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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

और तमाम दुनियाका दान देनेवाला था, आगे मै उसकी कथा

( १२ ) सिंहासनबत्तीसी.

करताथा, बड़ा उसका दबदबा था, देवताओंका पूजनेवाला
और तमाम दुनियाका दान देनेवाला था, आगे मै उसकी कथा
तेरेवास्ते कहती हूं राजा ! कान देके सुनो. उपामस्वयंवर उस
नगरीका राजा था, जातका ब्राह्मण पर बड़ा राजा हुआ, तब
गंधर्वसेन उसका नाम हर तरफ बजने लगा और उसके घरमे
चारि वर्णकी रानियां थीं-ब्राह्मणी, क्षत्रिया, वैश्या, शूद्रा.
उसमें जो ब्राह्मणी थी सो बहुत अच्छी सूरत और नाज़ुक थी.
इसके एक बेटा हुआ सो बड़ा पंडित हुआ. ब्राह्मणीत उसका
नाम रक्खा. ऐसा ऐ राजा ! कोई दुनियामें पंडित न था, जित-
ने इल्म थे सो सब उसने पढेथे. यहांतक कि, मौतकाभी अहवाल
कहदेता. और क्षत्रियासे तीन बेटे हुए, उन्होंने क्षत्रियोंका धर्म
अक्तियार किया, एकका नाम शंख, दूसरेका नाम विक्रम, ती-
सरेका नाम भर्तृहरि. एकसे एक बली था सब जगमें उनका नाम
मशहूर था और उ हे कल्पवृक्ष दुनियाके लोग कहतेथे और
बेश्यासे बेटा जो हुआ उनका नाम चंद्र रक्खा, वह बड़ा
सुखी और रहमदिल था, शूद्रीसे जो बेटा हुआ उसका
नाम धन्वंतरि रक्खा था, वैद्योमें वह बड़ा वैद्य था, छह बेटे
राजाके हुए, एकसे एक अच्छे गरज़ अमरसिंहके घरानेमे
सबके सब खूब हुए, और वह जो ब्राह्मणीसे हुआथा वही राजा-
की दीवानी करताथा, उसमे जब कोई तक़सीर हुई तब राजाने

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सिंहासनबत्तीसी. ( १३ )

खिदमत लेली. वह लड़का वहांसे निकलकर धारापुरमें आया.
अय राजा ! वहां सब तुम्हारे बुजुर्ग थे. उसे उन सबोंने
माना, बड़ी आव भगत की. वहाका राजा तुम्हारा बाप था.
कितनी मुद्दतके बाद उसने दगा करके उस राजाको मारडाला
और आप वहांका राज लेकर उज्जैन नगरीमें आया और यहां
आकर मरगया. शंख जो बडा बेटा क्षत्रियाके पेटका था सो
वहां आकर वहांका राजा हुआ, राज करने लगा. और औ
यह अहवाल है कि, एकरोज पंडितोंने आकर राजा शंखसे कहा
कि, तेरा दुश्मन दुनियामें पैदा हुआ. यह बात पंडितोंके मुंहं
सुनकर वह भौचक रहगया. ब्राह्मण कहने लगे-हम सब
शास्त्र देखा है, उससे यही अहवाल निकलता है, कि, जो हमने
तुझसे कहा. मगर एक बात और है कि हम उसे मुंहसे निकाल
नहीं सकते. तब राजाने कहा-खैर, जो तुमने यह बात कही
तो वहभी कहो ! तब उन्होंने कहा-हमारे विचारमें यह आता है
कि, शंखको मार राजा विक्रम यह राज करे. यह बात सुनकर
राजा हंसा और कहने लगा, ये पंडित बावले हैं, उन्हें कुछ ज्ञान
नहीं. इसलिये ऐसी बात कहते हैं. यह बात अनसुनी कर
राजा चुप रहा. पण्डित अपने दिलमें शरमिंदा हुए कि, हमारे
शास्त्रको इसने झूठा जाना और हमको दिवाना ठहराया. जब
कितने एक दिन इस बातपर गुजरे तब पण्डित अपने मकान-

(१४) सिंहासनबत्तीसी.

