सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
सत्रहवीं पुतली १७. (१०९)
सत्रहवीं पुतली १७. (१०९)
पंडितकी बात सुनकर राजाको उनसे मिलनेकी इच्छा हुई.
तब बेतालोंको बुलाकर कहा कि-मरे तईं पातालको लेचलो.
मैं शेष नागके दर्शनको जाऊंगा. ऐसा राजाका बचन सुन
बेताल उठाकर पातालको लेगये और शेष नागका मंदिर
दिखा दिया. राजाने उनका मंदिर देखतेही बेतालोंको
विदा किया. और आप मंदिरको चला गया. जब जाकर
उनके पास पहुँचा और देखे तो वह कंचनका और मंदिर है
उसमें रत्न जडे हुए चकमका रहेहैं. और ऐसी ज्योति है उसकी
कि जिसकी रोशनिके सिवाय रात दिन कुछ नहीं मालूम
होता. द्वार द्वारपर कमलके फूलोंकी बंदनवार बँधी हुई हैं.
और घर घर आनंद मंगलाचार हो रहा है. वहां राजा कुछ
डरता डरता कुछ खुशी खुशी हो जाकर खडा हुआ और
वहांके द्वारपालोंसे दंडवत् करक कहा कि-महाराज ! हमारा
समाचार शेष राजाजीको पहुँचाओ कि-मर्त्यलोकसे एक
राजा आपके दर्शनको आया है. तब दरवान राजाको खबर
देनेको गया. और यह द्वारपर खडा हुआ कहता था कि-धन्य
भाग्य है मेरा कि, मैं यहां तक आन पहुंचाहूं और चारों तरफसे
रामकृष्ण रामकृष्ण इस नामकी आवाज आतीथी. राजाके
मंदिरमें वेदकी ध्वनि कान पडती थी. जब दरवान
राजाके सम्मुख जा प्रणाम कर हाथ जोडकर खडा हुवा. राजाने
उसकी और दृष्टि की, उसने कहा-महाराज ! एक मनुष्य द्वारपर
( ११० ) सिंहासनबत्तीसी.
खडा है और कहता है कि, मैं मर्त्यलोकसे आया हूँ, द्वारेका
हजारों दंडवत् करता है, उसको आपके दर्शनकी अभिलाषा
है. जिससे निहायत बेचैन है. यह बात सुनतेही शेषनाग
उठके द्वारपर आये. राजाने देखतेही उनको साष्टांग प्रणाम
किया और उन्होंने हँसकर आशीष दी और पूँछा कि-तुम्हारा
नाम क्या है ? और कौनसा देश है ? तब राजाने हाथ जोड़कर
कहा कि-स्वामी ! विक्रम भूपाल मेरा नाम है. मैं मर्त्यलो-
कका राजा हूँ और आपके चरणके दर्शनकी मुझे इच्छा थी सो
मेरे मनकी इच्छा पुरी हुई. आज मुझे करोड यज्ञका फल हुआ
और करोड़ों रुपये-दान कियेका पुण्य पाया. और धन्य भाग
मेरा जो आपके चरणकमलके दर्शन हुए. बल्कि चौंसठ तीरथ
न्हायका मुझे फल हुआ. विक्रमका नाम सुनतेही शेष नाग उसको
मिले और हाथ पकड़कर अपने मकानमें लेगया. अच्छी जगह
बैठाकर क्षेम कुशल पूँछी. राजाने कहा-महाराजके दर्शनसे सब
आनंद है. फिर शेषनागने कहा-तुम किस कारण यहां आयेहो ?
और आते हुये पंथमें तुमने बहुत कष्ट पाया होगा. विक्रम
बोले कि-फणिनाथ ! मैंने जो कष्ट पाया सो सब तुम्हारे दर्शन
कियेसे निस्तरा. फिर राजाको रहनेके लिये एक अच्छा स्थान
दिया और बहुतसे लोग टहल करनको. उन लोगोंसे कह दिया
कि मेरी सेवासे भी तुम अधिक राजाकी सेवा जानना