन बढ़ाया है. इससे तू बाज आ. इन बातोंमें
वहभी दिन गुजर गया. तब राजा महलमें दाखिल हुआ. रात
जिस तिस तरह गुजरगई. फिर जब सुबह होगई तब राजा
सिंहासनपर बैठनेका इरादा करके वहां आगया. तब सत्यवती

सत्रहवीं पुतली १७. (१०९)

Page 110Permalink

सत्रहवीं पुतली १७. (१०९)
पंडितकी बात सुनकर राजाको उनसे मिलनेकी इच्छा हुई.
तब बेतालोंको बुलाकर कहा कि-मरे तईं पातालको लेचलो.
मैं शेष नागके दर्शनको जाऊंगा. ऐसा राजाका बचन सुन
बेताल उठाकर पातालको लेगये और शेष नागका मंदिर
दिखा दिया. राजाने उनका मंदिर देखतेही बेतालोंको
विदा किया. और आप मंदिरको चला गया. जब जाकर
उनके पास पहुँचा और देखे तो वह कंचनका और मंदिर है
उसमें रत्न जडे हुए चकमका रहेहैं. और ऐसी ज्योति है उसकी
कि जिसकी रोशनिके सिवाय रात दिन कुछ नहीं मालूम
होता. द्वार द्वारपर कमलके फूलोंकी बंदनवार बँधी हुई हैं.
और घर घर आनंद मंगलाचार हो रहा है. वहां राजा कुछ
डरता डरता कुछ खुशी खुशी हो जाकर खडा हुआ और
वहांके द्वारपालोंसे दंडवत् करक कहा कि-महाराज ! हमारा
समाचार शेष राजाजीको पहुँचाओ कि-मर्त्यलोकसे एक
राजा आपके दर्शनको आया है. तब दरवान राजाको खबर
देनेको गया. और यह द्वारपर खडा हुआ कहता था कि-धन्य
भाग्य है मेरा कि, मैं यहां तक आन पहुंचाहूं और चारों तरफसे
रामकृष्ण रामकृष्ण इस नामकी आवाज आतीथी. राजाके
मंदिरमें वेदकी ध्वनि कान पडती थी. जब दरवान
राजाके सम्मुख जा प्रणाम कर हाथ जोडकर खडा हुवा. राजाने
उसकी और दृष्टि की, उसने कहा-महाराज ! एक मनुष्य द्वारपर

Page 111Permalink

( ११० ) सिंहासनबत्तीसी.
खडा है और कहता है कि, मैं मर्त्यलोकसे आया हूँ, द्वारेका
हजारों दंडवत् करता है, उसको आपके दर्शनकी अभिलाषा
है. जिससे निहायत बेचैन है. यह बात सुनतेही शेषनाग
उठके द्वारपर आये. राजाने देखतेही उनको साष्टांग प्रणाम
किया और उन्होंने हँसकर आशीष दी और पूँछा कि-तुम्हारा
नाम क्या है ? और कौनसा देश है ? तब राजाने हाथ जोड़कर
कहा कि-स्वामी ! विक्रम भूपाल मेरा नाम है. मैं मर्त्यलो-
कका राजा हूँ और आपके चरणके दर्शनकी मुझे इच्छा थी सो
मेरे मनकी इच्छा पुरी हुई. आज मुझे करोड यज्ञका फल हुआ
और करोड़ों रुपये-दान कियेका पुण्य पाया. और धन्य भाग
मेरा जो आपके चरणकमलके दर्शन हुए. बल्कि चौंसठ तीरथ
न्हायका मुझे फल हुआ. विक्रमका नाम सुनतेही शेष नाग उसको
मिले और हाथ पकड़कर अपने मकानमें लेगया. अच्छी जगह
बैठाकर क्षेम कुशल पूँछी. राजाने कहा-महाराजके दर्शनसे सब
आनंद है. फिर शेषनागने कहा-तुम किस कारण यहां आयेहो ?
और आते हुये पंथमें तुमने बहुत कष्ट पाया होगा. विक्रम
बोले कि-फणिनाथ ! मैंने जो कष्ट पाया सो सब तुम्हारे दर्शन
कियेसे निस्तरा. फिर राजाको रहनेके लिये एक अच्छा स्थान
दिया और बहुतसे लोग टहल करनको. उन लोगोंसे कह दिया
कि मेरी सेवासे भी तुम अधिक राजाकी सेवा जानना

सत्रहवीं पुतली १७. (१११)

