सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
तीसरी पुतली ३० ( ३५ )
तीसरी पुतली ३० ( ३५ )
तीसरी पुतली-
बोली:-यह काम नहीं जो इसपर बैठो, पहिले मुझसे एक
नई कथा सुनलो. एक दिन राजाबीर विक्रमादित्य दरिया
किनारेपर महलमें खिलवत करते बैठेथे, राग हो रहाथा, और हरएक
रंगकी चुहल मच रहीथी कि, दिल फरेफ्ता होजावे. और एकसे एक
सहेली खूबसूरत पास बैठी थीं राजाका दिल वहां बेइख्तियार लग
रहाथा कि, एक पंथी त्रिया संग लिये हुए और उस त्रियाकी गोदमें एक
बालक घरसे खफा होकर निकले थे. दरियाके पास आकर गुस्सेके मारे
कूदपडे. मर्दके एक हाथमें रंडी और एक हाथमें वह लड़केका हाथ ये
तीनों डूबने लगे. तब पुकारकर बोले कि-ऐसा धर्मात्मा कौन है,
जो इन तीनों आदमियोंकी जान बचावे ? उनमेंसे वह मर्द हाथ
करके पुकारा जो कोई गुस्सा मार न सके तो इसी तरह हो
बेअजल मर जाता है. और गिरके बहुत पछताता है. उसकी
आवाज राजा विक्रमादित्यने सुनतेही पासके लोगोंसे कहा कि-
यह कौन दुःखी पुकारता है ? तब हरकारोंने खबर दी कि,
महाराज ! एक मर्द और एक रंडी लड़केके समेत पानीमें डूबते हैं.
उनमेंसे वह मर्द चिल्ला रहा है कोई ऐसा उपकारी हो कि,
इस डूबोंको निकाले. यह हरकारा कहताही था कि, वह फिर
पुकारा- हम तीन जान डूबते हैं. कोई हमें भगवानका
( ३६ ) सिंहासनबत्तीसी.
बंदा पार लगावे, यह सुनकर राजा वहांसे धाया और आकर
उस दरियामें कूद पडा, जाकर एक हाथमे रंडी और दूसरे
हाथमें लड़केको पकडलिया, वह मर्दभी राजासे लिपटगया,
तब राजा घबराया और आपभी डूबने लगा. इतनेमें
ईश्वरको याद किया और कहा कि—हे नाथ! मैं धर्मके
वास्ते आया था और इसमें मेरा जीवनभी जाता है, धर्म करते अधर्म
होवेगा. राजा यह कहकर बहुत जोर करने लगा, और उस
बखत जोर उसका कुछ काम न आया. तब उसने आगिया
और कोयला दोनों बीरोंको याद किया, याद करतेही दोनों
बीर आकर हाजिर हुए और चारोंको उठा किनारेपर रख
दिया. तब वह विदेशी राजाके पांवोंपर गिरपड़ा और बोला
कि, महाराज ! तुमने हम तीनोंको जीवदान दिया, तुम्हीं हमारे
भगवान् हो; क्योंकि जीवदान इस वक्त तुमसे पाया राजा हाथ
पकड़कर उन तीनोंको रंगमहलमें ले आया, और बिठाकर
कहा, जो तुम्हें चाहिये सो माँगो तब वह बोला—महाराज !
हमको हुक्म करो तो हम घरको जायें, और जबतलक जियेंगे
तबतलक आपको आशिष दिया करेंगे. ऐसाही कुछ तुमने हमें
दिया है. तब राजाने अपनी तरफसे लाख रुपये देकर उनको
घर भिजवा दिया. इतनी बात कहकर पुतली फिर बोली-
राजा, इतने लायक जो तुम हो तो इस सिंहासनपर बैठो, नहीं