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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

तेरहवीं पुतली १३. ( ८७ )

तेरहवीं पुतली १३. ( ८७ )

था, जब अँधेरा होगया और रात बहुत होगई तब एक
किनारेपर जा पहुँचा, यहां उतरकर अपने हाथ जीन-
डा घोड़ेको एक झाड़ीसे बांधकर बैठ रहा, फिर देखता
क्या है कि,वह नदी बढ़ती आती है, और यह हटने लगा,
गरज ज्यों ज्यों राजा हटता जाताथा त्यों त्यों बह बढ़ती जा-
तीथी, फिर जो निगाह की तो यह देखा कि, नदीकी बीच धारमें
एक मुर्दा बहा चला आता है, और उसके साथ एक बैताल
और एक योगी खैंचा खैंची किये हुए आते हैं, और आपसमें
झगडते हैं, योगी बैतालसे कहता है कि-तुने बहुतसे मुर्दे खाये
हैं और यह मैंने अपने अवसरपर पाया है तू छोड़दे मैं उसे
लेजाकर अपना योग कमाऊंगा, यह सिद्धि मैंने तुझसे पाई,
यह सुन बैताल बोला-भाई ! मैं आयाना नहीं हूं, जो तू मुझे
फुसलावे, क्योंकर मैं अपना आहार तुझे दूं ? इसी तरह दोनों
आपसमें झगडतेथे और कहतेथे, कि, कोई तीसरा पुरुष इस बखत
ऐसा नहीं कि, हमारा न्याय चुकावे, फिर योगी कहने लगा कि-
बैताल ! तू मेरी बात सुन कल प्रभातको हम तुम सभाको जावें
और जो सभामें न्याय चुके वही तूभी प्रमाणभी कर और मैं भी
करूंगा, इतनेमें एककी दृष्टि राजाकी ओर जा पडी, देखकर
दोनों हँसे और कहने लगे कि-वह कोई मनुष्य नदीके किना-
रेमें नजर आता है, वहां चलो कि, वह अपना न्याय निबडेगा,