Page 112Permalink

सत्रहवीं पुतली १७. (१११)
इसतरहसे पांच, सात दिन राजा विक्रमादित्य वहां रहा. बाद
उसके एक दिन हाथ जोडकर कहा कि-पृथोनाथ ! मुझे बिदा
कीजिये. अब मै अपने नगरमें जाउं और वहां बैठ आपका
गुण गाउं तब शेषजीने हँसकर कहा कि-राजा ! अब तुम्हे घर
जानेकी इच्छ हुई है सो तुम्हारे वास्ते कुछ प्रसाद हम
देतेहैं तुम लेते जाओ. यह कह चार लाल मंगवाकर राजा
विक्रमको दिये और उनका गुण कहनेको लगे कि-इस
एक रत्नका यह स्वभाव है कि, जितना गहना तुम चाहोगे सो
यह तुम्हें देगा. और क्षणभर देते विलंब न करेगा. और दुसरे
लालका ऐसा स्वभाव है कि, हाथी, घोडे, पालकिया जितनी
तुम मागोगे उतनी इसके पाओगे. और तीसरे लालका यह
स्वभाव है कि, तुम जितनी लक्ष्मी चोहो तुमको उतनीही हय
देगा. और चौथे रत्नका यह प्रभाव है कि, हरीभजन और सत्कर्म
करनेकी जितनी मनमें इच्छा रखोगे उतनी यह पुरी करेगा-
इस तरह चारों लालोके गुण राजाको समझाकर कहे और
बिदा किया. राजा हाथ जोडकर खडा हो कहने लगा-महाराज !
मैं आपके गुणको उपमा नहीं दे सकता हूं पर आप मुझे दास
समझकर कृपा रखियेगा. यह कहकर राजा वहांसे रुखसत
हुआ. और अपने बैतालोंको बुलाकर उनपर सवार हो अपने
घरको आया. जब कोश एक चार रहा तो बैतालोंको

Page 113Permalink

( ११२ ) सिंहासनबत्तीसी.

छाड राजा पाओं पाओं शहरको चला तो देखता क्या है कि
एक दुर्बल भूखा ब्राह्मण चला आता है. जब वह पास आया
तब उनसे कहा कि-राजा ! मैं भूखा ब्राह्मण हूं कुछ मुझे
भिक्षा दो तो मैं जाकर अपने कुटुंबको पालूं. यह सुनते राजा
चिंता कर अपने मनमें कहने लगा कि-इस ब्राह्मणको इसमेंसे
एक लाल दूं यह विचार कर ब्राह्मणसे कहा कि-देवता ! इस
बखत मेरे पास चार रत्न हैं और उन चारोका एक एक गुण
है इस वास्ते जो तुम इनमेंसे चाहो वह मैं तुम्हें दूंगा, तब
ब्राह्मणने कहा-पहले अपने घर हो आऊं तब तुमसे कहूं यह
कहकर ब्राह्मण अपने घर गया और राजा वहां खडा रहा
वह घरपे जाकर अपनी स्त्री पुत्र और पुत्रकी स्त्रीसे कहने
लगा कि, उन चारों लालोका यह ब्यौरा है. तब उन
तीनोंसे ब्राह्मणी बोली कि-स्वामी ! तुम वह लाल लो कि,
जो लक्ष्मी देता है सो, और ख्याल मनमेंसे उठादो; क्योंकि
लक्ष्मीसे मिलते हैं सहाय और लक्ष्मीसे होते हैं सब उपाय.
धर्म, ज्ञान, नेम पुण्य. दान यह सब लक्ष्मीसेही होते हैं. इससे
तुम और तरफ चित्त मत डुलाओ और जाकर लक्ष्मी लेआओ.
फिर उसका पुत्र बोला-लक्ष्मी किस कामकी है ? जो साथ
सामान न हो और जो सामान हो तो राजा कहावे, और
सब कोई शीर नवावे. सामान हो तो दुर्जन डरे और संसारमें

सत्रहवीं पुतली १७. ( ११३ )

Page 114Permalink

सत्रहवीं पुतली १७. ( ११३ )

