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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

तेईसवीं पुतली २३. (१४७)

तेईसवीं पुतली २३. (१४७)

पुरुषार्थ था यह सुनकर करुणावती पुतली बोली राजा ! जो तुम
स्थिर होकर बैठो और कान देकर सुनो तो मैं सब कथा कहती हूँ.
तब राजा यह बात सुन प्रसन्न हो आसन बिछवा वहां बैठगया
और जितने लोग राजाके साथ थे गिर्द ओ पेश वे सब बैठगये.
फिर पुतली बोली कि, राजा ! वीरविक्रमादित्यके गुण तू सुन.
ऐसा यशी, साहसी और पुण्यात्मा इस कलियुगमें कोई जन्मा
नहीं और न कोई जन्मेगा. जिस समय राजा वीरविक्रमादित्य
शंखको मार राजगद्दीपर बैठा तब शंखके दीवानको बुलाकर
कहा कि, तुझसे मेरा काम न चलेगा. इससे यह बेहतर है कि,
बीस दास मुझे अच्छे ढूंढकर दे कि जो राजकाज करनेके लायक
हों, क्योंकि तुझसे कामका बंदोबस्त न होगा. मैं उनसे अपना
सब काम करा लूंगा. राजाकी आज्ञा सुन दीवानभी बीस आदमी
उसी नगरमेंसे ढूंढकर लाया. कुलमे, उमरमें, सुंदरतामें, सबके
सब अच्छे थे. उनको राजाके सामने खड़े करदिये. तब राजा
उनको देखतेही बहुत प्रसन्न होगया. और उसी समय सबको
बागे पहना पान देकर कहा कि, तुम हमारी खिदमतमें सदा
हाजिर रहो. फिर उसके कई दिनके बाद उनमेंसे किसीको
दीवान, किसीको कोतवाल, किसीको सेनाध्यक्ष किया. गरज इसी
तरहमें हर एकको एक काम देकर पुराने लोगोंको जवाब दिया.
और सब नया बंदोबस्त कर दिया. पर एक उस पुराने दीवानको
जवाब न दिया, दीवान जब अपने घरमें बैठा करता तब वे सब

( १४८ ) सिंहासनबत्तीसी.
पुराने लोग आकर हाजिर हुआ करते और आपसमें चर्चा करते
कि यह राजा बुद्धिमान है, जो राजको यों लिया और बंदोबस्त
यों किया, कई दिनके बात उन लोगोंसे दीवानने कहा कि, तुम
मेरेपास आया न करो इस लिये कि काम तो मेरे हाथ तुम्हारा
निकलता नहीं और नाहकको राजा सुनेगा, तो खपा होगा कि,
यह अपने घरमें क्या मता किया करते हैं ? इस वास्ते मैं अपनी
बदनामीसे डरताहूं कुछ तुम मेरे इस कहनेका अपने मनमें
बुरा न मानना. यह सुनकर उनमेंसे फिर कोई उसके पास न
आया, यह अपने मनमें कहने लगा कि, ऐसा कुछ काम कीजिये
जिसमें संतुष्ट हो रैनादिन यही विचार करता रहा था. एक दिन
वह प्रधान नदीके किनार गया, वहां जाकर स्नान ध्यान कर
कमरभर पानीमें खड़ा हुआ जप करताथा इसमें उसे नदीमे
एक फूल अति सुंदर कि वैसा कभी दृष्टीमें न आया था बहता
हुआ देखा. अपना जप छोड़कर आगे बढ़ फूल लेकर जीमें
विचारा कि यह राजाको भेंट करूंगा तो वह देखकर बहुत खुश
होवेगा, वह फूल हाथमें ले खुशी खुशी अपने घरमें आ कपडे
दरबारके पहन राजाके पास गया, और फूल नजर किया. राजा
फूल लेकर खुश बहुत हो बोला कि, अपने राज पाट‌का मैंने
तुझे प्रधान किया, उसने उठकर भेंट दी और आदाब बजा‌लिया.
फिर राजाने कहा इस फूलका वृक्ष मुझे लादे, और लादेगा तो
मैं तुझसे बहुत खुश हूंगा और न लादेगा तो अपने नगरसे