सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
पंद्रहवीं पुतली १५. (९५)
पंद्रहवीं पुतली १५. (९५)
निकालके मेरेपास ले आओ जब वह उसे मारने चला तब
दीवानभी बिदा हो पीछे हो लिया बाहर निकल जल्लादसे कहा
कि-तू इसे मुझे दे और आंखें हरनकी निकालका राजाके पास
लेजा. जल्लादने प्रधानका कहना किया. और दीवान राजाकी
तरफसे बहुत बेइतिबार हुआ कि, ऐसा मूर्ख राजा हमने नहीं
देखा, न सुना. गुणवंत पुरुषोंको यों जीता मारे. कदाचित्
गुणवान् पुरुषसे कुछ तकसीर हो जाय तो उससे देशसे निकाल
देते हैं. यह राजाओंका चलन हमेशासे है. पर कोई राजाओंकी
बातपर न भूले मुहमें तो उनके अमृत रहता है और पेटमें
बिषभरे हुए हैं. जो कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं. इस तरह
दीवानने अपने जीमें बिचारकर डरते डरते उसे छिपा रक्खा
और जल्लाद हिरनकी आंखें निकाल राजाके पास लेगया कि
महाराज ! उसको मारकर आंखें निकालकर आपके पास लाया
हूं. राजाने हुक्म किया कि, इन आंखोंको संडासमें लेजाकर
डालदो, इस तरह वह साअत तो यों टलगई. फिर कितनेएक
दिनोंके बाद उस राजाका बेटा एकदिन अकेला शिकारको गया
जाते जाते एक महाबनमें जा निकला, एक शेर वहां नजर
आया. बाघको देख वह राजपुत्र बहुत घबराया तब घोडा
वहीं छोड़ एक वृक्षपर चढ़ गया. उसके ऊपर जो देखे तो एक
रींछ बैठा है. रींछको देखतेही उसके हाथ पांव फूलगये और
कांपने लगा, चाहे कि, बेहाल होकर गिरें. इतनेमें वह रींछ बोला
( ९६ ) सिंहासनबत्तीसी.
कि-ऐ कुँवर ! तू अपने मनमें भय मत कर. मैं तुझे नहीं
खाऊंगा; क्योंकि, तू मेरे शरण आया है और मैंने तुझे जीवदान
दिया है. अब तू निःसंदेश होकर आनंदसे यहां बैठ. यह बात
रींछसे सुन उसके जीमें जी आया. इसमें दिन बीतगया और
रात होगई तब रींछ बोला—राजपुत्र ! अब तो रात होगई यह
नाहर शत्रु हम दोनोंको बैठा है इस वक्त सोना जीका
जियान है. बेहतर यह है कि, दो दो पहर रात हम आपसमें
जागें. आधी २ रात जागना. आधीरात तू जाग और आधी
रात मैं जागूं राजपुत्रने कहा-बहुत अच्छा. रींछने कहा-पहले
दोपहर रातको तू सोरह. मैं अब जागताहूं और पिछले दो याम
निशाको तू जागियो, मैं सो रहूंगा. आपसमें इस तरह दोनोंने
करार किया. और राजपुत्र सोरहा वह रींछ बैठा और चौकी
देने लगा. इतनेमे शेरने रींछसे कहा कि-तू मेरी बात सुन और
अज्ञानी मत हो. यह मनुष्य तो अपना भक्ष्य है तू क्यों विषका
बीज बोता है? इसे नीचे डालदे हम दोनों इसे खाजाँय. यह
आदमी है और हम तुम दोनों बनबासी हैं. हाथका माणिक
गिरके हाथ फिर नहीं आता. जब यह जाग उठेगा और तू
सोवेगा तो वह तेरा शिर काटकर फेंक देवेगा. अब यही बेह-
तर है कि, मेरा कहना कर. फिर यह अवसर न पावेगा और
आखिरको तू पछतावेगा रींछने जवाब दिया कि-सुन अज्ञानी
बाघ ? अपने ऊपर अपराध लेना उचित नहीं ? जितना होता है