शोभा पावे. जो घरमें लक्ष्मी हुई और जगमें शोभा न पाई
तो उस पुरुषका जन्म लेना निष्फल है. तुम वह लाल लो कि
तो इस संसारमें शोभा दे. उतनेमें उसके बेटेकी बहू बोली कि-
तुम वह लाल लो कि, जो अच्छे आभूषण दे. गहने पह-
ननसे स्त्री अप्सरा मालूम हो. जो रांडभी पहने तो अति
सुंदरी दिखाई दे. और विपत् पडे तो बेंच बेंच बहुतसा
धन ले. और जितना मांगोगे उतना इससे पाओगे. और
पुरुष हमारा बावला है और सास बुद्धिहीन है इससे ससुरजी
तुम सज्ञान हो और तुमसे मै कहतीहूं वही लाल लेकर आओ
जो मैंने तुमसे कहा है. उससे तुम सब कुछ पाओगे. यह सुन-
कर ब्राह्मण बोला कि—तुम तीनों बौराये हो. और मेरी इच्छा
सिवाय धर्मके और कोईमें नहीं; क्योंकि धर्मसे संसारमें आ-
दमी राज पाता है, और धर्मसे सब काम सिद्ध होते हैं. धर्म-
सेही जगमें यश होता है. और धर्म करनेसे देखो कि राजा
बालिने पातालका राज पाया. और धर्मसे ही राजा इंद्रने
स्वर्गमें जाकर इंद्रासन पाया. और धर्मसे यह काया अमर हो
जाती है. गर्भवास छूट जाता है. इसमें तुम मेरा धर्म मत
डुबावो. और मैंभी अपना सत न छोडूंगा इससे जो हो सो
हो. इसी तरह चारोंने चार मत किया. और एकका एकने
नहीं माना तब वह ब्राह्मण घरसे फिरकर निकट आया

Page 115Permalink

( ११४ ) सिंहासनबत्तीसी.

और सब अहवाल राजाको सुनाया, और कहा कि-महाराज
मैं घर तो गया पर बात कुछभी बन न आई, अपनी अपनी
सब कोई कहता है और हम चारोंकी चार मती हैं, और आपने
यहां खडे होकर हमारे लिये दुःख पाया पर हमारा मतलब
नहीं आया. यह सुन राजाने कहा कि-महाराज ! तुम अपने
चित्तमें निराश होकर उदास न होना, चारों लाल अपने घरको
लेजाओ मैं तुम्हे देताहूं क्योंकि जिसमें तुम्हारा कुटुंबभी प्रसन्न
हो और तुमभी, हमारा इसीमें कल्याण है निदान राजाने
चारों लाल ब्राह्मणके हाथ दिये. ब्राह्मण लेकर खुश हुआ
और आशीष दे अपने धामको गया, सुन राजा भोज ! राजा
विक्रमादित्यभी अपने मन्दिरको गया और दान देते कुछ वि-
लंब न लाया, ऐसा दानी और प्रतापी अब इस कलियुगमें कौन
है ! जो उसके समान हो वह इस आसनपर बैठे और नहीं
तो नरकवास पावे. अभी तू अपने मनमें मत उकता धीरज धर
और आगे कथा सुन जो, जो राजाने साहस और दान किये
है. यह बात पुतलीकी सुनकर राजा भोज सिंहासनके पाससे
उठकर घर आया, और सारी रात सोच चिंतामें गॅवाई, सुबह
होतेही स्नान पूजा करके बैठा, इतनेमें दीवान प्रधान आकर
हाजिर हुए, सबको साथ ले सिंहासनके पास जानाचाहा कि
पांव उठाकर धरें तब रूपरेखा -----

अठारहवीं पुतली १८. (११९)

Page 116Permalink

अठारहवीं पुतली १८. (११९)
अठारहवीं पुतली-
पुतली उठी और हांहांकर कहने लगी कि-राजा ! मुझपर
दया कर और पहले मेरी बात सुन, तिस पीछे जो इच्छामें
आवे सो कर. तब राजा बोला कि-तू कह ! जो तेरे चित्तमें है
तब वह पुतली कहने लगी कि सुन राजा भोज ! एकदिन
दो संन्यासी आपसमें योगकी रीतिसे झगडतेथे. न वह उससे
जीत सकताथा न यह इससे. आखिर इस तरह झगडते झग-
डते वीरविक्रमादित्यके पास आये. और कहा कि-महाराज !
हम दोनों विवादी हैं इसका आप न्याय चुकवो, आप धर्मात्मा
राजा हैं यह समझकर हम आये हैं राजाने कहा-मुझसे सम-
झाकर तुम जाहिर करो कि, किस बातपर झगडा है? तब उन-
मेंसे एक यती बोला कि-महाराज ! मैं कहताहूं कि मनके
बशमें ज्ञान है और मनके बशमेंही आत्मा है और मनके बश
महा देव है और माया, मोह, पाप, पुण्य येभी सब मनसे हैं.
और जितनी बातें हैं वह सब मनकेही तावेमें हैं और मनकी
इच्छाहीसे सब कुछ होता है. मन जो सो तमाम शरीरका
राजा है. और जितने अंग हैं सो मनके अधीन हैं. मन उनसे
जो काम लेता है सो ही वे करते हैं. एक दोनोंमेंसे यह जब
कहचुका तब दुसरा बोला-सुनो राजा ! निश्चय करके जो मैं
कहूं. ज्ञान जो है यही राजा है देहका. और मन जो है सो

Page 117Permalink

(११६) सिंहासनबत्तीसी.

