सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
छब्बीसवीं पुतली २६. ( १६९ )
छब्बीसवीं पुतली २६. ( १६९ )
नेवाला है और मैं तुझसे कहताहूं कि, तू जाकर अपना राज
कर, तेरा काल निकट आवेगा तब तू मेरेपास आइयो, मैंने तुझे
बचन दिया है कि, अंतसमयमें मैं तुझे मोक्षपद दूंगा. इससे तू
अब जाकर मर्त्यलोकमें आनंदसे राज कर. फिर राजा करुणा
करके बोला कि, महाराज ! संसारमें तुम्हारे प्रपंच कुछ जाने नहीं
जाते या तो मुझे इस समय तारो नहीं तो मैं अपना जी देताहूं.
तब हँसकर शंकरजीने कहा कि, जो तू जी देगा तो मृत्युबिना यम
तुझे हाथसे भी न छुएगा. और फिर आयुर्बलके दिन भरने पड़ेंगे
इसवास्ते तू जा उठ मेरा वचन जीमें रख इतना कह शिवजी तो
कैलासको गये, और राजाके हाथमे कमलका फूल दे यह कह
गये कि जब यह कमल मुर्झायगा तब तू जानियो कि अब छ
महीनेमें मैं मरूंगा. फूल ले राजा अपने नगरको आया और
अपने मनका विचार किसीके न कहा. कितनेएक बरस पीछे वह
कमलका फूल मुर्झा गया. तब राजाने समझा कि, मैं अबसे छ
महीनेमें मरूंगा. जितनी कुछ धन और दौलत थी सो सब ब्राह्म-
णोंको संकल्प करदी. स्त्री और पुत्रके खानेको कुछ धन दिया
बाकी सब पृथ्वी ब्राह्मणोंको दान करदी. इस तरह राजा ज्ञान
पुण्यकर सदेह कैलासको चला गया. इतनी बात कह पुतली
बोली सुन राजा भोज ! विक्रमा दित्यने इतना काम किया और
जीवन मरण दोनों चीन्हा. इससे मैं तुझसे कहती हूं कि, जीनेका
( १७० ) सिंहासनबत्तीसी.
कुछ भरोसा नहीं और मरण साथ लग रहा है. दुःख
सुखभी मनुष्यके साथ हैं और पापपुण्यभी रहते हैं. नि-
र्गुण और सगुण ज्ञानभी घटमें रहता है पर एक ब्रह्मही अलग है.
इस वास्ते मैं तुझसे कहतीहूं-ऐ भूपाल ! संसारमे जिसकी कीर्ति
रह जाती है सोही अमर है. जो मैंने तुझे कहा कि, मन वचन
कर्म कर तू सच जान. वह दिन तो यों गुजर गया, राजा नाउ-
म्मेद होकर अपने मकानको फिर गया. सुबह होतेही हाथ, मुंह
धो, स्नान पूजा कर फिर वहीं आन मौजूद हुआ और जितने
राजाके सभामें लोग थे वे भी सब हाजिर हुए राजाने अपने
लोगों कहा कि-पुतलिया तो बाते झूठ झूठ बना मेरे आगे कहती
है अब मैं इनकी बाते न सुनूंगा और इस सिंहासनपर बैठूंगा. यह
अपने लोगोंसे बाते करता था कि-जगज्ज्योति नामावाली --
सताईसवीं पुतली-
बोली-सुन राजा भोज ! एक दिन राजा बीरविक्रमादित्य
अपनी सभामें बैठा था कि, उसमें प्रसंग निकला. उसमे-
कोई बोल उठा कि, आज राजा इंद्रके बराबर कोई राजा
नहीं है, क्योंकि वह देवलोकका राज करता है ! यह बात
राजाने सुन किसीसे कुछ न कहा और बैतालोंको बुलाकर कहा
कि, मुझे इंद्रपुरीको ले चलो. बैताल तुरंत के उडे और एकदममें के