नोंमें बैठकर नजूम देखने लगे. उनमेंसे एक पंडित बोला-मेरे
विचारमें यह आता है कि, राजा विक्रम कहीं नजदीक आन
पहुँचा है. तब दूसरा उनमेंसे बोला-यहाँके किसी जंगलमें है. और
एक उनमेंसे कहने लगा, उस जंगलमें एक तालाबभी है, वहीं
अखाड़ा करके रहा है. तब एक ब्राह्मण उनमेंसे उठ खड़ा हुआ
और जंगलको चला. वहां जाकर क्या देखता है कि, एक तालाब
उसी राजा विक्रम तपस्या करता है मट्टीका एक महादेव बनाकर
उसकी पूजा करता है और दंडवत् कर रहा है यह देखकर
पंडित उलटा आया और सब पंडितोंको साथ लेकर राजाके
नेारा गया और राजासे कहने लगा कि, तुम हमारे शास्त्रको झूठ
मानते थे पर अब हम देखके आये हैं. फलाने जंगलमें राजा
विक्रमादित्य आन पहुँचा. राजा शंख उस रोज सुनकर चुप रहा.
सुबहको उठा और उस बनमें जातेही छिपकर देखने लगा कि,
वह क्या करता है जहां राजा वीर विक्रमादित्य बैठा था वहांसे
वह उठा पर तालावमें नहाकर फिर अपने आसनपर आकर
बैठा और उसी तरहसे महादेवकी पूजा करने लगा. ओर यह
: राजाभी निकलकर वहां जाकर खड़ा हुआ. जब वह विक्रम
: महादेवकी पूजा कर चुका तब उसी महादेवकी पिण्डीपर उसने
: पेशाब किया. जितने लोग राजाके साथ आयेथे, वे सब कहने
: लगे कि, इसकी बुद्धि मारी गई है, कि पूजेहुये देवपर इसने

सिंहासनबत्तीसी. ( १५ )
थूता. तब एक पंडित उनमेंसे बोला कि, उठो महाराज! यह
तुमने क्या किया ! तब वह बोला, कि हम जातिके ब्राह्मण हैं
देवताको पूजें या मिट्टीको ! तब ब्राह्मणोंने कहा, राजा ! कुछ हम
अच्छा नहीं देखते, क्योंकि तुम्हारी मत कुमत होगई. जब
मरनेका दिन आदमीका नजदीक आताहै तो उसका मति मारी
जाती है. तब राजा बोला, तुम दिवाने होगये हो और मुझेभी
बावला बनाते हो, जो भगवानने लिखा है वही होवेगा उसको
कोईभी मिटा नहीं सकता. तब पंडित आपसमें कहने लगे इस
राजाने क्या अपना अकाज किया है ? तब राजा शंखने बिक्र-
मको मारनेकी यह फिकिर की कि सात लकीर कोयलेरो जादूकी
काढी और उनपर भुस फैला दिया जो जरा मालूम न हो.
और उन लकीरोंका यह गुण था कि, जो उनके ऊपर पांव धरे
सो बावला होजाय. और एक खीरा मँगाकर जादू किया और
एक छुरी पढकर हाथमे रक्खा. उस छुरी खीरेका यह असर
था कि जो उस छुरीसे खीरा काटे उसका शिर कट जाय.
पंडितोने कहा-आप उ० बुलाओ. उन, लकीरोंपर पाव धरके जो
आवेगा तो वह दिवाना हो जावेगा. बावला होकर यह खीरा
जो अपने हाथसे लेकर काटेगा तो शिर उसका कट जायगा.
जितने क्षत्रिय राजाके साथ आयेथे वे सब अपने दिलमें फिक्रमंद
हुए कि, इस राजाने दगा किया है. यह क्षत्रियोंका धर्म नहीं.

( १६ ) सिंहासनबत्तीसी.

राजाने विक्रमादित्यको बुलाके कहा-हम तुम बैठकर एकजगह
खीरा खावें. वह राजा योगी था, और इस इल्मको जानता
था. उन लकीरोंसे बचकर सिंहासनके पास जाकर खडा रहा.
खीरा और छुरा उसके हाथमेंसे लेलो. दाहिने हाथमें छुरी रक्खी
और बाये हाथमे खीरा लिया. राजा शंख गाफील था फुरती करके
छतसे छुरी मारी और राजाका काम तमाम किया. यह बात रत्नमं-
जरीने जाहिर की और कहा कि-हे राजा ! तूं इस बातका सुन. खुदा
जो रहम करे तो तिनकेसे पहाड करे और गजब करे तो पहाड़से
जो तिनका किताबमें जो लिखा है, वह कभी झूठ नहीं होता. जब मांके
पेटमें इन्सान आता है चार बातें साथ लाता है नफा और नुकसान
दुःख और सुख. तीन लोक और चौदह भुवन फिरे लेकिन
किस्मतका लिखा नहीं मिटता. भाईको मारा, दिलमें खुश हुआ
उसके लोहूका माथेपर टीका लगा लिया. चलकर सिंहासनपर
बैठा और चंवर ढुलवाया. उस राजाकी रानी उसके साथ
सती हुई तब यह राजनीतिसे न्याय करने लगा. और जितने
राजा उसके राजमें ये सब सुनकर खुश हुए. मुजरेको आये
और दोनों वक्त दरबारमें हाजिर रहने लगे. इसी तरहसे
राजा राज करने लगा. कितनें एक दिनोंके बाद एक दिन
राजा शिकारको चला. तब कुत्ते, बाज, बहरी और जितने
शिकारी जानवर थे सो सब साथ लिये. और जितने अच्छे-