उसका ताबेदार. और जो कदाचित् मन अपना अमल किया
चाहे तो ज्ञानसे कुछ इसका वश नहीं चलता. मनके काबूमें
हैं इंद्रियां वह चाहे तो उनसे कर्म करवावे. पर ज्ञान नहीं
करने देता. जब ज्ञान आता है तब वह मनको मार कर नि-
काल देता है और पांचों इंद्रियांभी ज्ञानके वश हो खडसे छूटी
हुई हैं. जब मनुष्यसे मन और इंद्रीका विकार छूटा निर्भय
हुआ संसारके भयसे और योग सिद्ध हुआ. दोनोंकी ये बातें
सुनकर राजा बोला कि-तुमने जो कहा सो मैं सब समझा.
इसका उत्तर बिचार कर तुम्हे दूंगा. कितनी एक देरके बाद
राजाने सोचकर कहा कि-सुनो योगेश्वर ! चार वस्तु एक साथ
रही हैं. अग्नि, जल, वायु और पृथ्वी इन चारोंसे शरीर है. मन
इनका सरदार है. मनकी मतिसे जो ये चलें तो घडी पलमें
नाश कर दें. पर उनपर ज्ञान बली है. मनका विकार होने नहीं
देता. और जो नर ज्ञानी हैं उनकी काया विनाशको नहीं
पाती. वे इस संसारमें अमर हैं. और जबतक योगी ज्ञानसे
मनको नहीं जीते तबतक उसका योग सिद्ध नहीं होता. ये
बातें राजाकी योगियोंने सुन अपने मनका हठ छोड़ दिया-
और वे योगियोने प्रसन्न होकर राजाको एक खडिया कलम
देकर कहा कि इसमें ये गुण हैं जो इससे दिनको तुम लिखोगे
सो रातको प्रत्यक्ष सर्व देखोगे. यह कहकर दोनों योगी चले

[Header] अठारहवीं पुतली १८. (११७)

Page 118Permalink

[Header] अठारहवीं पुतली १८. (११७)
गये. राजाने अपने जीमें अचरज माना कि, यह बात किस तर-
हसे सत्य होगी ? तब राजाने एक मंदिर खाली करवाया, और
झड़वा घुलवाय लिपवा अकेले उसके घरमें जा बिछौना बि-
छावा किंवाड़ बंदकर दीवालमें सुरत लिखने लगा. पहले कृष्णकी
मूर्ति लिखी, पीछे सरस्वतीकी फिर देवताओंकी. इतनेमें
सांझ हुई और एक बार जय जय शब्द होने लगा. जो जो देवता
लिखेथे सो साफ देखे. देखतेही राजा मोहित हो गया. और
जो जो बातें वे आपसमें कहतेथे वह राजा सब सुनताथा. इत-
नेमें प्रभात होगया. और देवताओने उठ उठ अपनी अपनी
राहली. और पुतलीकी पुतलियां रहगईं, फिर राजाने दूसरी
तरफ दीवालपे हाथी, घोडे, पालकी, रथ और फौज यह सब
कुछ लिखा. फिर जब शाम हुई तो वे सब हाजिर हुये. राजा
देख देख अपने जीमें प्रसन्न होताथा. और योगीको याद कर-
ताथा कि, मुझे वह पदार्थ दे गया. जब भोर हुआ तब वह
चित्रका चित्र रहगया. फिर तीसरे दिन राजाने पहले एक मृ-
दंगी लिखा. फिर गंधर्व लिखा. पुनि अपागयें खैंची लालबीन,
रबाब, तबूरा, मुहचंग, सितार, पिनाक, बाँसुरी, करताल, अल-
गोजा, एक एक राज एक एक मूर्तिके हाथ दे दे लिखा. जब
संध्याका समय हुआ. तब पहले एक शब्द हुआ. और गंधर्व
संगीतशास्त्रकी रीतिसे गाने लगे. और साज स्वरोंके साथ

Page 119Permalink

( ११८ ) सिहासनबत्तीसी.

मिल मिल बजने लगे. और वे अप्सरायें नृत्य करने लगीं
और भाव बताने. इस तरहसे राजा हमेश आनंदसे रात
काटताथा. और दिनको यही लिखताथा. इसी तरहसे वह रात
दिन वहां व्यतीत करता और रनवासमें नहीं जाताथा. तब
रानियोंके जीमें चिंता हुई कि राजा किस कारण महलमें नहीं
आता ? और जुदे मंदिरमें रहता है इसका क्या सबब है ? यह
मालूम किया चाहिये. यह रानियां आपसमे मत ठान राजाका
खोज लेनेको तैयार हुईं और उनमेंसे चार रानियां आपसमे
विचार करके कहने लगीं कि हमारा जीनाभी धिकारकासा है-
और जगमेंभी हमको धिकार है कि राजा हमें छोड़ वहां बैठ
रहा है. और हम यहां विरहमें दुःख पाती हैं इतने दिनों तो
हम दुःख मरीं पर अब एक दिनभी बिन प्रियतम नहीं रहा
जाता. यह विचार कर रातको सवार हो जिस मंदिरमें राज-
बैठा कौतुक देख रहाथा. ये भी वहां जा पहुँचीं. और हाथ
जोड़ बिनती कर कहनेलगीं कि, महाराज ! हमसे क्या अपराध
हुआ है ? जो आप हमारी सूरत बिसरा यहां बैठे रहे हैं. यह
सुन राजा हँसकर बोला कि, सुनो सुंदरियो ! तुझे किसीने
सताया है और किस कारण तुम यहाँ आई ? क्या तुम्हें किसीने
कुछ कहा है कि यह तुम्हारा मुखचंद्र मलीन हो रहा है ? राजाकी
यह बात सुन शिर निहुडाके उन्होंने कहा कि स्वामी ! जो बात है

अठारहवीं पुतली १८. ( ११९ )

Page 120Permalink

अठारहवीं पुतली १८. ( ११९ )
सो आपके सन्मुख हम प्रकाश करती हैं, तब राजाने कहा
अच्छा, जो कुछ कहना हो सो कहो. तब उनमेंसे एक रानी जो
चतुर थी सो बोली-महाराज ! हम अबला हैं और कभी
कुछ नहीं देखा सुखहीमें उमर गँवाई और अब विरहमें काम
निशिदिन हमें दहता है सो दुःख हम तुम्हारे सिवाय कससे
कहें ? इस व्यथासे हमें आप बचाइये. और अपने हमसे
बचन कियाथा कि हम तुम्हें पीठ न देंगे. सो इतनी मुद्दतसे
तुमने बिसार दिया. इतने दिनोंतक जिस तरह हुआ हमने
वियोग मारा अब हममें बल नहीं कि अब वियोग सहन करेंगी.
इसी तरहकी बाते करती हुई तो सुबह होगई और वे सब मुर्तें
फिर नकशीदार और दीवालें होगई. तब रानियोंने कहा की-
महाराज ! जबसे तुमने मंदिर छोडा तबसे दुःखही सदा रन-
वासमें हो रहा है. और उन रानियोंका पाप आपको लगता है
क्योंकि सब आपही के आसरेमें हैं. ये बातें सुन राजा हँसकर
बोला कि-अब जीमें तुम प्रसन्न हो. जो तुम कहोगी सोही हम
करेंगे और जो मांगो सो हम देंगे. तब रानियां खुश होकर
बोलीं-महाराज ! हमारे मांगनेसे जो आप देंगे तो हम मांगें.
राजाने कहा-जो तुम मांगोगी सो हम देंगे. रानियोंने कहा-
महाराज ! यह जो खडिया आपके हाथमें है सो हमे दो.
यह सुनतेही राजाने आनंदसे हवाले की. रानियोंने लैली और
छिपा रक्खी. फिर सवार हो अपने अपने महलमें आई और

लगा. इतना कथा कह रूपरेखा पुतली बोली कि-सुन राजा

Page 121Permalink

[Header] (१२०) सिंहासनबत्तीसी.

राजाभी आकर दाखिल हुवा. और अपना राजकाज करने
लगा. इतना कथा कह रूपरेखा पुतली बोली कि-सुन राजा
भोज ! ऐसा पदार्थ देते राजाने विलंब न किया. और ऐसी
विद्या तू कहां पावेगा ? और जो पावेगा तो तुमसे दी नहीं
जायगी. इससे इस आसनके ऊपर बैठनेका तू अदब छोड़दे.
मैं तुझसे सच कहतीहूं तू बौरा न जा, और उस योग्य तू नहीं.
वहभी सायत गुजर गई. राजा उठकर वहांसे महलमें दाखिल
हुवा. तमाम रात सोचमें गुजरगई- सुबह उठ स्नान पूजामें
फरागत कर फिर उसी मकानमें आया. सिंहासनके पास खडा
हो चाहा कि पांव उठाकर धरें इतनेमें तारा नामक---
उन्नीसवीं-
पुतली बोली-कि हे राजा ! तू अज्ञानी बावला हो-
कर यह क्या करता है ? पहले मैं तुझसे एक बात कहतीहूं सो
सुनकर पीछे और विचार कर. जो तुम इस सिंहासनपर चरण
रक्खोगे तो सबके अपराधी होगे, मुझपर पग दिया था राजा
विक्रमादित्यने. तूने अपने जीमें क्या विचारा है ? जो यह इरादा
करके आया है ! मेरा हृदय जो है सो केवल कमल है और मधुकर बीर
विक्रमादित्य था. तू गोबरका कीड़ा है और मुझपर पांव किस
तरह रक्खेगा ? राजा बोला-सुन बाला ! तूने मुझे गोबरका

उन्नीसवीं पुतली १९. ( १२१ )

Page 122Permalink

उन्नीसवीं पुतली १९. ( १२१ )

कीडा क्यों कर जाना ! तब पुतली बोली-सुन राजा भोज !
एक दिनकी कथा, एक ब्राह्मण सामुद्रिक नाम सामुद्रिक पढा
हुआ था, बनमें चला जाताथा, उसके बराबर दुनियांमें कोई
और पंडित न था, अनेक अनेक विद्याके भेद जानताथा, उसने
दर्याफ्त किया कि इस रस्ते कोई आदमी गया है, जब उसके
निशान पांवके देखे तो उसमें उर्ध्वरेखा और कमलका चिन्ह
नजर आया तब वह अपने जीमें विचार करने लगा कि कोई,
राजा नंगे पांव इस रस्तेसे गुजरा है इसको देखा चाहिये कि
वह कहां गया है ! यह विचारकर उन पांवोंका निशान देखता
हुआ जब कोशभर जा पहुँचा तो उस बनमें देखा कि एक
आदमी दरख्तसे लकडिया तोडकर गठडी बांध रहा है. तब
ब्राह्मण उसके पास जाकर खडा हुआ और पूंछा कि-तू यहां
इस बनमें कबसे आया है ? वह बोला-महाराज ! दो घडी रात
रहनेसे इधर आयाहूं तब ब्राह्मणने पुछा कि, तूने किसीको इस
रास्तेसे जाते देखा है कि नहीं ! उसने कहा किं-महाराज ! मैं जिस
समयसे यहां आया हूं तबसे इन बनमें मनुष्यका तो जिक्र
क्या है कोई पक्षी भी नजर नहीं आया, तब फिर उस ब्राह्म-
णने कहा कि देखूं तेरा पांव, यह सुनकर पांव उसने आगे रख
दिया, और ब्राह्मण सब चिन्ह देख देखकर अपने जीमें
कहने लगा कि, यह सबब क्या है कि सब लक्षण इसमें

Page 123Permalink

(१२२) सिंहासनबत्तीसी.
राजाके हैं और यह इतना दुःखी क्यों है ? फिर उसने पूछा कि-
कितने दिनोंसे तूं यह काम करता है ? उसने कहा-जबसे मैंने
होश संभाला हे तबसे यही उद्यम करके खाताहूं और राजा
धीर विक्रमादित्यके नगरमें रहताहूं. ब्राह्मणने पूंछा कि-तू बहुत
दुःख पाता है. वह बोला-महाराज ! यह भगवतकी इच्छा है
कि किसीको हाथीपर चढ़ावे और किसीको पैदल फिरावे,
किसीको धन दौलत बिन मांगे दे और किसीको भीख मांगे
टुकडाभी न मिले ! कोई सुखमें चैन करते है कोई दुःखमें धौरा
रहते है. भगवतकी गति किसीसे नहीं जाती जानी कि कौन रूप
किसमें रचा है ? और जो कर्ममें लिख दिया है सो मनुष्यको
भुगतना होता है ! उसके हाथ सुख दुःख हैं. इसमें किसीका कुछ
जोर नहीं चलता. उससे यह बातें सुन और वह चिन्ह देख
ब्राह्मणने अपने जीमें अचरज किया. कहा कि-मैंने बड़ी मह-
नतसे विद्या पढीथी. सो मेरा श्रम व्यर्थ गया. और सामुद्रिकमें
जो विधी लिखी है पुरुषके लक्षण देखनेकी सो झूठ गंवाई और
यह कह मनमें मलीन हो विचार करता राजाके पास चला कि
जाकर उसकाभी पांव देखूं कि उसमेंभी निशान है या नहीं ?
और जो लक्षण पोथीके प्रमाण न मिलें तो सब पोथियां फाड
जला संन्यासी हो तीर्थ यात्राको चला जाऊं. फिर संसारमें रहनेसे
कुछ अर्थ नहीं और न मानूंगा क्योंकि इतनी मुद्दतकी

उन्नीसवीं पुतली १९. ( १२३ )

Page 124Permalink

उन्नीसवीं पुतली १९. ( १२३ )
मेहनत झूठ कर्मके पीछे गवाई तो आगे संसारमें क्या फल
मिलेगा ! उससे भगवद्भजन करना अच्छा है इस लिये कि,
स्वार्थ न हो तो परमार्थ तो होगा यह विचार करता करता
राजाके पास जाकर पहुँचा, और राजाको आशीद दी. तब
राजाने दंडवत् करके कहा कि-देवता ! तुम इतना मन मलीन
होगये इसका कारण क्या ? क्या दुःख तुम्हारे मनमें उपजा है ?
सो मुझसे कहो ? ब्राह्मणने कहा कि-राजा ! तू पहले अपना
चरण मुझे दिखा तो मेरे चित्तका संदेह जाय. तब राजाने
अपना पांव ब्राह्मणको दिखाया और उसने कुछ लक्षण उसमें
न पाया. वह देख शीश नवाय चुप होरहा और अपने जीमें
कहने लगा कि, पोथियां सब जला संसारको त्याग वैराग्य ले
देश देश फिरिये. यह तो अपने जीमें विचार कर रहाथा,
राजाने कहा-पंडित ! तूं क्यो क्रोधकर शिर डुलाय पछताय
चुप हो रहा है ? अपने मनकी बात मुझे कह कि तूने अपने मनमें
क्या ठानी है ? तब ब्राह्मण बोला कि-सुनो महाराज ! मेरे पास
सामुद्रिक पोथी है और बारह बरस मैंने पढकर याद की है सो
मेहनत मेरी निष्फल गई इस वास्ते संसारसे मेरा जी उदास
हुआ है. राजाने हँसकर कहा कि-यह तुमने प्रत्यक्ष क्यों कर
देखा. वह बोला-महाराज ! एक मैंने बडा दुःख देखा कि
जिसके पावमें ऊर्ध्व रेखा और कमल था और उसकी रोजी यह

Page 125Permalink

( १२४ ) सिंहासनबत्तीसी.

थी कि, लकड़ियां बनमेंसे लाता और बेंचकर खाता ! यह
देखकर मैंने जो तेरा पाव देखा कोई अच्छा लक्षण न पाया
और तू सारे नगरका राज करता है इससे मेरे जीमें क्रोध
हुआ है. इससे अब घर जाकर ग्रंथ जला देश, त्याग करूंगा.
राजाने कहा-ब्राह्मण ! सुन मैं तुझे बुलाकर कहता हूं और ग्रंथ
साधकर तुझे दिखसाताहूं तब तेरा जी पतीआवेगा. किसीके
लक्षण गुप्त होते हैं और किरासे प्रकट. तब ब्राह्मणने कहा-
महाराज ! यह मैं किस तरहसे जानूं. तबही राजाने छुरी मँगवा
तलुवोंकी खाल चीर लक्षण दिखला दिये. ब्राह्मणने देखा कि
कमल और उर्ध्वरेखा है वह देखकर उसके जीको संतोष हुआ
और कहा कि-हे कि विप्र ! ऐसी विद्या पढी हुई किस काम आती
है कि जिसके सब भेद मालूम न हो इस तरहके लक्षण देख
ब्राह्मण अवाक् हुआ. फिर राजाको आशीद दे अपने घरके
गया. इतना किस्सा कह पुतली बोली कि-सुन राजा भोज !
कब इस योग्य तू हुवा ? जो सिंहासनपर बैठनेकी अच्छा
करता है ? और जो इतना साहस करे सोही इस सिंहासनपर बैठे
नाम, धर्म, यश आदमीके जानेसे नहीं जाता. जैसा फूल नहीं
रहता और उसकी सुगंध अंतरमें रह जाती है. यह सुनकर
राजाको कुछ चेत हुआ और कहने लगा कि, यह संसार स्थिर
नहीं, जैसी तरूवरकी छाय है वैसीही दुनियाकी गति है. जिस

बीसवीं पुतली २० (१२५)

Page 126Permalink

बीसवीं पुतली २० (१२५)
तरह चंद्र सूर्य आते जाते हैं उसी तरह मनुष्यका जीना मरना
है. जैसे कोई सपनेमें कौतुक देखता है वैसा ही जगका रूप
नजर आता है. और मनुष्यदेह धरके अनेक दुःख भोग करते हैं.
पर सुख यह है कि, जो हरीभजन हो. इतना ज्ञान राजा अपने
जीमें विचार वहाँसे उठ अपने मंदिरमें गया. रात जैसी तैसी
काटी, प्रभात होते ही फिर वहां आन मौजूद हुआ और पुत-
लियोंसे पूंछा कि अब मैं क्या करूं ? तुम मुझे कहो. तब. चंद्र
ज्योति नामवाली-
बीसवीं पुतली-
कहने लगी-महाराज ! मै समझाकर कथा आपके आगे कहता हूं.
एक दिन राजा बीर विक्रमादित्यने खुश होकर रासमंडलीके प्रधानको
आज्ञा दी कि यह कार्तिकमहीना धर्मका महीना है. इसमें कुछ हरिका
भजन मन लगाकर करना चाहिये शरदपूनो ठाकुरकी रास
लीला करो. प्रधानने राजाकी आज्ञा पाय देश देखके राजा
और पंडितोंको न्योता भेज बुलाया और जितने नगरके योगी थे उन
कोभी खबर दे तलब किया. और जितने देवता थे उनकोभी मंत्रोंसे
आवाहन करके बिठलाया, रास होने लगा. चारों ओरसे जगजय
कार शब्द होने लगा. और राजा एक एकका शिष्टाचार मनुहार
करकर फूलमाल ठाकुरका प्रसाद देने लगा. राजाने देखा सब देवता

Page 127Permalink

( १२६ ) सिंहासनबत्तीसी.

आये. पर चंद्रमा नहीं आये. अपने जीमें विचार बैतालपर सवार
हो चंद्रलोकको गया. वहां जा सन्मुख हो दंडवत् की और हाथ
जोड़ कर कहा-स्वामी ! मेरा क्या अपराध है ? जो अपने कृपा
न की और सबने मेरेपर कृपा की है. बिना तुम्हारे मेरा
काम आधा है अब काम मेरा सुधारिये. आपको धर्म
होगा. तुम्हें संसारमें यश और कीर्ति मिलेगी. जो कदाचित्
आप इसमें विलंब कीजियेगा तो मैं हत्या दूंगा. तब
चंद्रमाने हँसकर कोमल मधुर बचनसे कहा-राजा ! मैं तुझसे
सत्यकर कहताहूं तू अपने जीमें उदास न हो. मेरे आनेसे संसारमें
अंधकार होजायगा. इस लिये मेरा आना नहीं बनता. तुझे
अभिलाषा थी मेरे दर्शनकी सो तेरी इच्छा पूरी होगई. और तेरा
काम सुफल होगा. तू अपने नगरमें जा. जो काम तूने आरंभ किया
है सो पूर्ण कर. इस तरहसे राजाको समझा अमृत दे विदा किया.
राजाने शिर चढ़ाले लिया, और दंडवत् कर अपने नगरको चला
रास्तेमें देखा कि यमराजके दो दूत एक ब्राह्मणका जीव लिये जाते
हैं. राजाने वह देवदृष्टिसे जाना और उस ब्राह्मणके जीवने राजा-
को देख दूतसे कहा कि-इस राजाको भेटना है. राजाने उस ब्राह्म-
णकी आवाज सुनकर कहा कि-भाई तुम कौन हो ? तब उन
दोनोंने समझाकर राजासे कहा कि-हम यमके भेजेसे उज्जैन
नगरीको गये थे. ब्राह्मणका जीव लेकर अपने स्वामीके पास जाते

बीसवीं पुतली २० \hfill ( १२७ )

Page 128Permalink

[Page Header]
बीसवीं पुतली २० \hfill ( १२७ )


हैं. राजाने उससे कहा पहले उस ब्राह्मणको तुम हमें दिख दो
और पीछे अपने कामको जाओ. वे दूत राजाको साथ ले नगरमें
गये. जहां उस ब्राह्मणका देह पड़ा था वहां दिखाया. राजा
देखतेही उस ब्राह्मणका शीश निहुबा अपने मनमें कहने लगा
कि, यह तो हमाराही पुरोहित है. तब राजाने दूतोंको बाताम
लगा नजर बचा वह अमृत उसके मुँहमें डाल दिया. ब्राह्मण
रामका नाम ले उठ खडा हुआ. ब्राह्मणने राजाको प्रमाण कर-
तेही आशीष दिया और दूतोंसे हाथ जोड विनती कर कहा
कि—यह जीवदान मैंने तुमसे पाया. यह देखकर दूतोंने अपने
जीमें अचंभा किया कि अब हम जाकर क्या जवाब देवेंगे ?
यह विचार करते हुए दूतोंने यमराके पास जा सब राहकी
अवस्था कही. यम सुनकर चुप होरहा और राजा ब्राह्मणका
हाथ पकड अपने मंदिरको लाया. और बहुतसा दान दे उसको
बिदा किया. यह कथा सुनाकर चंद्रज्योति नाम पुतली बोली कि,
हे राजा भोज ! ऐसा पुरुषार्थ तू कर सके तो आसनपर बैठ
नहीं तो उसके खयालसे दर गुजर, इस तरहसे सुन राजा
वहांसे उठ अपने मंदिरमें आया. रात तो जिस तिस तरहसे
काटी. सुबह होतेही स्नान ध्यान कर तैयार हो फिर सिंहासनके
पास जा खडा हुआ. चाहता था कि उठकर पांव धरें तब
अनुरोधवती नामवाली—